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क्या नीतीश कुमार बीजेपी के कंधे पर सवार हो कर पार लगा लेंगे चुनावी नैया?

इस बार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के लिए लड़ाई इतनी आसान नहीं है. नीतीश को इस बार चुनावी वैतरणी पार करने के लिए बीजेपी के कंधे की जितनी जरूरत महसूस हो रही, इतनी पहले कभी महसूस नहीं हुई. 

पीएम मोदी के साथ साझा रैली के दौरान नीतीश कुमार (पीटीआई) पीएम मोदी के साथ साझा रैली के दौरान नीतीश कुमार (पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 15 साल में पहली बार असहज दिख रहे नीतीश कुमार
  • सुशासन बाबू की छवि 2015 के बाद से लगातार गिर रही
  • कोरोना संकट, प्रवासी मजदूरों की समस्या दूर करने में नाकामी

बिहार में पहले चरण के मतदान में अब चार दिन का ही वक्त बचा है. पहले चरण में 28 अक्टूबर को राज्य के 16 जिलों की 71 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे. ऐसे में अब हर सियासी दल प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बिहार में चुनावी रैलियों का दौर शुक्रवार से शुरू हो गया. सासाराम में हुई पीएम मोदी की पहली रैली में मुख्यमंत्री और जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार भी मंच पर मौजूद थे. वहीं कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने आरजेडी के युवा नेता तेजस्वी यादव के साथ नवादा की रैली में महागठबंधन की ओर से मिलकर चुनावी हुंकार भरी. 

सुशासन बाबू की मुश्किलें 

जाहिर है बिहार चुनाव में अब हर दिन सियासी पारा लम्बी-लम्बी छलांग लगा रहा है. विधानसभा चुनाव में इस बार मुकाबला एनडीए और आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन के बीच है. एनडीए की तरफ से नीतीश मुख्यमंत्री के तौर पर एक और कार्यकाल की उम्मीद के साथ मैदान में हैं. वहीं 30 साल के तेजस्वी विपक्षी गठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा हैं. पंद्रह साल से नीतीश राज्य के मुख्यमंत्री हैं. ऐसा पहली बार देखा जा रहा है कि नीतीश कुमार  को लेकर लोग नाराजगी खुले तौर पर व्यक्त कर रहे हैं. ‘सुशासन बाबू’ यानि नीतीश कुमार चुनावी रण में जितना असहज इस बार नजर आ रहे हैं, इतना पिछले तीन विधानसभा चुनाव में कभी नजर नहीं आए. नीतीश कुमार का चूका हुआ नेता बता कर जहां तेजस्वी तंज कस रहे हैं, वहीं बेरोजगारी जैसे सवालों को लेकर आम लोग भी सवाल उठा रहे हैं. 

नीतीश ने 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव एनडीए के सहयोगी के तौर पर लड़कर विजय पाई. 2015 में उन्होंने पाला बदल कर आरजेडी और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में सफल रहे. ये बात दूसरी है कि कार्यकाल के बीच में ही नीतीश ने आरजेडी-कांग्रेस का साथ छोड़ फिर एनडीए का दामन थाम लिया. उसके बाद 2019 लोकसभा चुनाव में एनडीए ने बिहार में शानदार कामयाबी पाई और विपक्ष का लगभग सूपड़ा साफ कर दिया. विधानसभा चुनाव नीतीश ने चाहे एनडीए के साथ मिलकर लड़ा या आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन के साथ, वे हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रहे. 

नीतीश को चुनावी नैया पार लगाने के लिए बीजेपी के कंधे की ज़रूरत 

लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में नीतीश के लिए लड़ाई इतनी आसान नहीं है. नीतीश को इस बार चुनावी वैतरणी पार करने के लिए बीजेपी के कंधे की जितनी जरूरत महसूस हो रही, इतनी पहले कभी महसूस नहीं हुई. 

नीतीश कुमार की राह में एनडीए में उनकी पुरानी सहयोगी रही पार्टी लोकजनशक्ति (एलजेपी) ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. एलजेपी के संस्थापक राम विलास पासवान के निधन के बाद उनके पुत्र चिराग पासवान पार्टी के सर्वेसर्वा हैं. चिराग का नीतीश कुमार से बैर कोई छुपी बात नहीं है. चिराग ने जहां नीतीश को अपने दिवंगत पिता का कथित अपमान करने के लिए कटघरे में खड़ा किया. साथ ही नीतीश की सुशासन बाबू वाली छवि पर अनेक सवाल उठाकर उन्हें नाकाम मुख्यमंत्री का तगमा दे दिया.चिराग का हमेशा बीजेपी पर जोर रहा कि वो नीतीश कुमार से गठबंधन तोड़ कर अकेले बूते पर बिहार चुनाव लड़े. लेकिन बीजेपी ने चिराग की बात नहीं मानी. ऐसे में एलजेपी खुद के बूते पर ही ये चुनाव लड़ रही है. ऐसी संभावना है कि एलजेपी कई सीटों पर नीतीश कुमार के उम्मीदवारों की संभावनाओं को चोट पहुंचा सकती है.

नीतीश कुमार की सुशासन वाली पारदर्शी छवि पर 2015 के बाद से सवाल उठने शुरू हुए जब उन्होंने आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन सरकार बनाई. महागठबंधन में विपरीत धुरों के एक साथ आने का असर जल्दी ही दिखना शुरू हो गया. 2017 आते आते तनाव इतना बढ़ गया कि नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद उन्होंने फिर एनडीए में वापसी कर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई. इसके बाद भी नीतीश के लिए दिक्कतें पेश आती रहीं.

मुज़फ़्फ़रपुर की होमशेल्टर की घटना ने नीतीश कुमार की गुड गवर्नेंस की छवि को काफी चोट पहुंचाई. इसके अलावा इस साल जब देश कोरोनावायरस से शुरुआती लड़ाई लड़ रहा था, वहीं बिहार में नीतीश के नेतृत्व में यह जंग कमजोर साबित हो रही थी. टेस्टिंग से लेकर अस्पतालों की व्यवस्था तक, लोगों ने खुलकर नीतीश कुमार के खिलाफ नाराजगी जताना शुरू कर दिया. विपक्ष ने भी यह मौका हाथों हाथ लिया. सवाल उठने लगे कि नीतीश सरकार ने समय रहते फैसले नहीं लिए इसलिए बिहार को विषम स्थिति का सामना करना पड़ा और राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की सचाई सामने आ गई. 

कोरोना और प्रवासियों की वापसी बड़ा फैक्टर 

कोरोना काल में ही एक और घटनाक्रम भी देश-दुनिया ने देखा. ये घटनाक्रम उन प्रवासियों से जुड़ा था जो देश के दूसरे हिस्सों में लॉकडाउन की वजह से अटक गए. इन प्रवासियों ने बड़ी संख्या में परिवारों के साथ सड़कों पर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हुए बिहार में अपने घरों का रुख करना शुरू कर दिया. एक अनुमान के मुताबिक करीब 30 लाख प्रवासी बिहार लौटे. प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा से बिहार में एक बार फिर बेरोजगारी के मुद्दे ने सेंटरस्टेज ले लिया. यही वजह है कि तेजस्वी हों या राहुल गांधी, बेरोजगारी को लेकर नीतीश कुमार पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे. 

युवाओं से जुड़ा ही एक और मुद्दा है जो बिहार में बहुत मायने रखता है. और वो है प्रतियोगी परीक्षाओं में युवाओं की हिस्सेदारी. मेडिकल कॉलेजों में एंट्रेस के लिए होने वाली NEET परीक्षा के कोरोना काल में ही आयोजन को लेकर युवा नीतीश कुमार सरकार से कुपित दिखाई दिए. इस मौके पर भी चिराग पासवान ने नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल बनाने में पूरा जोर लगाया. हर साल की तरह बाढ़ ने इस साल भी बिहार पर कहर बरपाया. इस दौरान पर्याप्त व्यवस्थाएं न होने से लोगों को हुई परेशानी का ठीकरा भी नीतीश कुमार सरकार पर फूटा.

चिराग पासवान की पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर? 

सूत्रों की माने  सियासी तौर पर नीतीश कुमार की जेडीयू को तेजस्वी से ज्यादा नुकसान चिराग पासवान पहुंचा रहे हैं. चिराग ने नीतीश कुमार को नुकसान पहुंचाने की रणनीति के तहत जेडीयू-बीजेपी से बगावत करके आए नेताओं को ज्यादातर टिकट दिए. इनमें ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार, कायस्थ, कुर्मी और कुशवाह उम्मीदवार शामिल हैं. जाहिर है कि चिराग की यह रणनीति विपक्षी गठबंधन को ही लाभ पहुंचाने वाली साबित हो सकती है. इतना ही नहीं चिराग ने आरजेडी के मुस्लिम और यादव वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए इक्का-दुक्का यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए जिससे आरजेडी को ग्राउंड पर कम से कम नुकसान हो.

दीवार पर लिखी इबारत साफ है कि इस बार नीतीश कुमार के लिए चुनावी डगर इतनी आसान नहीं जितनी राज्य के पिछले तीन विधानसभा चुनावों में रही थी. जहां नीतीश कुमार को अपने सियासी तरकश से हर तीर का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, वहीं बीजेपी को एनडीए की जीत सुनिश्चित करने के लिए हर दांव आजमाने पड़ रहे हैं. सबसे बड़ी चुनौती एंटी इंक्मबेंसी (सत्ता विरोधी रुख) से पार पाने की है. पीएम मोदी समेत बीजेपी का टॉप नेतृत्व बिहार में एनडीए की जीत को बहुत जरूरी मानता है. अगर बिहार में एनडीए को हार मिलती है तो अगले साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी संभावनाओं पर असर पड़ सकता है. 

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