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Madhuban Assembly Seat: 5 साल पहले बीजेपी का खुला था खाता, क्या दूसरी बार मिलेगी जीत

2017 में राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मधुबन विधानसभा सीट (Madhuban Assembly Seat) पर अपना खाता खोलने का मौका मिला और भाजपा के लिए दारा सिंह चौहान ने जीत हासिल की.

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Madhuban Assembly Seat
Madhuban Assembly Seat
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बाढ़ और फसलों में आगजनी की वजह से चर्चा में रहता है यह क्षेत्र
  • 2017 के चुनाव में बीजेपी ने पहली बार यहां से जीत का खाता खोला
  • बीजेपी का खाता खोलने वाले दारा सिंह योगी सरकार में बने मंत्री

उत्तर प्रदेश विधानसभा में मधुबन विधानसभा सीट भी अपने क्षेत्र की हाईप्रोफाइल सीट है. यह विधानसभा सीट मऊ जिले के तहत आती है. भारतीय जनता पार्टी को पिछले चुनाव में पहली बार यहां से जीत मिली और विजयी विधायक योगी आदित्यनाथ के राज में मंत्री बन गए. 

जनपद मऊ के उत्तरी छोर पर घाघरा नदी के किनारे की तटवर्ती व गोरखपुर-देवरिया एवं आजमगढ़ को जोड़ने वाली मधुबन विधानसभा में घाघरा नदी का पाट एवं तलहटी होने के कारण देवांचल का अधिक जमीनी हिस्सा इस क्षेत्र में पड़ता है. यही कारण है कि यहां हर वर्ष नदी की बाढ़ और गर्मी में फसलों में आगजनी का खतरा हमेशा बना रहता है. यहां के लोगों को खानाबदोषी का जीवन व्यतीत करना पड़ता है.

सामाजिक तानाबाना
गर्मी के दिनों में जब रबी की फसल पक जाती है और किसान उसको लेकर अपने आगामी भविष्य का सपना संजोने लगता है तभी सार्ट सर्किट और अन्य कारणों से आग लगने के कारण उसके अरमानों पर पानी फिर जाता है. इसका मुख्य कारण देवरांचल का एक लंबा हिस्सा जो नदी के पाट से बनता है और उसमें किसान अपने गेहूं की फसल उगाते हैं.

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हर साल आगलगी से हजारों एकड़ फसल जलकर राख हो जाती है. इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय विधानसभा मुख्यालय पर फायर स्टेशन तो जरूर बनवा दिया गया है किंतु इस प्राकृतिक आपदा को रोकना इतना आसान नहीं होता है यदि हम बाढ़ की बात करें तो अपनी झुग्गी झोपड़ी डालकर रहने वाले लोगों को हर बरसात के मौसम में अपना आशियाना उजाड़ना पड़ता है.

मधुबन विधानसभा में कुल वोटर 392392 हैं जिसमें महिला वोटर 181534 तो वहीं कुल पुरुष मतदाता 210818 हैं जबकि थर्ड जेंडर का 41 वोट हैं.

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मधुबन विधानसभा का ज्यादातर हिस्सा घाघरा नदी के किनारे पड़ने के कारण यहां पर वोटिंग के समय बाढ़ और गर्मी में फसलों में आग लगी की घटनाओं को ही प्रमुख मुद्दा बनाकर चुनाव में प्रत्याशी सामने आते हैं. हालांकि हर वर्ष घाघरा नदी की कटान से खेती और फसलों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार की तरफ से करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं.

बावजूद इसके स्थिति अभी भी वैसी ही बनी हुई है. जनप्रतिनिधियों द्वारा चुनाव में लगातार वादे तो किए जाते हैं लेकिन क्षेत्रवसियों की समस्या से निजात अभी तक उनको नहीं मिल सका है. आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र के लोगों का प्रमुख व्यवसाय खेती किसानी है लेकिन हर वर्ष बाढ़ में सैकड़ों एकड़ फसल डूब कर नष्ट हो जाती है और किसान मुआवजा और बाढ़ की विभीषिका से बचने के लिए जनप्रतिनिधियों सहित सरकार से गुहार लगाते रहते हैं. 

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राजनीतिक पृष्ठभूमि
आजादी की लड़ाई में इस क्षेत्र का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है. सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय देश की स्वतंत्रता के दीवानों ने मधुबन थाने पर तिरंगा फहराया था जिससे इस धरती का नाम पूरे देश में हो गया.

आजादी मिलने के बाद सबसे पहले इस विधानसभा क्षेत्र का गठन हुआ और इसका नाम नत्थुपुर पड़ा. विधानसभा का नाम नत्थूपुर पड़ने का कारण यहां के राजा नथमल थे और जिनके नाम पर यहां एक गांव हुआ करता था. जो बाद में नत्थूपुर के नाम से जाना गया और और आज भी यह गांव आस्तित्व में है. लेकिन कालांतर में नए परिसीमन के चलते इस विधानसभा का नाम मधुबन हो गया.

हालांकि पहले विधानसभा चुनाव के समय नत्थूपुर और मधुबन दोनों गांव के रूप में मौजूद थे. क्रांतिकारियों की धरती मानी जाने वाली इस विधानसभा ने 1942 में ब्रिटिश हुकूमत की चूले हिलाकर रख दिया था. इस आंदोलन में यहां के तमाम क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. यहां के लोगों ने जनप्रतिनिधि के रूप में पांच बार स्वतंत्रता सेनानियों को चुनकर प्रदेश की पंचायत में भेजने का काम किया है.

क्रांतिकारियों की धरती कहे जाने वाले इस विधानसभा पर देश की आजादी में अपना योगदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को अपने सर आंखों पर बिठाया. यही कारण है कि इस क्षेत्र से पांच बार स्वतंत्रता सेनानियों को अपना जनप्रतिनिधि बनाया. स्वतंत्रता के बाद पहली विधानसभा गठन में स्वतंत्रतासेनानी राम सुंदर पांडे को सन 1952 से लेकर 1962 तक, एक अन्य स्वतंत्रतासेनानी मंगल देव विशारद को 1967 में और स्वतंत्रतासेनानी विष्णु देव गुप्ता को 1985 में क्षेत्र का विधायक बनाया. इस सीट को राज्य मंत्री परिषद में दो-दो बार कैबिनेट में प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला.

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हालांकि मंत्री बनने का मौका केवल मंगल देव विशारद और राजेंद्र कुमार और वर्तमान में दारा सिंह चौहान को ही मिला. 1989 में हुए मध्यावधि चुनाव में स्वतंत्रता सेनानी श्याम सुंदर पांडे के सुपुत्र अमरेश चंद्र पांडे ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता. 1991 के सामान्य विधानसभा चुनाव में एक बार पुनः अमरेश पांडे ने अपना परचम लहराया. पुनः 1993 के मध्यावधि चुनाव में अनुसूचित सीट होने के कारण इस सीट पर राजेंद्र कुमार को टिकट मिला और वह चुनाव जीतकर सरकार में वित्त एवं राजस्व मंत्री बनाए गए.

1996 में मध्यावधि चुनाव में समाजवादी पार्टी के बैनर तले सुधाकर सिंह विधायक बने एवं पुनः सामान्य निर्वाचन 2002 में बसपा से कपिल देव यादव विधायक चुने गए. इसके बाद विधानसभा चुनाव 2007 में बसपा के बैनर तले उमेश चंद्र पांडे चुनाव जीतकर विधायक बने और 2012 के चुनाव में अपनी बादशाहत कायम रखते हुए अमरेश चंद्र पांडे विधायक चुने गए. सन 2017 में भारतीय जनता पार्टी जो कि अभी तक इस सीट पर अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी, दारा सिंह चौहान ने चुनाव जीतकर पार्टी की इस मुराद को पूरा कर दिया और निकटतम प्रतिद्वंदी कद्दावर नेता अमरेशचद पांडे को हरा दिया.

2017 का जनादेश
2017 में राज्य में हुए आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को इस सीट पर अपना खाता खोलने का मौका मिला और भाजपा के लिए टिकट पर चुनाव लड़े दारा सिंह चौहान को कुल 86238 वोट प्राप्त हुए तथा पूर्व विधायक एवं कांग्रेस के बैनर तले चुनाव लड़े अमरेश चंद्र पांडे को कुल 56823 मत प्राप्त हुए. जिसमें दारा सिंह चौहान 29415 वोट से चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने.

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वहीं बहुजन समाज पार्टी के पूर्व विधायक एवं इस सीट पर पिछले दो बार से लगातार विधायक रहे उमेश चंद्र पांडे को 54803 वोट मिले और वह तीसरे नंबर पर रहे. इस चुनाव में जनता ने कुल 56.68 प्रतिशत वोटिंग की थी.

रिपोर्ट कार्ड
मऊ के मधुबन विधानसभा के भाजपा विधायक दारा सिंह चौहान वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री हैं. इनका जन्म 25 जुलाई 1963 को आजमगढ़ जनपद में हुआ था. बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में रहने के बाद अभी वह भाजपा से विधायक और सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. उनके परिवार में उनके चार बच्चे हैं.

2 फरवरी 2015 को दारा सिंह ने भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन की थी और उसके बाद बीजेपी ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष बने और मधुबन से चुनाव लड़कर जीत हासिल किया. इनके पिता का नाम रामकिशन चौहान है. उनकी पत्नी का नाम दिशा चौहान है. इनके दो लड़के और दो लड़कियां हैं. दारा सिंह ने इलाहाबाद से अपनी शिक्षा ग्रहण की है. 

मंत्री रहने के बाद भी दारा सिंह क्षेत्र में जाकर उनकी समस्याओं को सुनते हैं और इस वर्ष कटान और बाढ़ से बचाव के लिए काफी पैसा खर्चा करके इसको रोकने की दिशा में काम कर रहे हैं. 15वीं लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़कर सांसद बने थे जबकि 16वीं लोकसभा में चुनाव में इन्हें भाजपा के हरिनारायण राजभर के हाथों हार का सामना करना पड़ा. दारा सिंह ने अपनी विधायक निधि से नदी की बाढ़ से कटान रोकने के लिए 75 करोड़ का प्रोजेक्ट लगाया गया. कटघरा में 10 करोड़ से ज्यादा की लागत से फायर स्टेशन का निर्माण हो रहा है.

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शिक्षा के लिए 10 करोड़ की लागत से डिग्री कॉलेज का निर्माण चल रहा है. कटान में तबाह हो चुके 32 घरों के लोगों को विस्थापित कराकर उनको पट्टा आवंटित कराया गया और प्रधानमंत्री आवास भी दिलाया गया. सड़कों पर इनके द्वारा लगभग 18 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.

 

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