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Sir Syed Day: यूपी चुनाव में मुद्दा बनने से बच पाएगा मुस्लिमों की तालीम का सबसे बड़ा केंद्र AMU?

Sir Syed Day: गुलाम हिंदुस्तान में तालीम की अलख जगाने के मकसद से जिस अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना सैयद अहमद खां ने की थी, वह आज देश की सियासत में अहम रोल अदा करता है. यहां से निकले कई छात्र विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति तक की कुर्सी तक पहुंचे.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (फोटो-PTI) अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (फोटो-PTI)

गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए मचलते हिंदुस्तान में जिस शख्स ने ऑक्सफोर्ड-कैंब्रिज जैसी यूनिवर्सिटी का सपना देखा था, आज उनका जन्मदिन है. बात हो रही है सर सैयद अहमद खां की. सैयद अहमद खां ने ही 1875 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की नींव रखी थी. 146 साल में इस नींव पर बुलंदियों की बड़ी इमारत खड़ी हो चुकी है. 

दुनियाभर में अपनी तालीम के लिए मशहूर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी मुस्लिम राजनीति के एक बड़े सेंटर के रूप में भी जानी जाती है. कई बड़े मुस्लिम सियासतदान एएमयू की दहलीज से निकले हैं और आजादी के आंदोलन से लेकर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के प्रोटेस्ट समेत कई अहम मूवमेंट में एएमयू के स्टूडेंट्स सक्रिय भागीदारी निभाते रहे हैं.  

पिछले कुछ सालों में एएमयू लगातार खबरों में रहा है. जिन्ना विवाद और एंटी सीएए मूवमेंट के चलते भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेताओं ने इसे निशाने पर लिया. देश में जिस तरह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू राजनीतिक चर्चाओं और विवादों के केंद्र में बना रहा है, वही हाल यूपी में अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी यानी एएमयू का भी है. यूपी अब चुनावी मोड में आ चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एएमयू भी किसी न किसी तरह चुनाव का मुद्दा बनेगा? 

गुलाम हिंदुस्तान में तालीम की अलख जगाने के मकसद से जिस अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना सैयद अहमद खां ने की थी, वह आज देश की सियासत में अहम रोल अदा करता रहा है. यहां से निकले कई छात्र विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति तक बने. देश ही नहीं विदेशों में भी बड़े-बड़े ओहदों तक पहुंचे.

राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक बने हैं एएमयू के छात्र

पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन, सीमांत गांधी 'भारत रत्न' अब्दुल गफ्फार खान, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, बांग्लादेश के पूर्व प्रधानमंत्री मंसूर अली, मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद अमीन दीदी, जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम शेख अब्दुल्ला और दिल्ली के पूर्व सीएम साहिब सिंह वर्मा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के ही छात्र थे.

इसके अलावा केरल के मौजूदा गर्वनर आरिफ मोहम्मद खान, समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री आजम खान, सपा नेता अबु आसिम आजमी, सपा सांसद एसटी हसन, बसपा सांसद हाजी फजलुर रहमान, सपा विधायक नफीस अहमद, सपा प्रवक्ता अब्दुल हफीज गांधी, बसपा कोआर्डिनेटर फैजान खान समेत कई नेता अभी सक्रिय राजनीति में हैं.

एएमयू को लेकर धारणा है कि यह सिर्फ मुस्लिमों की यूनिवर्सिटी है, ऐसा नहीं है. यहां के कई कोर्सेज में अच्छी-खासी संख्या गैर-मुस्लिम की होती है. अगर मुस्लिम आबादी में बात की जाए तो सबसे अधिक स्टूडेंट पूर्वांचल से आते हैं, खास तौर पर आजमगढ़, बस्ती, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच के इलाके से... इसके अलावा पश्चिम में बिजनौर, सहारनपुर, रामपुर, मुजफ्फरनगर, बदायूं जिलों से भी मुस्लिम बच्चे अच्छी संख्या में आते हैं.

 

यूपी की सियासत में क्यों अहम है एएमयू

467 एकड़ में फैले एएमयू में उत्तर प्रदेश के कोने-कोने से स्टूडेंट अलग-अलग कोर्स में पढ़ाई करते हैं. यहां तकरीबन सभी प्रदेशों के करीब 30 हजार स्टूडेंट पढ़ाई करते हैं. हर साल करीब 10 हजार स्टूडेंट नया एडमिशन लेते हैं तो करीब 10 हजार ही डिग्री लेकर अपने सामाजिक, व्यवसायिक या राजनीतिक सफर पर निकल पड़ते हैं.

आजतक डिजिटल से बात करते हुए एएमयू के स्टूडेंट रहे बशर आजमी बताते हैं कि एएमयू में स्टूडेंट पढ़ाई के साथ ही अपने अधिकारों, राजनीतिक समझ और समाज के बदले हालात पर भी बारीकी से नजर रखता है, इसका असर यह होता है कि जब वह अपने इलाके में होता है तो वहां एक बड़े तबके तक राजनीतिक-सामाजिक बातें पहुंचाता है.

बशर आजमी बताते हैं कि जैसे आजमगढ़ में एएमयू के ओल्ड ब्वॉज (पढ़ाई कर चुके स्टूडेंट) की संख्या करीब 5 हजार होगी. हर साल 17 अक्टूबर को सर सैयद डे पर एक बड़ा कार्यक्रम होता है और उसमें अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा की जाती है, इसके साथ ही अपने समाज के हित में क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इस पर भी बात होती है.

बशर आजमी ने कहा कि इस बार एंटी-सीएए की बड़ी मुहिम एएमयू से शुरू हुई थी, इस मूवमेंट को कुचलने की लगातार कोशिश हुई, ठीक इसी तरह जिन्ना विवाद भी एएमयू से शुरू हुआ, जबकि वह तस्वीर 1938 से लगी हुई है, एएमयू पर कई तरह की बयानबाजी की गई, इन सबसे मुस्लिम समाज में नाराजगी है.

यूपी में मुस्लिम सियासत और एएमयू

2022 में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, एआईएमआईएम समेत कई राजनीतिक पार्टियों के निगाह मुस्लिम वोटों पर है. यूपी में करीब 20 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. इस हालात में एएमयू का रोल सबसे अहम हो जाता है, क्योंकि यूपी के हर जिलों में एएमयू के छात्र-पूर्व छात्र हैं और उनमें से कई मुस्लिम तबके के बीच सक्रिय हैं.

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में एएमयू के छात्र रहे नेता अलग-अलग पार्टियों के टिकट पर मैदान में थे. रामपुर से आजम खान, उतरौला से अब्दुल मन्नान, इटावा से अरशद खुर्शीद, बहराइच सदर से यासर शाह, लखनऊ पश्चिम से रेहान नईम, गोपालपुर से नफीस अहमद समेत कई चेहरे चुनावी मैदान में थे. 2022 के चुनाव में भी कई राजनीतिक पार्टियां एएमयू के पूर्व स्टूडेंट्स को प्रत्याशी बना सकती हैं. ऐसे में अलीग बिरादरी (एएमयू के पुराने स्टूडेंट्स का समूह) की भूमिका 2022 के इलेक्शन में काफी अहम होगी.

बीजेपी के निशाने पर क्यों रहता है एएमयू?

यूपी की राजनीति में एएमयू की पकड़ की वजह से वह कई बार निशाने पर आ जाती है. कभी जिन्ना का मुद्दा गर्माया तो कभी एंटी-सीएए प्रोस्टेट. इस मामले एएमयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अब्दुल हफीज गांधी कहते हैं कि बीजेपी के राजनीतिक एजेंडे में एएमयू एकदम फिट बैठता है, क्योंकि एएमयू में मुस्लिम शब्द जुड़ा हुआ.

अब्दुल हफीज गांधी ने कहा कि एएमयू मुस्लिमों ही नहीं सभी तबके को ऊपर उठाने के लिए काम करता है, बीजेपी हमेशा एंटी-मुस्लिम राजनीति करती है, ऐसे में एएमयू को टारगेट करना उनके लिए सबसे मुफीद है, एएमयू से बड़ी संख्या में चेहरे सियासी मैदान में होते हैं, इस वजह से भी टारगेट किया जाता है.

'बीजेपी के राजनीतिक एजेंडे में एएमयू एकदम फिट बैठता है, क्योंकि एएमयू में मुस्लिम शब्द जुड़ा हुआ, बीजेपी हमेशा एंटी-मुस्लिम राजनीति करती है, ऐसे में एएमयू को टारगेट करना उनके लिए सबसे मुफीद है'

अब्दुल हफीज गांधी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सपा

हालांकि, एएमयू के पूर्व स्टूडेंट बशर आजमी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से एएमयू में भाषण दिया है, तब से बीजेपी के नेता अब संस्थान को टारगेट कम करते हैं. उनका तर्क है कि इसके पीछे पीएम मोदी की गल्फ देशों से अच्छे रिश्ते वजह हो सकते हैं, क्योंकि गल्फ देशों में एएमयू के बड़ी संख्या में अलीग रहते हैं.

AMU vs राजा महेंद्र प्रताप सिंह यूनिवर्सिटी क्यों?

बीते दिनों ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी का शिलान्यास किया था. यूपी सरकार ने 2019 में अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम एक राज्य स्तरीय यूनिवर्सिटी खोलने का ऐलान किया गया था. इसके पीछे वजह बताई गई थी कि एएमयू ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह को सम्मान नहीं दिया, जिसके वह हकदार थे.

बीजेपी के इस आरोप पर सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अब्दुल हफीज गांधी कहते हैं कि बीजेपी राजा महेंद्र प्रताप सिंह के इतिहास को नहीं जानती है, उनके पिता राजा घनश्याम सिंह और सर सैयद दोस्त थे और राजा महेंद्र प्रताप ने अटल बिहारी वाजपेयी को चुनाव हराया था, वह हमेशा बीजेपी की विचारधारा के खिलाफ रहे हैं.

वे बताते हैं कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को 1929 में 3.8 एकड़ की जमीन लीज पर दी थी. यह जमीन मुख्य कैंपस से अलग शहर की ओर है, जहां आज आधे हिस्से में सिटी स्कूल चल रहा है और आधा हिस्सा अभी खाली है, सिटी स्कूल का नाम उनके नाम पर ही रखा जा रहा है.

'राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी बनना अच्छी बात है, लेकिन सरकार को चाहिए था कि इस यूनिवर्सिटी की स्थापना उस पिछड़े जिले में करे, जहां पर अभी भी बच्चों को पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है.'

फैजान खान, राष्ट्रीय प्रवक्ता, बसपा

एएमयू का इतिहास

एएमयू संस्थापक सर सैयद अहमद खान का जन्म 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली के दरियागंज में हुआ था. 1873 उन्होंने सबसे पहले शिक्षण संस्थान खोलने का फैसला किया. इससे पहले उन्होंने ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज का दौरा भी किया था.


सर सैयद अहम खां ने 1875 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की नींव रखी थी. 1920 में इसी कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्जा मिला. सेंट्रल बनने के बाद इसका नाम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी रख दिया गया.

 

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