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क्या हार के खतरे से बचने के लिए नड्डा की जगह BJP ने लगाया धूमल पर दांव?

हालांकि राज्य के जातिगत समीकरणों को देखें तो धूमल को लेकर बीजेपी के ऐलान में हैरान करने वाली कोई बात नहीं है. नड्डा की तुलना में धूमल जातिगत समीकरणों के लिहाज से कहीं ज्यादा मजबूत प्रत्याशी नजर आते हैं.

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केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा
केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा

हिमाचल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने ऐन वक्त पर प्रेम कुमार धूमल को सीएम कैंडिडेट घोषित कर दिया है. बीजेपी के इस ऐलान से पार्टी के दिग्गज नेता और मोदी सरकार में मंत्री जे पी नड्डा के समर्थकों को झटका लगा है. पिछले कुछ साल से नड्डा पर जिस तरह पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भरोसा जताया है उसे देखते हुए इस दिग्गज को हिमाचल चुनाव में सीएम पद का स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा था. हालांकि राज्य के जातिगत समीकरणों को देखें तो धूमल को लेकर बीजेपी के ऐलान में हैरान करने वाली कोई बात नहीं है. नड्डा की तुलना में धूमल जातिगत समीकरणों के लिहाज से कहीं ज्यादा मजबूत प्रत्याशी नजर आते हैं.

हिमाचल में राजपूत किंग मेकर

हिमाचल प्रदेश की सियासत में राजपूत समुदाय सबसे अहम है. राज्य में सबसे ज्यादा करीब 37 फीसदी राजपूत मतदाता हैं. 18 फीसदी ब्राह्मण इसके बाद आते हैं. प्रेम कुमार धूमल राजपूत समुदाय से आते हैं तो वहीं जेपी नड्डा ब्राह्मण हैं. इस तरह देखा जाए तो धूमल का वोट बैंक नड्डा से दोगुने से भी ज्यादा है. ऐसे में ब्राह्मण पर दांव खेलकर बीजेपी राजपूतों को नाराज नहीं करना चाहती थी.

वैसे भी कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा वीरभद्र सिंह हैं, जो राजपूत समुदाय से ही हैं. ऐसे में राजपूत मतदाता कांग्रेस के खेमे में जाने की आशंका थी जिसके चलते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने आनन-फानन में वोटिंग के महज 10 दिन पहले राजपूत नेता प्रेम कुमार धूमल को सीएम कैंडिडेट बना दिया.

मोदी की पसंद माने जा रहे थे नड्डा

धूमल के नाम के ऐलान से सबसे ज्यादा झटका जेपी नड्डा खेमे को लगा है. बीजेपी आलाकमान जिस तरह से पिछले दो साल से नड्डा को राज्य में प्रोजेक्ट कर रहा था और उन्हें जिम्मेदारियां दे रहा था, उसे देखते हुए नड्डा समर्थक अपने नेता को सीएम पद का स्वाभाविक उम्मीदवार मान रहे थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की हिमाचल में होने वाली रैलियों की जिम्मेदारी खासतौर पर जेपी नड्डा को दी गईं. लेकिन चुनावी पारा जब अपने पूरे उफान पर पहुंचा तो धूमल पर दांव खेल दिया गया.

हिमाचल का सियासी समीकरण

हिमाचल प्रदेश में कुल 68 विधानसभा सीटे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य की 68 सीटों में से कांग्रेस को 36, बीजेपी को 26 तो अन्य को 6 सीटें मिली थीं. कांग्रेस को 2007 की तुलना में 2012 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटों का फायदा हुआ था, वहीं बीजेपी को 2007 की तुलना में 2012 में 16 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था.

2012 विधानसभा चुनाव में मिले वोटों पर नजर डालें तो कांग्रेस को 43 फीसदी और बीजेपी को 39 फीसदी वोट मिले थे. 2007 की तुलना में कांग्रेस का वोट 5 फीसदी बढ़ा जबकि बीजेपी को 5 फीसदी वोट का नुकसान उठाना पड़ा. बीजेपी महज 4 फीसदी वोटों से कांग्रेस से पीछे रही लेकिन कांग्रेस की तुलना में उसे 10 सीटें कम मिलीं.

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