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बिहार: पत्नी के कान की बाली बेचकर चुनाव लड़े थे ये नेता, बदमाशों ने कर दी थी हत्या

ईश्वर चौधरी को उनके कार्यकर्ताओं ने चंदा करके चुनाव लड़वाया और तीन बार जितवाया. उन्होंने बिहार के कद्दावर नेता जगजीवन राम के बेटे को हराया था. नामांकन तक के लिए उनके पास पैसे नहीं थे. जिसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी नगिया देवी की कान की बाली बेचकर पैसे जुटाए थे.

पूर्व सांसद ईश्वर चौधरी ने पत्नी के कान की बाली बेचकर चुनाव लड़ा था. पूर्व सांसद ईश्वर चौधरी ने पत्नी के कान की बाली बेचकर चुनाव लड़ा था.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ईश्वर चौधरी तीन बार रहे हैं सांसद
  • चंदा जमा करके लोगों ने उन्हें चुनाव लड़वाया
  • चुनाव प्रचार के वक्त बदमाशों ने हत्या कर दी थी

बिहार के नेता विवादों में रहे हैं भ्रष्टाचार के लिए, भाई भतीजावाद के लिए, शान-ओ-शौकत के लिए, बाहुबल के लिए. अब फिर से बिहार में चुनाव हैं, तो याद आ रहे हैं ईश्वर चौधरी. ऐसे सांसद जिनकी कहानी किसी को भी भावुक कर देती है. उन्हें कार्यकर्ताओं ने चंदा करके चुनाव लड़वाया और तीन बार जितवाया. बिहार के कद्दावर नेता जगजीवन राम के बेटे को हराया. आइए, ईश्वर चौधरी के बारे में जानते हैं विस्तार से. 

वर्तमान राजनीति की बात करें तो अब टिकट के बेचे जाने की भी आरोप लगते रहते हैं. आरोपों के मुताबिक इसके लिए लाखों रुपये में सौदा होता है. लेकिन आज हम राजनीति के उस समय की जानकारी आपको देने जा रहे हैं, जहां नेता अपनी साफ छवि लेकर चुनाव मैदान में होते थे, अपने धनदौलत के बल पर नहीं. ऐसे ही नेता थे ईश्वर चौधरी. गया सीट से 1971 में एक तरफ बिहार के कद्दावर नेता जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम कांग्रेस के टिकट पर उम्मीदवार थे, तो दूसरी ओर जनसंघ की टिकट पर ईश्वर चौधरी. 

सुरेश राम की शान ओ शौकत के सामने ईश्वर चौधरी की रंगत बेहद फीकी थी. जहां सुरेश राम के पास चुनाव प्रचार के लिए गाड़ियों का बड़ा काफिला था, वहीं ईश्वर चौधरी के पास गाड़ी तो बहुत दूर की बात नामांकन भरने के लिए भी पैसे नहीं थे. 

कार्यकर्ताओं की जिद पर उतरे चुनाव मैदान में

ईश्वर चौधरी को पहली बार कार्यकर्ताओं ने मनाकर चुनाव मैदान में उतारा था. नामांकन तक के लिए उनके पास पैसे नहीं थे. जिसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी नगिया देवी की कान की बाली बेचकर पैसे जुटाए. कार्यकर्ताओं द्वारा चंदा कर 27 हजार रुपये एकत्र किए गए, जिनके सहारे ईश्वर चौधरी चुनाव मैदान में थे.

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जनसंघ के ही एक नेता ने बताया कि उस दौरान जनसंघ की एक लहर सी चल पड़ी थी, यही कारण था कि कुछ लोग सुरेश राम की गाड़ी और झंडा लेकर निकलते जरूर थे, लेकिन दूर जाकर जनसंघ का झंडा लगाकर ईश्वर चौधरी के लिए वोट मांगते थे. लोगों के इस समर्थन के चलते ईश्वर चौधरी ने बड़ी जीत दर्ज की और संसद भवन पहुंचे.

तीन बार रहे सांसद
1971 में चुनाव जीतने के बाद ईश्वर चौधरी ने अपने सरल और विनम्र स्वभाव से जनता के बीच एक अलग पहचान बना ली थी. यही कारण रहा कि 1977 में जब जनसंघ का जनता पार्टी के साथ विलय हो गया, तो ईश्वर चौधरी जनता पार्टी से चुनाव लड़े. इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के मिश्री सदा को हराया. इसके बाद अगले दो चक्र के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1989 में ईश्वर चौधरी एक बार फिर भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे और कांग्रेस के रामस्वरूप राम को पराजित किया. लेकिन सरकार गिर गई और 1991 में मध्यावधि चुनाव हुआ.

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कर दी गई हत्या 
ईश्वर चौधरी मध्यावधि चुनाव प्रचार कर रहे थे. 15 मई 1991 को ईश्वर चौधरी कोंच में चुनाव प्रचार के लिए गए थे. कोंच के कठौतिया में एक जगह उन्होंने अपनी गाड़ी को रुकवाया, जैसे ही वे शौच के लिए उतरे, तो उन पर गोलियों की बौछार कर दी गई, जिसमें उनकी मौत हो गई. (इनपुट: विमलेन्दु चैतन्य)

 

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