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मिजोरम: कौन हैं ब्रू शरणार्थी? जिनके वोटिंग के विवाद में नप गए प्रमुख सचिव और सीईओ

नए सीईओ आशीष कुंद्रा ने आइजोल से कान्हमुन जाते वक्त कहा कि आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिविल सोसायटी और समाज का विश्वास कायम रखना और यह सुनिश्चित करना है कि आम मतदाताओं के मन में चुनावी मशीनरी की शुद्धता पर सवाल खड़े नहीं हों.

सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो-Facebook) सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो-Facebook)

पूर्वोत्तर के अहम राज्य मिजोरम में सोमवार को चुनाव प्रचार थम गया. 28 नवंबर को होने वाले मतदान में विस्थापित ब्रू वोटरों का मुद्दा राज्य के सरकार गठन में अहम भूमिका निभा सकता है. त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों में पिछले 21 साल से ठहरे ब्रू जनजातीय वोटरों के लिए चुनाव आयोग ने मिजोरम-त्रिपुरा सीमा स्थित कान्हमुन गांव में मतदान केंद्र बनाए हैं. जबकि इससे पहले ब्रू शरणार्थी कैंप से ही पोस्टल बैलट के जरिए अपने मताधिकार का प्रयोग करते थे.  

क्यों नपे प्रमुख सचिव गृह और मुख्य निर्वाचन अधिकारी?

दरअसल, मिजोरम विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) एसबी शशांक ने त्रिपुरा राहत शिविरों में पंजीकृत ब्रू समुदाय के मतदाताओं को वहीं से मत का प्रयोग करने की अनुमति दे दी थी. जिसके बाद सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने शशांक के खिलाफ प्रदर्शन किया था. यह प्रदर्शन इतना उग्र था कि चुनाव आयोग के कार्यालय को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया था. इससे राजधानी आइजोल समेत पूरे राज्य में सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था. मुख्यमंत्री ललथनहवला ने भी उनको हटाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर शिकायत की थी. राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के बढ़ते दबाव और बढ़ते विवाद को देखते हुए सीईओ एसबी शशांक को हटा दिया गया और मतदान से 2 हफ्ते पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आशीष कुंद्रा को नियुक्त कर दिया गया.

इससे पहले मिजोरम के प्रमुख गृह सचिव लालनुनमाविया चुआनगो ने मिजोरम के ब्रू शरणार्थियों के लिए त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों में मतदान की व्यवस्था करने की पहल का विरोध किया था. लेकिन सीईओ एसबी शशांक ने चुनाव आयोग को पत्र भेज कर शिकायत की कि चुआनगो चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहे हैं. इसके बाद आयोग ने गुजरात काडर के इस आईएएस अधिकारी को तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया था.

क्यों अहम हैं ब्रू शरणार्थी?

मिजोरम में हर सीट पर औसत मतदाताओं की संख्या 19000 के करीब है और 40 सीटों वाली मिजोरम विधानसभा में से 9 विधानसभा क्षेत्रों में ब्रू शरणार्थी वोटरों की निर्णायक भूमिका है. पंजीकृत ब्रू समुदाय के मतदाताओं की सबसे ज्यादा संख्या मामित जिले में है, मामित में तीन विधानसभा-हाच्चेक, डाम्पा और मामित शामिल हैं. इसके बाद कोलासिब जिले की दो विधानसभा और लुंगली जिले में ब्रू समुदाय के मतदाता पंजीकृत हैं. चुनाव आयोग द्वारा 27 सितंबर को प्रकाशित मतदाता सूची के हिसाब से मिजोरम में 7,68,181 वोटर हैं.

पूर्वोत्तर के तामाम राज्यों में जीत का परचम लहरा चुकी बीजेपी, मिजोरम में खाता खोलने के लिए जातीय अल्पसंख्यक- चकमा और ब्रू मतदाताओं पर निगाहें लगाए हुए है.

क्या है मामला?

राज्य में 1997 में हुई हिंसक झड़पों के बाद ब्रू जनजाति के हजारों लोग भाग कर पड़ोसी त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों में चले गए थे. अब तक वह लोग पोस्टल बैलट के जरिए वोट डालते थे. लेकिन यंग मिजो एसोसिएशन (वाईएमए) ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इन शरणार्थियों को मिजोरम आकर ही वोट देना होगा. कई अन्य गैर-सरकारी संगठनों ने आयोग से अपील की कि पुनर्वास पैकेज के तहत मिजोरम नहीं लौटने वाले ब्रू शरणार्थियों को मतदान का अधिकार ही नहीं दिया जाना चाहिए.

मिजोरम के ब्रू शरणार्थियों का मुद्दा राज्य के स्थानीय लोगों व संगठनों के लिए पहले से ही काफी संवेदनशील रहा है. हर चुनाव में इस मुद्दे पर गतिरोध उभरता है. लेकिन अबकी ब्रू शरणार्थियों के मतदान के सवाल पर उभरे गतिरोध के बाद स्थानीय आईएएस अधिकारी को हटाए जाने के बाद इस विवाद ने और जोर पकड़ लिया.

कौन हैं ब्रू शरणार्थी?

ब्रू पूर्वोत्तर में बसने वाला एक जनजातीय समूह है. वैसे तो इनकी छिटपुट आबादी पूरे पूर्वोत्तर में है, लेकिन मिजोरम के ज्यादातर ब्रू मामित और कोलासिब जिसे में रहते हैं. ब्रू समुदाय के अंदर तकरीबन एक दर्जन उपजातियां आती हैं. मिजोरम में ब्रू अनुसूचित जनजाति का एक समूह माना जाता है और त्रिपुरा में एक अलग जाति. लेकिन त्रिपुरा में इन्हें रियांग नाम से पुकारते हैं. इनकी भाषा भी ब्रू है.

ब्रू और बहुसंख्यक मिजो समुदाय के बीच 1996 में हुआ सांप्रदायिक दंगा इनके पलायन का कारण बना. इस तनाव ने ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट (बीएनएलएफ) और राजनीतिक संगठन ब्रू नेशनल यूनियन (बीएनयू) को जन्म दिया, जिसने राज्य के चकमा समुदाय की तरह एक स्वायत्त जिले की मांग की. इस तनाव की नींव 1995 में तब पड़ी जब यंग मिजो एसोसिएशन और मिजो स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने राज्य की चुनावी भागीदारी में ब्रू समुदाय के लोगों की मौजूदगी का विरोध किया. इन संगठनों का कहना था कि ब्रू समुदाय के लोग राज्य के नहीं है.

साल 1997 में बीएनएलएफ ने एक मिजो अधिकारी की हत्या कर दी जिसके बाद दोनों समुदाय में दंगा भड़क गया और अल्पसंख्यक होने के नाते ब्रू समुदाय को अपना घर-बार छोड़कर त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों में आश्रय लेना पड़ा.

सरकार ने कितना दिया पैकेज

3 जुलाई 2018 को नई दिल्ली में गृह मंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देव और मिजोरम के मुख्यमंत्री ललथनहवला के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. इस समझौते में 5,407 ब्रू परिवारों के 32,876 लोगों के लिए 435 करोड़ का राहत पैकेज दिया गया. इसमें हर परिवार को 4 लाख रुपये की एफडी, घर बनाने के लिए 1.5 लाख रुपये, 2 साल के लिए मुफ्त राशन और हर महीने पांच हजार रुपये दिए जाने थे. इसके अलावा त्रिपुरा से मिजोरम जाने के लिए मुफ्त ट्रांसपोर्ट, पढ़ाई के लिए एकलव्य स्कूल, डोमिसाइल (मूल निवासी) और जाति प्रमाणपत्र (एसटी) मिलने थे. ब्रू लोगों को मिज़ोरम में वोट डालने का हक भी मिलना तय हुआ था. इस समझौते के क्रियान्वयन व विस्थापितों के पुनर्वास की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय के विशेष सचिव (आन्तरिक सुरक्षा) के अंतर्गत एक कमेटी को दी गई थी.

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