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Anti Defection Law: चुनावी मौसम में नेताओं का 'पलायन' शुरू, जानें दल बदल कानून के बाद भी क्यों नहीं हो सकती कार्रवाई?

What is Anti Defection Law: विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही राज्यों में विधायकों और मंत्रियों के पार्टी बदलने का सिलसिला भी शुरू हो गया है. नेताओं के पार्टी बदलने पर रोक लगाने के मकसद से एक दल बदल विरोधी कानून है. क्या अभी विधायकों और मंत्रियों पर कोई कार्रवाई हो सकती है?

स्वामी प्रसाद मौर्य पहले बीएसपी में थे, फिर बीजेपी में आए और अब सपा में हैं. (फाइल फोटो-PTI) स्वामी प्रसाद मौर्य पहले बीएसपी में थे, फिर बीजेपी में आए और अब सपा में हैं. (फाइल फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 1985 में आया था दल बदल विरोधी कानून
  • पार्टी बदलने पर नेताओं की सदस्यता पर खतरा
  • चुनाव तारीख ऐलान के बाद पार्टी बदलने वालों पर एक्शन नहीं

What is Anti Defection Law: उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के बाद से ही सरगर्मी बढ़ गई है. सत्ताधारी बीजेपी से पलायन शुरू हो गया है. अब तक 15 से ज्यादा विधायक और मंत्री बीजेपी छोड़ चुके हैं. इस घटनाक्रम ने राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की मुश्किलें बढ़ा दी है.

इसके अलावा जो विधायक-मंत्री पार्टी छोड़ रहे हैं, वो योगी सरकार पर दलितों-पिछड़ों और समाज के अन्य वर्गों को नजरअंदाज करने का आरोप भी लगा रहे हैं. सबसे चर्चित नाम स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) का है. मौर्य 2017 के चुनाव से पहले बीएसपी छोड़कर बीजेपी में आए थे और अब बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में चले गए हैं. 

ऐसे में सवाल उठता है कि 5 साल तक सरकार में रहने के बाद चुनाव से ऐन पहले पाला बदलने वाले विधायकों और मंत्रियों पर पार्टी कोई कार्रवाई कर सकती है या नहीं? तो इसका जवाब है नहीं. जिन विधायकों और मंत्रियों ने पार्टी छोड़ी है, उनके खिलाफ बीजेपी संगठन स्तर पर कुछ भी नहीं कर सकती. क्योंकि अब वो उनकी पार्टी का हिस्सा ही नहीं रहे हैं.

तो क्या कोई कानूनी कार्रवाई हो सकती है? 

इसका जवाब भी न में ही है. सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता बताते हैं कि चूंकि राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित हो चुकी हैं, ऐसे में वहां पर विधायक और मंत्रियों के पाला बदलने पर उन्हें अयोग्य होने का खतरा भी नहीं है. इसीलिए चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर पार्टी बदलने का सिलसिला शुरू हो जाता है. 

उन्होंने बताया कि इन नेताओं पर दल बदल कानून (Anti Defection Law) भी लागू नहीं होगा. और चुनाव बाद नई विधानसभा के गठन होने के बाद इन नेताओं के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई नहीं की जा सकती. जो लोग विधायक या मंत्री नहीं हैं, उन्हें पार्टी बदलने पर कोई खतरा भी नहीं है.

विराग गुप्ता ने बताया कि जो संसद के सदस्य हैं, उनका ढाई साल का कार्यकाल अभी बाकी है. ऐसे में अगर कोई सांसद पार्टी बदलता है तो उनके अयोग्य होने का खतरा है. 

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ये दल बदल कानून क्या है?

- एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1957 से 1967 के बीच 542 बार सांसदों और विधायकों ने पार्टी बदली. 1967 के आम चुनाव से पहले 430 बार सांसदों-विधायकों ने पार्टी बदल डाली. 1967 के बाद तो एक रिकॉर्ड भी बना, जिसमें दल बदलुओं के कारण 16 महीने के भीतर ही 16 राज्यों की सरकारें गिर गईं.

- 1967 में ही हरियाणा के विधायक गयालाल ने 15 दिन में ही तीन बार पार्टी बदल दी. यहीं से 'आया राम, गया राम' की कहावत शुरू हुई, जो आज भी प्रचलित है. 

- दल बदल पर रोक लगाने के लिए 1985 में राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की सरकार कानून लेकर आई. इसमें कहा गया कि अगर कोई विधायक या सांसद अपनी मर्जी से पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता है तो उसे अयोग्य करार दिया जा सकता है. इसमें ये भी प्रावधान था कि अगर कोई विधायक या सांसद पार्टी व्हीप का पालन नहीं करेगा तो भी उसकी सदस्या जा सकती है.

कानून बना तो नेताओं ने निकाला तोड़

- दल बदल को रोकने के लिए कानून तो बना दिया गया लेकिन नेताओं ने इसका तोड़ भी निकाल लिया. 1985 में आए कानून में ये भी प्रावधान था कि अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई विधायक या सांसद पार्टी बदलते हैं तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. 2003 में इस कानून में सख्ती की गई, जिसके तहत अयोग्य सदस्यों को मंत्री बनाने पर रोक लगा दी गई.

- हालांकि, नेताओं ने इसका तोड़ निकाल लिया. पार्टियों ने दो-तिहाई विधायकों को तोड़कर राज्य सरकारों को गिराने का खेल शुरू कर दिया. इसके अलावा इससे बचने का एक और रास्ता भी है. वो ये कि सांसद-विधायक पहले अपनी सदस्यता से इस्तीफा देता है, फिर पार्टी छोड़ देता है. 

- हाल के सालों में हमने ऐसे कई उदाहरण देखे हैं. जुलाई 2019 में कर्नाटक में कांग्रेस के 14 और जनता दल सेक्युलर के 3 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया. विधायकों के इस्तीफे के बाद बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और सरकार बनाई. इसी तरह मार्च 2020 में मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस के 22 विधायकों ने बगावत कर दी. इसके बाद अल्पमत में आई कमलनाथ सरकार को इस्तीफा देना और बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने. 

भारत ही नहीं, विदेश में भी चलता है दल बदल

भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी दल बदल की राजनीति देखने को मिली है. फरवरी 1846 में ब्रिटेन की कंजर्वेटिव सरकार में फूट पड़ गई. उस समय 231 सदस्यों ने प्रधानमंत्री रॉबर्ट पील (Robert Peel) के खिलाफ वोटिंग की. उन पर पार्टी से विद्रोह करने का आरोप लगा. हालांकि, पील लिबरल पार्टी की मदद से प्रधानमंत्री बने रहे. 1900 में विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) कंजर्वेटिव पार्टी से संसद बने और 1904 में लिबरल पार्टी में आ गए. इसके अलावा, दल बदल के कारण ऑस्ट्रेलिया में 1916, 1929, 1931 और 1941 में सरकारें गिर गईं.

 

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