
हरदोई की सवायजपुर विधानसभा फर्रुखाबाद , कन्नौज और शाहजहांपुर जिलों की सीमा को छूती हुई जिले के एक कोने में स्थित है. सड़क मार्ग से जुड़ी यह विधानसभा पांच नदियों से घिरी हुई है. बाढ़ इस इलाके के लिए अभिशाप है. हर साल इस इलाके के लोगों को बाढ़ की विभीषका से जूझना पड़ता है. अर्जुनपुर पुल जो बड़ेगांव से अर्जुनपुर के रास्ते फर्रुखाबाद को जोड़ता है. यहां की सियासत का मुख्य चुनावी मुद्दा है. इस सीट पर अब तक 18 चुनाव में दस बार ब्राह्मण 6 बार क्षत्रिय और दो बार पिछड़ी जाति से के नेता विधायक बने हैं. जबकि , पिछड़ी जाति की आबादी इस सीट पर ज्यादा है.
सवायजपुर विधानसभा का गठन 2102 में हुए नए परिसीमन की वजह से हुआ था.यह विधानसभा में पहले बिलग्राम और शाहाबाद विधानसभा का हिस्सा थी, जो नए परिसीमन में हरपालपुर विकासखंड , भरखनी विकासखंड ,सांडी विकासखंड की 39 और बावन विकासखंड की 10 ग्राम सभा को मिलाकर अस्तित्व में आयी थी.
राजनीतिक पृष्ठभूमि
सवायजपुर विधानसभा की यह सीट 1952 में हरदोई ईस्ट के नाम से जानी जाती थी. इस सीट पर कांग्रेस से पहली बार चन्द्रहास मिश्रा 19041 मत पाकर चुनाव जीते थे. 1957 के भी चुनाव में यहां की जनता ने कांग्रेस से चंद्रहास मिश्रा को दोबारा अपना नुमाइंदा चुना. 1962 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने यहां से कलारानी मिश्रा को चुनाव मैदान में उतारा जो 15800 मत पाकर विधानसभा पहुंचीं. इसके बाद 1967 और 69 के दोनों चुनाव में कलारानी मिश्रा 21401 और 18647 मत पाकर लगातार तीन बार विधायक रहीं.
इसके बाद 1974 के विधानसभा चुनाव में शारदा भगत सिंह जनसंघ के टिकट पर 18617 मत पाकर चुनाव जीते. आपातकाल में 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में यह विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस के विरोधी लहर का गवाह बना और शारदा भगत सिंह जनता पार्टी के टिकट पर 33878 मत पाकर चुनाव जीते. 1980 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने हरिशंकर तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया जो 36730 मत पाकर विधानसभा पहुंचे. 1985 में भी कांग्रेस ने अपने ही विधायक हरिशंकर तिवारी को चुनाव मैदान में फिर से उतारा और वह 29863 मत पाकर विधानसभा पहुंचे.
मंडल कमीशन के दौरान 1989 में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को यहां से पहली बार सफलता मिली तब भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता गंगा भक्त सिंह 39061 मत पाकर विधानसभा पहुंचे थे. उसके बाद मध्यावधि चुनाव जब 1991 में हुए तो गंगा भगत सिंह ने इस सीट पर अपना कब्जा जमाए रखा और वह 22842 मत पाकर काफी करीबी मुकाबले में चुनाव जीते. 1993 में इस सीट का इतिहास बदला और यह सीट सर्वाधिक पिछड़े वर्ग के मतदाता के बाद पहली बार पिछड़े वर्ग के नेता विश्राम सिंह यादव के हाथ लगी जो समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में 51764 मत पाकर पहली बार विधानसभा पहुंचे. लेकिन महज 3 साल बाद 1996 में जब फिर विधानसभा चुनाव हुए तो भारतीय जनता पार्टी ने यह सीट सपा से छीन ली और बीजेपी के गंगा सिंह चौहान 48232 मत पाकर यहां से विधायक बने.
2002 के चुनाव में यहां की जनता ने फिर पिछड़े वर्ग के नुमाइंदे के रूप में सपा के विश्राम सिंह यादव को चुनाव मैदान में विजयी बनाया. उन्हें 42151 मत मिले. 2007 के विधानसभा चुनाव में युवा चेहरे के रूप में बहुजन समाज पार्टी से उपेंद्र तिवारी पहली बार चुनाव लड़े और उन्होंने रिकॉर्ड 61730 मत पाकर चुनाव में विजय हासिल की. बीमारी के कारण उनके निधन के बाद उनकी पत्नी रजनी तिवारी को बहुजन समाज पार्टी ने 2008 में विधानसभा उप चुनाव लड़ाया और लोगों की सहानुभूति मिली और वह जीत गईं.

2012 में विधानसभा का परिसीमन होने के बाद बिलग्राम विधानसभा कही जाने वाली इस विधानसभा को सवायजपुर के नाम से जाना गया. नए परिसीमन में घोषित सवायजपुर विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने फिर से रजनी तिवारी को चुनाव मैदान में उतारा इस बार का चुनाव काफी संघर्षपूर्ण था और रजनी तिवारी 49099 मत पाकर दूसरी बार विधायक बनीं. इस बार उनका करीबी मुकाबला जनक्रांति पार्टी के पदमराग यादव, बीजेपी के माधवेंद्र प्रताप सिंह रानू और समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता अशोक वाजपेयी से हुआ लेकिन तीनों को पटखनी देकर रजनी तिवारी अपनी सीट बचाने में कामयाब रही.
2017 के विधानसभा चुनाव में रजनी तिवारी ने बहुजन समाज पार्टी से किनारा कर लिया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उनकी जगह 2012 में तीसरे नंबर पर रहे प्रत्याशी माधवेंद्र प्रताप सिंह रानू पर भरोसा किया जो 92601 मत पाकर समाजवादी पार्टी के पद्मराग सिंह यादव से करीब 27 हजार से अधिक मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे.
सामजिक ताना बाना
2019 के आंकड़ों के अनुसार सवायजपुर विधानसभा सीट पर कुल 390390 मतदाता हैं. जिनमें 214811 पुरुष और 175571 महिला मतदाता है. अगर जातीय समीकरण के हिसाब से देखे तो यहां पिछड़े वर्ग के मतदाता करीब 40 प्रतिशत हैं जिनमें यादव सर्वाधिक हैं. करीब 1,80000 पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में यादव बिरादरी के 60 हजार मतदाता, फिर लोध बिरादरी ,कहार, काछी, कुर्मी और पाल बिरादरी के मतदाता हैं. इसके बाद करीब सत्तर हजार ब्राह्मण और 50 हजार ठाकुर मतदाता हैं. तीस हजार मुस्लिम और करीब 5 हजार वैश्य और करीब साढ़े पांच हजार कायस्थ मतदाता हैं. अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग साठ हजार के आसपास है.
2017 का जनादेश
2017 के हुए विधानसभा चुनाव में सवायजपुर सीट पर 16 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे. मुख्य मुकाबला बीजेपी और सपा के मध्य हुआ. 384720 मतदाता वाली इस सीट पर 231842 लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. माधवेन्द्र प्रताप सिंह का मुकाबला यहां के यादवों में लोकप्रिय विश्राम सिंह यादव के पुत्र पद्मराग यादव से हुआ जो 2012 में दूसरे नंबर पर थे. मोदी लहर में बीजेपी के माधवेन्द्र प्रताप सिंह रानू को 92601 मत जबकि सपा के पद्मराग सिंह यादव को 65631 मत मिले. वहीं, बसपा के फर्रुखाबाद जिले के बाहुबली में शुमार अनुपम दुबे को 59791 मत मिले. इस तरह से माधवेन्द्र प्रताप सिंह रानू लगभग 27 हजार मतों से चुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे.
विधायक का रिपोर्ट कार्ड
सवायजपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक माधवेंद्र प्रताप सिंह का जन्म 25 अक्टूबर 1973 को हुआ. उनके पिता का नाम भगवानदास सिंह है. वह अब वह इस दुनिया में नहीं हैं. माधवेंद्र प्रताप सिंह के पिता सवायजपुर राजघराने से ताल्लुक रखते थे और सवायजपुर के प्रधान भी रहे. उनके ताऊ हरिहर बक्श सिंह कांग्रेस पार्टी के टिकट पर विधायक रहे जबकि उनके एक चाचा कांग्रेस पार्टी के प्रदेश पदाधिकारी भी रहे.
मानवेंद्र प्रताप सिंह की प्रारंभिक शिक्षा हरदोई और उसके बाद उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी के अंतर्गत कासगंज से ग्रेजुएट की डिग्री हासिल की. राजनीति में आने का शौक उनको पंचायत चुनाव के जरिए हुआ जब 1995 में पहली बार उनकी मां गीता सिंह भरखनी ब्लॉक की ब्लॉक प्रमुख चुनीं गईं. वह दो बार ब्लॉक प्रमुख चुनी गईं. ब्लॉक प्रमुख का काम मानवेंद्र प्रताप सिंह ही संभालते थे.
सवायजपुर राजघराने से ताल्लुक होने का असर और ब्लॉक के जरिये चुनावी राजनीति के कारण उनका जनता से जुड़ाव होता गया और पहली बार 2012 में बीजेपी के टिकट पर उन्होंने चुनावी मैदान में ताल ठोकी. बीजेपी के बड़े नेता राजनाथ सिंह ने उनके पक्ष में चुनाव प्रचार भी किया हालांकि उन्हें कामयाबी नहीं मिली. राजनीतिक विरासत के रूप में सवायजपुर राजघराने का अपना एक अलग महत्व रहा है. इसके अलावा सजातीय वोटों पर लगातार बढ़ती पकड़ के कारण वह विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे. लगातार जनता से जुड़े रहने के बाद पहली बार जब माधवेंद्र प्रताप सिंह रानू विधायक बने तो उन्होंने इस अति पिछड़े क्षेत्र में कुछ विकास कार्यों की श्रंखला को आगे बढ़ाया.
उन्होंने सवायजपुर में कोतवाली की मंजूरी दिलाई ,अग्निशमन केंद्र इसके अलावा पाली से कांठ कोरिया तक टू लेन सड़क, बाबरपुर में लघु सेतु का निर्माण, हरपालपुर में कृषि कल्याण केंद्र और पानी से भरा रहने वाला मुख्य मार्ग और कई गांव में ग्रामीण पाइप जल योजना पर अमल करवाया. यही नहीं उन्होंने इस विधानसभा में वर्षो से राजनीति का केंद्र बने अर्जुनपुर पुल की 106 करोड़ रुपए की स्वीकृति भी कराई. यह पुल बड़े गांव और अर्जुनपुर के मध्य रामगंगा नदी पर बनना है और दशकों से यहां का चुनावी मुद्दा भी रहा है. आखिरी समय में इस पुल के निर्माण की स्वीकृति इनके काम की मुख्य बात रही है. कोरोना कॉल में अपनी विधायक निधि से ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और ऑक्सीजन प्लांट और अन्य मेडिकल उपकरण के लिए भी उन्होंने धनराशि दी.
विविध
माधवेंद्र प्रताप सिंह रानू की छवि उनकी सजातीय बिरादरी में काफी मजबूत है. कहीं-कहीं पर उन्हें ब्राह्मण विरोधी होने और दबंग छवि का विधायक होने का भी आरोप लगा. इलाके के एक जिला पंचायत सदस्य विमल मिश्रा को भरी मीटिंग में बेइज्जत करने पर उनके ब्राह्मण विरोधी आरोप सुर्खियां बने तो चुनाव जीतने के बाद शाहाबाद के पुलिस क्षेत्राधिकारी को टेलीफोन पर धमकाने जैसे गंभीर आरोप भी सुर्खियों में रहे. ब्लॉक प्रमुख चुनाव में उनकी भाभी का भरखनी से निर्विरोध निर्वाचन में उनपर दबंग शैली अपनाने का भी आरोप लगा था.
भारतीय जनता पार्टी में राजनाथ सिंह से करीबी रिश्ते रखने वाले माधवेंद्र प्रताप सिंह का इस बार भी इसी इलाके से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने का दावा है. लेकिन जिले के अन्य विधानसभा में कुछ सियासी समीकरणों की वजह से भारतीय जनता पार्टी उनको इसी सीट से फिर से चुनाव मैदान में उतारेगी या उनकी उपयोगिता किसी बगल की दूसरी विधानसभा सीट पर समझी जाएगी यह आने वाला वक्त ही बताएगा.