बंगाल चुनाव सर्वेक्षकों (Pollsters) के लिए बुरे सपने से कम नहीं तो वहीं गुजरात उनके काम के लिए सबसे आसान राज्य है. ये कहना है एक्सिस माई इंडिया के अग्रणी सर्वेक्षक प्रदीप गुप्ता का. गुप्ता ने ये टिप्पणी तब की जब उनसे 2019 आम चुनाव के लिए भारत के लोगों के मन की थाह लेने के लिए की गई सबसे बड़ी कवायद के बारे में पूछा गया.
19 मई को आखिरी चरण का मतदान संपन्न होने के साथ ही इंडिया टुडे टीवी पर एक्सिस माई इंडिया पोस्ट पोल सर्वे के आंकड़े दिखाने शुरू किए जाएंगे. 542 निर्वाचन क्षेत्रों में 7 लाख से अधिक प्रतिभागियों का सर्वे किए जाने के पीछे कितनी मेहनत की गई होगी, इसका अंदाज़ ही लगाया जा सकता है.
गुप्ता ने इंडिया टुडे को बताया कि भारत के विभिन्नताओं वाले राज्यों में प्रतिभागियों का सर्वे बड़ी चुनौती था. मुश्किलों का स्तर राज्य दर राज्य कितना था, इसका आकलन कई पैमानों के आधार पर किया गया.
डर के साए में
गुप्ता ने बताया कि बंगाल में इस बार सर्वे करना बहुत मुश्किल था और यहां सर्वे की चुनौती 2014 से ज़्यादा मुश्किल थी. इसका कारण उन्होंने कानून और व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को बताया. गुप्ता ने कहा, “जब हम कोशिश करते हैं और लोगों से बात करते हैं, वो अतिरेक वाली प्रतिक्रिया देते और हमें शक की निगाह से देखते. उनकी सोच इस तरह की लगती जैसे कि वो मानते हो कि हमें बीजेपी या कांग्रेस ने भेजा है क्योंकि वहां तृणमूल कांग्रेस सत्तारूढ़ पार्टी है.”
गुप्ता के मुताबिक बंगाल में वो ‘मौन वोटर’ से मिले. गुप्ता ने बताया कि ये वोटर वो नहीं जिसकी मीडिया बात करता है. गुप्ता कहते हैं कि मीडिया की शब्दावली में जिस वोटर तक मीडिया पहुंच नहीं पाता वो ‘मौन वोटर’ होता है.
गुप्ता ने कहा, “बंगाल में ये फियर-फैक्टर (डर की आशंका) था जिसे हमने अपने अंतिम विश्लेषण में शामिल किया. लोग अपनी राजनीतिक पसंद नहीं बता रहे हैं. किसी खास पार्टी के वफ़ादार लोग मौन रहना पसंद कर रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि ‘दूसरे’ उन्हें पीटेंगे.”
गुप्ता ने कहा, “ये दिलचस्प है कि बीजेपी के वोटर सिवाए बंगाल के हर जगह अपनी राजनीतिक पसंद को बताने के लिए बड़े उत्साहित दिखे. जबकि बंगाल में इसका उलटा दिखा. तृणमूल को वोट करने वाले यहां मुखर दिखे. लेकिन गैर टीएमसी पार्टियों के वोटरों ने मौन रहना ही पसंद किया.”
हालांकि एक्सिस माई इंडिया उन वोटरों तक पहुंचने तक में कामयाब रहा जो सर्वेक्षकों की तलाश में थे जिनके सामने वो अपनी राजनीतिक पसंद को व्यक्त कर सकें.
भौगोलिक बाधाएं
मुश्किलों के स्तर की बात की जाए तो भौगोलिक बाधाओं की दृष्टि से कर्नाटक और मध्य प्रदेश के नाम सबसे ऊपर आते हैं. गुप्ता कहते हैं, “मध्य प्रदेश और कर्नाटक बड़े राज्य हैं, यहां एक जगह से दूसरे जगह पहुंचने में अधिक वक्त लगता है.”
पूर्वोत्तर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे पवर्वतीय राज्य यात्रा के हिसाब से कठिन हैं. गुप्ता कहते हैं, “सामान्य स्थिति में 20 किलोमीटर का क्षेत्र कवर करने के लिए आम तौर पर 25-30 मिनट लगते हैं. लेकिन पर्वतीय राज्यों में यही समय दो घंटे हो जाता है.”
अगर स्थानीय मानव संसाधनों की बात की जाए तो केरल और ओडिशा भी चुनाव सर्वेक्षकों के लिए बड़ी मुश्किल वाले हैं. गुप्ता कहते हैं, “ये अहम है कि आप के पास ऐसे लोग हों जो ना सिर्फ स्थानीय भाषा को समझते हों बल्कि आंचलिक बोली में स्थानीय प्रतिभागियों से आसानी से बातचीत कर सकें. ऐसी स्थिति में ही प्रतिभागी हमसे जुड़ पाते हैं और तथ्य बताने को तैयार होते हैं. अगर इस पर ध्यान ना दिया जाए तो केरल और ओडिशा में काम कर पाना नामुमकिन है.”

मौसम की मुश्किलें
जब भरी गर्मी में चुनाव इतने चरणों में फैला हो तो कैसे मौसम की मुश्किलों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है. गुप्ता के मुताबिक इस मामले में सबसे विकट स्थिति वाला राज्य उत्तर प्रदेश है.
गुप्ता से जब पूछा गया कि सर्वे के लिए सबसे आसान राज्य कौन सा है तो उन्होंने झट से ‘गुजरात’ का नाम लिया. गुप्ता ने कहा, “वहां संपर्क करना आसान है, भौगोलिक या प्रशासनिक बाधाएं नहीं हैं. लोग ज़्यादा मदद करने वाले हैं. वो सरल हैं इसलिए बात करने से मना नहीं करते हैं.” हालांकि गुप्ता ने साथ ही जोड़ा कि गुजरात में महिलाओं से बात करना मुश्किल है.
कनवर्ज़न दर
कनवर्ज़न दर के क्या मायने? इसके मायने ये है कि किसी सर्वेक्षक को अपनी स्टडी के तहत हर दस दरवाजों पर जाने पर कितनी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिलती हैं. मेट्रो शहरों में कनवर्ज़न दर जहां 10 में से 6 रहती है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में ये 10 में से 8 है. लेकिन गुजरात इस मामले में अलग दिखा . यहां क्षेत्र शहरी हो या ग्रामीण कनवर्ज़न दर 10 में से 8-9 रही.
एक्सिस माई इंडिया ने मध्य प्रदेश को सर्वे के लिहाज़ से अच्छा राज्य बताया. गुप्ता ने कहा, मध्य प्रदेश में प्रतिभागियों में भय जैसी कोई बात नहीं दिखी. उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में भी डर का फैक्टर दिखा क्यों वहां चार अहम पार्टियां हैं, दो राष्ट्रीय और दो क्षेत्रीय दल. प्रतिभागी हमेशा यही सोचते हैं कि किसी और पार्टी ने भेजा है. इसलिए वो अपनी राजनीतिक पसंद बताने में हिचकते हैं.
जाति और धर्म के समीकरण
जब ज़मीनी स्तर पर जाति और धार्मिक समीकरणों को भी मद्देनज़र लिया जाए तो सर्वे की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण हो जाती है. गुप्ता कहते हैं, “अगर आप हिन्दू हैं और किसी मुस्लिम का सर्वे कर रहे हैं तो वो आपको दूसरे नज़रिए से देखेगा. इसी तरह एक मुस्लिम अगर ब्राह्मण प्रतिभागी से बात करता है तो वो प्रतिभागी अलग तरीके से बात करेगा.”
आखिर में अग्रणी सर्वेक्षक गुप्ता ने NOTA को लेकर अहम टिप्पणी की. गुप्ता ने कहा, “NOTA इस चुनाव में फैक्टर होगा. 2014 में 60 लाख लोगों ने NOTA पर बटन दबाया था, इस बार ये संख्या ज़्यादा हो सकती है.”
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