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बिहार का चुनावी रणः पिता की गैरमौजूदगी में उतरेंगे तेजस्वी और चिराग, किसका पलड़ा भारी ?

इस बार बिहार के चुनावी बिसात पर सियासत के दो कद्दावर नेताओं की गैरमौजूदगी में अपने पार्टी को जीत दिलाने की जिम्मेदारी उनके बेटों पर है. बात यहां पर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद और लोक जनशक्ति पार्टी सुप्रीमो रामविलास पासवान की हो रही है.

तेजस्वी यादव-चिराग पासवान (फाइल फोटो) तेजस्वी यादव-चिराग पासवान (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • प्रदेश में सियासी हवा और तेजी से बहने लगी है
  • 2 कद्दावर नेताओं की गैरमौजूदगी में होगा चुनाव
  • जेल में हैं लालू, रामविलास का चल रहा है इलाज

बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही अब प्रदेश में सियासी हवा और तेजी से बहने लगी है. मुख्य तौर पर चुनाव में इस बार मुकाबला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन में है.

हालांकि, इस बार बिहार की चुनावी बिसात पर सियासत के दो कद्दावर नेताओं की गैरमौजूदगी में अपनी पार्टी को जीत दिलाने की जिम्मेदारी उनके बेटों पर है. बात यहां आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद और लोक जनशक्ति पार्टी सुप्रीमो रामविलास पासवान की हो रही है.

चारा घोटाले में दोषी करार दिए जाने के बाद दिसंबर 2017 से 72 वर्षीय आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद रांची जेल में बंद हैं. इसकी वजह से लालू यादव 2019 लोकसभा चुनाव में भी हिस्सा नहीं ले पाए थे. 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में भी लालू गैर मौजूद रहेंगे, यह बात भी स्पष्ट है.

दूसरी तरफ, केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान पिछले कुछ हफ्तों से बीमार चल रहे हैं. बीमार होने के कारण 74 वर्षीय रामविलास पासवान फिलहाल दिल्ली के एक निजी अस्पताल में आईसीयू में भर्ती हैं, जहां पर उनका इलाज चल रहा है.

बिहार के सियासत के यह दो बड़े चेहरे लालू प्रसाद और रामविलास पासवान 2020 विधानसभा चुनाव से गायब रहेंगे, ऐसा पहली बार हो रहा है. 2015 बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान लालू और रामविलास पासवान पूरी तरीके से सक्रिय थे. लालू ने तो 2015 बिहार विधानसभा चुनाव की बाजी ही पलट कर रख दी थी जब उन्होंने अपने दम पर महागठबंधन को जीत दिलाई थी.

किसका पलड़ा भारी होगा?

हालांकि, विधानसभा चुनाव में ऐसा पहली बार हो रहा है जब लालू और रामविलास पासवान की गैरमौजूदगी में उनके बेटे तेजस्वी और चिराग पार्टी का नेतृत्व करेंगे और अपने दल को चुनाव  में जीत दिलाने की पूरी जिम्मेदारी भी इन्हीं दोनों के कंधे पर होगी. ऐसे में यह देखना भी है दिलचस्प होगा कि चुनावों में जब बिहार के यह दो युवा नेता आमने सामने होंगे तो फिर किसका पलड़ा भारी होगा ?

बात सबसे पहले तेजस्वी यादव की करते हैं. तेजस्वी 2015 विधानसभा चुनाव में पहली बार विधायक बने, जिसके बाद उन्हें नीतीश कुमार सरकार में उपमुख्यमंत्री का पद भी दिया गया. 2015 से 2017 के बीच में लालू की छत्रछाया में तेजस्वी ने सियासत में पैर जमाने की शुरुआत की, मगर दिसंबर 2017 में लालू के जेल जाने के तुरंत बाद पार्टी की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई जिसको तेजस्वी पिछले 3 सालों से निभा रहे हैं. इस दौरान पार्टी के अन्य बड़े नेताओं ने भी तेजस्वी के नेतृत्व को स्वीकार किया.

हालांकि, तेजस्वी की पहली अग्नि परीक्षा 2019 लोकसभा चुनाव में हुई जब ना केवल अपनी पार्टी आरजेडी बल्कि महागठबंधन का भी नेतृत्व उन्होंने किया, जिसमें उन्हें पूरी तरीके से हार का सामना करना पड़ा.

क्या है तेजस्वी के पक्ष में?

2019 लोकसभा चुनाव में आरजेडी के सभी 20 उम्मीदवार बुरी तरीके से हार गए और महागठबंधन केवल एक सीट पर जीत हासिल कर पाया, लेकिन इन सब के बावजूद भी एक चीज जो तेजस्वी यादव के पक्ष में है वो है आरजेडी का परंपरागत वोट बैंक (मुस्लिम 17%, यादव 14%). लालू ने इसी जातिगत समीकरण के बदौलत 1990 से 2005 तक बिहार पर राज किया.

2005 के बाद जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो मुसलमानों ने उन पर भरोसा जताना शुरू किया. बीजेपी के साथ गठबंधन होने के बावजूद भी मुस्लिम वोट बैंक ने नीतीश कुमार को समर्थन देना शुरू किया, जिसका फायदा नीतीश को 2010 विधानसभा चुनाव में भी मिला जब जनता दल यूनाइटेड और बीजेपी गठबंधन को 243 में से 206 सीटों पर जीत हासिल हुई.

2015 में लालू और नीतीश के एक साथ आ जाने के बाद मुस्लिम वोटरों ने जमकर महागठबंधन को वोट दिया जिसकी वजह से बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. नीतीश के लिए मुश्किल की घड़ी 2017 में शुरू हुई जब उन्होंने लालू से गठबंधन तोड़ कर दोबारा बीजेपी के साथ गठबंधन किया और एक बार फिर से मुख्यमंत्री बने.

मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव किधर है?

बिहार के मुस्लिम मतदाताओं को नीतीश कुमार का यह कदम नागवार गुजरा. मुस्लिम वोटर इस बात पर बेहद नाराज हुए कि नीतीश ने लालू का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ फिर गठबंधन कर दिया. पिछले 3 सालों में यह बात अब स्पष्ट हो गई है कि बिहार में मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव एक बार फिर आरजेडी के तरफ हो गया है. इसके साथ यादव मतदाता हमेशा से ही लालू के पक्ष में खड़े रहे हैं.

यानी कुल मिलाकर बात की जाए तो लालू प्रसाद द्वारा बनाए गए MY समीकरण की विरासत तेजस्वी यादव को बैठे-बिठाए मिल चुकी है. यह बात भी लगभग स्पष्ट है कि आगामी विधानसभा चुनाव में मुस्लिम और यादव एकमुश्त आरजेडी को वोट करेंगे जो बात तेजस्वी यादव के पक्ष में जाती है. मुस्लिम और यादव को जोड़कर लालू प्रसाद ने जो अपने लिए वोट बैंक तैयार किया था वह बिना किसी मेहनत के तेजस्वी को मिल चुका है. 

छत्रछाया से बाहर नहीं निकल पाए चिराग

वहीं. अगर चिराग पासवान की बात की जाए तो वह अब तक अपने पिता रामविलास पासवान की छत्रछाया से बाहर नहीं निकल पाए हैं. 2020 बिहार विधानसभा चुनाव चिराग के लिए अपने आप को साबित करने का पहला मौका होगा जहां पर लोक जनशक्ति पार्टी की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होगी.

रामविलास पासवान पिछले 50 सालों से बिहार और देश की राजनीति के एक बड़े चेहरे हैं. सीनियर पासवान बिहार में दलितों के सबसे कद्दावर चेहरे माने जाते हैं. वोट बैंक की बात करें तो बिहार में तकरीबन 22% दलित वोट बैंक है जिसमें से 6% पासवान है जिस पर रामविलास पासवान का पूरा कंट्रोल माना जाता है.

6% पासवान वोट बैंक है

6% पासवान वोट बैंक को अगर एक तरफ रख दिया जाए तो बाकी दलित वोट बैंक नीतीश कुमार के लिए वोट करती है. ऐसे में चिराग पासवान के लिए मुश्किल यह है कि पिता के जूते में अपने आप को फिट कर पाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है. तेजस्वी की तरह चिराग पासवान के पास विरासत में मिली तकरीबन 31% का एकमुश्त वोट बैंक नहीं है जिसका फायदा उन्हें मिल पाए.

राजनीतिक जानकार अभय मोहन झा ने कहा 'तेजस्वी यादव की सबसे बड़ी ताकत है उनकी पार्टी संगठन का पूरे बिहार में मौजूद होना. चिराग पासवान के साथ ऐसा नहीं है. लोक जनशक्ति पार्टी के पास कोई मजबूत संगठन नहीं है. अपने अपने पिता की गैरमौजूदगी चिराग और तेजस्वी के लिए सबसे बड़ी कमजोरी है मगर यह इन दोनों के लिए सबसे बड़ा मौका भी है अपने आप को साबित करने का.' 

वहीं, राष्ट्रीय जनता दल प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी का भी मानना है कि लोकप्रियता और जनाधार के मामले में तेजस्वी यादव चिराग से बहुत आगे निकल चुके हैं. मृत्युंजय तिवारी मानते हैं कि बिहार की जनता को ऐसा लगता है कि तेजस्वी प्रदेश को नेतृत्व दे सकते हैं.

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