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सियासत की वो पांच घटनाएं, जिनसे बड़ी हो गई बंगाल की लड़ाई

Mamata Banerjee CBI शारदा चिटफंड घोटाले में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार पर हाथ डालने की सीबीआई की कोशिश पर सबसे बड़ी सियासत जारी है. ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई हैं तो बीजेपी चुनाव आयोग पहुंच गई.

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ममता बनर्जी (AP)
ममता बनर्जी (AP)

सीबीआई दुरुपयोग के नाम पर कोलकाता में ममता दीदी की धरनागीरी जारी है. मोदी सरकार से इस तकरार के केंद्र में पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला यानी शारदा चिटफंड घोटाला है. इस घोटाले में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के नाम हैं. अब संविधान और लोकतंत्र को खतरा बताते हुए केंद्र के सामने ममता बनर्जी समेत पूरा विपक्ष है. लेकिन इस लड़ाई की असल वजह सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए सीबीआई का उपयोग नहीं है, बल्कि कई और भी कारण हैं, जिसके चलते मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सड़क से सत्ता चलाने पर उतर आई हैं.

देश की राजनीति इस समय बंगाल की लड़ाई में बदल चुकी है. शारदा चिटफंड घोटाले में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार पर हाथ डालने की सीबीआई की कोशिश पर सबसे बड़ी सियासत जारी है. ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई हैं तो बीजेपी चुनाव आयोग पहुंच गई. आज सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर फिर सुनवाई है, लेकिन इस पूरे खेल में अगर कोई एक निशाना है तो वो हैं बंगाल की 42 सीटें.

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इनमें से फिलहाल 34 टीएमसी, 4 कांग्रेस, 3 सीपीएम और 2 बीजेपी के पास हैं. अब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कह रहे हैं कि वो बीजेपी के दो को 42 में बदल देंगे और ममता बनर्जी को शून्य पर समेट देंगे. हाल ही में उन्होंने अपने बंगाल दौरे पर कहा था कि हम पश्चिम बंगाल की सारी सीटें जीतेंगे और ममता बनर्जी का सूपड़ा साफ कर देंगे. जबकि ममता बनर्जी हुंकार भर रही हैं कि पिछली बार तो दो सीट मिल गई थीं, इस बार एक भी नहीं मिलने दूंगी. बंगाल में ममता और बीजेपी का इतना फोकस इसलिए हैं, क्योंकि देश की सियासत और खासकर यूपी के समीकरण फिलहाल बदल गए हैं.

बंगाल में लड़ाई के पीछे ये पांच बड़ी घटनाएं

1. यूपी में मायवती-अखिलेश का गठबंधन

2. प्रियंका गांधी का राजनीति में उतरना

3. तीन राज्यों में बीजेपी की हार

4. एनडीए के साझीदारों में मची भगदड़

5. बीजेपी के खिलाफ बनता हुआ मोर्चा

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सबसे ज्यादा 71 सीटें यूपी से मिली थीं, जिसके चलते नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में एक मजबूत सरकार चलाने का मौका मिला. अब यूपी की दो बड़े मजबूत दलों यानी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का विलय हो गया है. हालांकि, इन दोनों दलों को पिछले चुनाव में कुल मिलाकर 5 सीटें मिली थीं और उसमें भी बीएसपी जीरो थी, लेकिन दोनों पार्टियों को मिलाकर कुल 42.1 प्रतिशत वोट शेयर रहा था. जबकि सत्ताधारी बीजेपी को 42.6 प्रतिशत वोट मिले थे. अब सपा-बसपा का गठजोड़ होने से खासकर दलित-यादव और मुस्लिम वोट एक मंच पर आने की उम्मीद लगाए सपा-बसपा यूपी में क्लीन स्वीप करने के दावे कर रहे हैं. यह बीजेपी के लिए एक बड़ी चिंता भी है.

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कांग्रेस ने प्रियंका गांधी वाड्रा को राजनीति में उतार दिया है, जिसे बड़ा दांव माना जा रहा है. उन्हें विशेष तौर पर पूर्वी यूपी का प्रभार दिया गया है, जहां कांग्रेस अतीत में अच्छा प्रदर्शन करती रही है. ऐसे में ये भी कहा जा रहा है कि प्रियंका के आने से बीजेपी को पूर्वांचल में बड़ी चुनौती मिल सकती है, जिससे यहां की 40 के करीब सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं.

हाल ही में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की हार से कांग्रेस लोकसभा चुनाव से पहले बड़ी ताकत मिली है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के चुनावी वादे के मुताबिक, इन तीनों राज्यों में कांग्रेस ने सत्ता संभालते ही किसानों के कर्ज माफ करने का भी फैसला ले लिया है. अब राहुल पूरे देश में इस फॉर्मूले को आजमाने का प्रयास कर रहे हैं.

मोदी सरकार के खिलाफ जहां बड़े क्षेत्रीय दल एक मंच पर आ रहे हैं और मिलकर बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के दावे कर रहे हैं. वहीं, मोदी सरकार में सहयोगी रहे दल ही उनकी तरफ आंख तरेर रहे हैं. यूपी में राजभर और अपना दल लगातार बागी अंदाज दिखा रहे हैं. महाराष्ट्र में शिवसेना भी अपनी शर्तों पर साथ रहने का दंभ भर रही है.

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जबकि दूसरी तरफ बीजेपी विरोधी दल अपने-अपने राज्यों के हिसाब से एक साथ चुनाव लड़ने की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं. यूपी और बिहार में यह फॉर्मूला तय हो चुका है. कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी को निराश कर चुके हैं. साथ ही दक्षिण की राजनीति में भी बीजेपी को मजबूत सहयोगी नहीं मिलें हैं.

ऐसे में देश के बदल रहे सियासी हालात और उत्तर भारत में महागठबंधन के असर की पूर्ति के लिए बीजेपी की बंगाल और ओडिशा पर पैनी नजर है.

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