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विधानसभा चुनाव: मतगणना से पहले झारखंड में सियासी गहमागहमी तेज

झारखंड में जनता ने सत्ता की चाबी किस दल को सौंपी है इसका खुलासा होने में महज चंद घंटे बचे हैं, लेकिन इसे लेकर चुनाव लड़ रहे सभी दलों के उम्मीदवारों की दिल की धड़कनें तेज हैं.

झारखंड में जनता ने सत्ता की चाबी किस दल को सौंपी है इसका खुलासा होने में महज चंद घंटे बचे हैं, लेकिन इसे लेकर चुनाव लड़ रहे सभी दलों के उम्मीदवारों की दिल की धड़कनें तेज हैं. तनाव दूर करने के लिहाज से कुछ उम्मीदवार अपने इष्ट देव की अर्चना में लगे हैं तो कुछ घर में आराम फरमा रहे हैं. कोई चाय चौपाल भी सजा रहा है. चुनाव के बाद चौक-चौराहे पर जीत-हार की चर्चा से माहौल गर्म है. वहीं, एग्जिट पोल के नतीजों से उत्साहित बीजेपी के अरमान सातवें आसमान पर हैं.

पांचवें और अंतिम चरण का मतदान खत्म होते ही सामने आए एग्जिट पोल के नतीजों से बीजेपी काफी खुश है. एग्जिट पोल की मानें तो झारखंड गठन के बाद पहली बार किसी भी दल को सूबे में स्पष्ट बहुमत मिलने जा रहा है. ऐसे में बीजेपी के नेता अभी से संभावित सरकार की रूपरेखा बनाने की तैयारियों में जुट गए है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और खरसावां से बीजेपी प्रत्याशी अर्जुन मुंडा जहां दिल्ली दौरे पर हैं वहीं जमशेदपुर ईस्ट से बीजेपी प्रत्याशी और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास जमशेदपुर के अपने घर में पूजा-पाठ में लगे हैं. यही हाल रांची से बीजेपी उम्मीदवार और पूर्व स्पीकर सी पी सिंह का भी है जो घर में आराम फरमा रहे हैं.

रघुवर दास कहते हैं कि उनकी पार्टी 50 से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करेगी. वहीं, सी पी सिंह के मुताबिक बीजेपी जीत को लेकर आश्वस्त है. दूसरी ओर, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी जेएमएम ने बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के एक्जिट पोल के दावे को खारिज किया है. पार्टी के मुताबिक 23 दिसंबर की मतगणना के बाद स्थ‍िति पलट जाएगी.

मौजूदा सीएम और जेएमएम नेता हेमंत सोरेन को 23 दिसंबर का बेसब्री से इंतजार है. वहीं, मरांडी लगातार चुनावी दौरे के बाद दो दिनों से आराम कर रहे हैं. जेवीएम के सुप्रीमो और गिरिडीह और राजधनवार से चुनाव लड़ रहे बाबूलाल मरांडी अपने पोते के साथ फुटबॉल खेलने में व्यस्त है.

यह चुनाव वास्तव में झारखंड के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है जिसमें पहली बार कोई पार्टी सूबे में बहुमतवाली स्थाई सरकार बना पाएगी. यह चुनाव कुछ स्थानीय क्षत्रपों के लिए राजनितिक वनवास भी ला सकता है. दूसरी तरफ सूबे की सत्ता की राजनीति में अबतक मलाई बने क्षेत्रीय दल इस बार हाश‍िये पर जा सकते हैं. राज्य में बीजेपी के विरुद्ध मजबूत गठबंधन खड़ा नहीं करने का खामियाजा विपक्षी दलों को भी भुगतना पड़ सकता है.

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