scorecardresearch
 

बहराइचः सावित्री के बागी तेवर के बाद क्या बीजेपी की राह होगी आसान

बहराइच भी उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहरों में गिना जाता है. कई पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह धरती भगवान ब्रह्मा की राजधानी, ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में प्रसिद्ध थी. इसे गंधर्व वन के हिस्से के रूप में भी जाना जाता था. ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने यहां के वन क्षेत्र को ऋषियों और साधुओं की पूजा और तपस्या के लिए विकसित किया था.

Advertisement
X
बीजेपी की बागी सांसद सावित्री बाई फुले (फाइल-FB)
बीजेपी की बागी सांसद सावित्री बाई फुले (फाइल-FB)

बहराइच संसदीय सीट उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों में और प्रदेश के 17 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में से एक है और यह 56वें नंबर की सीट है. यह क्षेत्र महान स्वतंत्रता सेनानी रफी अहमद किदवई की जन्म और कर्मस्थली के रूप में जाना जाता है. पंडित जवाहर लाल नेहरू के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल 2 मुस्लिम नेताओं में अबुल कलाम आजाद के अलावा अहमद भी शामिल थे.

बहराइच भी उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहरों में गिना जाता है. कई पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह धरती भगवान ब्रह्मा की राजधानी, ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में प्रसिद्ध थी. इसे गंधर्व वन के हिस्से के रूप में भी जाना जाता था. ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने यहां के वन क्षेत्र को ऋषियों और साधुओं की पूजा और तपस्या के लिए विकसित किया था. इसलिए इसे 'ब्रह्माच' भी कहा जाता है. महाराजा जनक के गुरु ऋषि अष्टावक्र यहीं पर रहते थे. ऋषि वाल्मिकी का भी संबंध इस क्षेत्र से रहा है.

Advertisement

कुछ अन्य इतिहासकारों का मानना है कि मध्ययुगीन काल में यह जगह 'भर' राजवंश की राजधानी के रूप में विख्यात थी. इसलिए इसे 'भारिच' भी कहा गया जो आगे चलकर 'बहराइच' के रूप में चर्चित हो गया. महाभारत काल में निर्वासन की अवधि के दौरान पांडव ने अपनी मां कुंती के साथ इस जगह का दौरा किया था. महान चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाह्यान ने भी अपने संस्मरण में इस जगह का जिक्र किया. प्रसिद्ध अरब यात्री इब्नबतुता ने बहराइच के बारे में लिखा था कि बहराइच एक सुंदर शहर है, जो पवित्र नदी सरयू के किनारे बसा हुआ है.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

रफी अहमद किदवई के कारण इस क्षेत्र की खास पहचान है. अहमद की गिनती पंडित नेहरू के बेहद करीबियों में होती थी और उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया. आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव में बहराइच लोकसभा सीट पर रफी अहमद ने जीत हासिल करते हुए यहां से पहले सांसद बनने का गौरव हासिल किया.

1957 में कांग्रेस के ही जोगिंदर सिंह दूसरे सांसद बने. 1962 में कांग्रेस ने यह सीट स्वतंत्र पार्टी के हाथों गंवा दी. इसके बाद 1967 में जनसंघ ने भी जीत हासिल की. 1971 में कांग्रेस ने फिर यहां जीत हासिल की, लेकिन 1997 में भारतीय लोकदल ने मैदान मार लिया. 1980 में यह सीट फिर कांग्रेस के खाते में आई और 1984 में आरिफ मोहम्मद खान चुनाव जीतने में कामयाब रहे. लेकिन इस बीच प्रधानमंत्री राजीव गांधी से उनका मतभेद होने के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दिया और जनता दल के टिकट पर 1989 का चुनाव जीता.

Advertisement

1991 के बाद बीजेपी ने यहां पर जीत का खाता खोला और 2014 तक 4 बार यहां से जीत हासिल की. इस बीच एक-एक बार सपा-बसपा के खाते में भी यह सीट गई. हालांकि 2009 में कांग्रेस ने फिर से वापसी की और कमल किशोर के रूप में यहां से जीत हासिल की. लेकिन 2014 में बीजेपी ने सावित्री बाई फुले के रूप में फिर से कब्जा जमा लिया.

सामाजिक ताना-बाना

2011 की जनगणना के अनुसार, बहराइच जिले की कुल आबादी 34.9 लाख है जिसमें 18.4 लाख (53%) पुरुष और 16.4 लाख (47%) महिलाओं की आबादी है. इसमें से 85% आबादी सामान्य वर्ग की और 15 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की है.

धर्म आधारित आबादी पर नजर डाली जाए तो 66% लोग हिंदू और 34% मुस्लिम समुदाय से आते हैं. लिंगानुपात के आधार पर प्रति हजार पुरुषों पर 892 महिलाएं हैं. इस जिले की साक्षरता दर बेहद दयनीय है और यहां की आधी से कम आबादी ही साक्षर है. 49% साक्षर आबादी में पुरुषों की 58% पुरुष और 39% महिलाओं की आबादी साक्षर है.

बहराइच जिले में 5 विधानसभा क्षेत्र (बल्हा, नानपारा, मटेरा, महासी और बहराइच) आते हैं, जिसमें बल्हा विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. इन 5 सीटों पर एक पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है, जबकि शेष 4 पर बीजेपी की पकड़ है.

Advertisement

बल्हा विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के अक्षयवरलाल विधायक हैं जिन्होंने बसपा के किरण भारती को 46,616 मतों से हराया जबकि नानपारा से बीजेपी की माधुरी वर्मा ने कांग्रेस के वारिस अली को 18,669 मतों के अंतर से हराया था. मटेरा विधानसभा समाजवादी पार्टी के यासर शाह ने बीजेपी के अरुणवीर सिंह को कड़े मुकाबले में 1,595 मतों के अंतर से हराया था.

महासी  विधानसभा सीट पर बीजेपी का कब्जा है जहां से उसके उम्मीदवार सुरेश्वर सिंह ने कांग्रेस के अली अकबर को 58,969 मतों से हराया था. वहीं बहराइच विधानसभा सीट से बीजेपी की अनुपमा जयसवाल ने सपा की रुबाब सैयदा को 6,702 मतों के अंतर से हराया था.

2014 का जनादेश

2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने यहां से जीत हासिल की थी. तब इस संसदीय क्षेत्र में कुल 16,38,645 मतदाता थे जिसमें 8,82,776 पुरुष और 7,55,869 महिला मतदाता थीं. इनमें से 9,34,263 (57.0%) लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया जिसमें 13,498 (0.8%) लोगों ने नोटा के पक्ष में वोट किया.

बहराइच लोकसभा सीट पर 10 उम्मीदवारों ने अपनी चुनौती पेश की जिसमें मुख्य मुकाबला बीजेपी की सावित्री बाई फुले और समाजवादी पार्टी के शब्बीर अहमद के बीच रहा. सावित्री बाई फुले ने 4,32,392 (46.3%) और शब्बीर अहमद ने 3,36,747 (36.0%) वोट हासिल किए. इस आधार पर फुले ने यह चुनाव 95,645 (10.2%) मतों के अंतर से जीत लिया.

Advertisement

बसपा के डॉक्टर विजय कुमार तीसरे स्थान पर रहे जबकि कांग्रेस के कमांडो कमल किशोर चौथे स्थान पर रहे. आम आदमी पार्टी यहां पांचवें नंबर पर रही.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

इस सुरक्षित सीट से सांसद सावित्री बाई फुले एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उन्होंने बीए की डिग्री हासिल की है. 2014 में वह पहली बार लोकसभा में पहुंचीं. वह केमिकल एंड फर्टिलाइजर्स की स्टैंडिंग कमिटी की सदस्य हैं.

जहां तक 38 साल की सांसद फुले की संसद में उपस्थिति का सवाल है तो 8 जनवरी, 2019 तक उनकी उपस्थिति राष्ट्रीय (80 फीसदी) और राज्य औसत (87 फीसदी) से काफी कम 72 फीसदी रही. उन्होंने महज 37 बहस में हिस्सा लिया जबकि राष्ट्रीय औसत (65.3) और राज्य औसत (107.2) से बेहद कम है.

सवाल पूछने के मामले में उनका प्रदर्शन निराशाजनक रहा है और उन्होंने महज 19 सवाल पूछे हैं. फुले ने एक भी प्राइवेट मेंबर्स बिल पेश नहीं किया है.

बीजेपी की ओर से सावित्री बाई फुले ने पिछले चुनाव में जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार चुनाव से कुछ महीने उन्होंने बगावती तेवर दिखाते हुए पार्टी छोड़ दी है. ऐसे में बीजेपी को यहां से नए चेहरे की तलाश करनी होगी. उसके लिए यह कोशिश आसान नहीं दिख रही क्योंकि सपा-बसपा गठबंधन के बाद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट को बचा पाना बेहद कठिन दिख रहा. देखना होगा कि प्रियंका गांधी के कांग्रेस में शामिल होने के बाद मुकाबाल त्रिकोणीय हो गया है. अब सबकी नजर यहां के मुकाबले पर रहेगी.

Advertisement

Advertisement
Advertisement