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बिहार चुनाव: 17 साल की पार्टी, 15 साल से सत्ताधारी, ऐसी है जेडीयू की सियासी पारी

शरद यादव के साथ अपनी पार्टी का विलय कर नीतीश कुमार जेडीयू का हिस्सा बने थे. 2005 से ही जेडीयू बिहार की सत्ता में और नीतीश कुमार लगातार मुख्यमंत्री पद संभाले हुए हैं. हालांकि, जेडीयू के संस्थापक शरद यादव अब अलग हैं, क्योंकि जेडीयू से उन्हें निकाल दिया गया है और अब पार्टी पर पूरा हक नीतीश कुमार का है.

जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार(PTI) जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार(PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • शरद यादव ने किया था जनता दल यूनाइटेड का गठन
  • नीतीश कुमार ने किया था समता पार्टी का विलय
  • 2005 से बिहार की सत्ता पर काबिज है जेडीयू

बिहार की मौजूदा सियासत के दोनों सबसे मजबूत ध्रुव राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड एक ही परिवार के राजनीतिक वंशज हैं. कभी लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जनता दल के बैनर तले ही अपनी राजनीति किया करते थे. लालू को बिहार की सत्ता मिली तो कुछ वक्त बाद ही नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर अलग रास्त तय कर लिया, दूसरी तरफ लालू जब चारा घोटाला में फंसे तो उन्होंने अलग आरजेडी बना ली और जनता दल शरद यादव के पास रह गई. इसके बाद ही जनता दल यूनाइटेड का जन्म हुआ. 

जनता दल यूनाइटेड का इतिहास समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा. आपातकाल के खिलाफ जेपी आंदोलन खड़ा हुआ. तमाम विरोधी आवाज जनता पार्टी के बैनर तले जमा हुईं और इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता को उखाड़ दिया. हालांकि, आंदोलनकारी नेताओं की ये एकजुटता ज्यादा वक्त नहीं चल पाई और धीरे-धीरे जनता पार्टी बिखर गई. इसके बाद 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में फिर जेपी आंदोलन के वक्त के नेता साथ आए और जनता दल का गठन किया. लेफ्ट और बीजेपी के सहयोग से केंद्र में जनता दल की सरकार बनी. बिहार में भी 1990 में बीजेपी से समर्थन से जनता दल की सरकार बन गई. शरद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेता भी जनता दल में ही थी. 

1994 में नीतीश कुमार ने बनाई समता पार्टी

लालू के सीएम बनते के बाद के बाद 1994 में नीतीश कुमार अलग हो गए. उन्होंने समता पार्टी का गठन कर लिया. 1995 में लालू यादव के नेतृत्व में फिर बिहार में जनता दल की सरकार बनी. लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाला में सीबीआई की चार्जशीट हो गई. उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. मगर, लालू ने इससे पहले ही 1997 में जनता दल छोड़कर अलग राष्ट्रीय जनता दल बना ली. दूसरी तरफ, जनता दल की कमान शरद यादव को मिल गई. 

नीतीश कुमार (फोटो-पीटीआई)


1998 में शरद यादव ने लोकदल को जनता दल के साथ मिलाकर जनता दल यूनाइटेड बना लिया. इसके बाद कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री जे.एच पटेल ने केंद्र में वाजपेयी सरकार को समर्थन दिया तो एचडी देवेगौड़ा ने अलग जनता दल सेक्युलर बना ली, जो फिलहाल कर्नाटक की एक प्रमुख पार्टी है. जबकि जनता दल यूनाइटेड शरद यादव के हाथों में रही. शरद यादव ने 1999 के चुनाव में मधेपुरा लोकसभा सीट से लालू को हराकर वाजपेयी सरकार में मंत्री पद भी पाया.  

फिलहाल, जो जनता दल यूनाइटेड है और जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार हैं, वो औपचारिक तौर पर 30 अक्टूबर 2003 को वजूद में आई थी. दरअसल, नीतीश कुमार ने अपनी समता पार्टी का विलय जनता दल यूनाइटेड में कर लिया था. समता पार्टी के अलावा जनता दल से निकाले गए रामकृष्ण हेगड़े की लोक शक्ति का भी जनता दल यूनाइडेट में विलय हुआ था. उस वक्त से ही नीतीश कुमार जेडीयू का हिस्सा हैं. रामकृष्ण हेगड़े कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी रहे थे. 12 जनवरी 2004 को उनका निधन हो गया था.

2005 में बीजेपी के साथ लड़ा चुनाव

बीजेपी और जेडीयू ने बिहार में 2005 में मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा. इस चुनाव में दोनों दलों के गठबंधन को जबरदस्त समर्थन मिला. गठबंधन ने 142 सीटें जीतीं, जिसमें 55 बीजेपी और 88 जेडीयू को मिली. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने. ये रिजल्ट तब था जबकि केंद्र में यूपीए की सरकार थी, और लालू यादव सरकार का हिस्सा थे. 

2010 में भी जीता एनडीए 

2009 के आम चुनाव में यूपीए तो किसी तरह गठबंधन की सरकार बनाने में कामयाब रहा, लेकिन बिहार में जब विधानसभा चुनाव हुए तो बीजेपी-जेडीयू की जोड़ी ने बाकी सबको धराशायी कर दिया. 243 सीटों में 115 पर जेडीयू और 91 पर बीजेपी जीती. यानी दोनों पार्टियों ने मिलकर 206 सीटों पर कब्जा कर एकतरफा परिणाम पाए. जबकि आरजेडी 22 और एलजेपी 3 और कांग्रेस 4 सीटों पर सिमट गई.

हालांकि, एनडीए की ये लैंडस्लाइड विक्ट्री की मिठास में तब कड़वाहट आ गई जब बीजेपी ने तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 का आम चुनाव लड़ने का फैसला किया. तत्कालीन जेडीयू अध्यक्ष शरद और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना में 16 जून 2013 को एनडीए से अलग होने का ऐलान कर दिया. शरद यादव ने एनडीए के संयोजक पद से भी इस्तीफा दे दिया. 
नीतीश कुमार ने उस वक्त कहा, ''हम अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकते. हम नतीजों को लेकर चिंतित नहीं है. हम इस फैसले के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, हमें ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया है.'' बीजेपी ने भी साफ कर दिया कि गठबंधन एक बार टूटे या 10 बार, नरेंद्र मोदी को लेकर जो फैसला किया गया है वो किसी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा. 

शरद यादव के साथ नीतीश कुमार

नीतीश कुमार भी बीजेपी को छोड़कर कमजोर नहीं पड़े. 19 जून को जेडीयू ने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया. जेडीयू के समर्थन कांग्रेस और सीपीआई ने भी वोटिंग की जबकि आरजेडी ने विरोध में वोट दिया. बीजेपी ने वॉकआउट कर लिया. इस तरह नीतीश कुमार अपनी सरकार बिना बीजेपी के भी चलाते रहे. 

2015 में किया लालू यादव से समझौता

सिद्धांतों का हवाला देकर नीतीश कुमार ने बीजेपी से नाता तोड़ा था, इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू पूरी तरह परास्त हो गई तो नीतीश ने नैतिक तौर पर सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और जीतनराम मांझी को सीएम बना दिया. 10 महीने बाद ही मांझी से इस्तीफा मांग लिया गया, लेकिन उन्होंने तेवर दिखा दिए. इसके बाद मांझी को फरवरी 2015 में पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया और फिर से नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली. इसके बाद इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव का मौका आया तो नीतीश ने लालू यादव को गले लगा लिया और महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ा. महागठबंधन ने बीजेपी को चारों खाने चित कर दिया. हालांकि, आरजेडी को जेडीयू से ज्यादा सीटों पर जीत मिली लेकिन वादे के मुताबिक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया. जबकि लालू यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री व बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को कैबिनेट में मंत्री बनवाया. 

लालू यादव के साथ नीतीश कुमार

आरजेडी के साथ सरकार में होने के बावजूद नीतीश कुमार का मन से विलय नहीं हो पाया. खटपट की खबरें आने लगीं. डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव का नाम भ्रष्टाचार के केस में आने लगा. नीतीश कुमार के बागी सुर सुनाई देने लगे. नतीजा ये हुआ कि दो साल में नाता टूट गया और जुलाई 2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होते हुए सीएम पद से इस्तीफा दे दिया. लेकिन ये पिक्चर का दि एंड नहीं था. नीतीश कुमार ने जो नई पटकथा लिखी थी, उसमें तुरंत उन्हें बीजेपी से ऑफर मिलना था. यही हुआ और जिस बीजेपी से मूल सिद्धांतों का हवाला देकर 2013 में नाता तोड़ा था, उसी के साथ मिलकर फिर सरकार बना ली. 
जेडीयू के संस्थापक कहे जाने वाले शरद यादव ने जब नीतीश के इस फैसले का विरोध किया तो उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. फिलहाल, जनता दल यूनाइटेड के सर्वेसर्वा भी नीतीश कुमार हैं और बिहार के शासक भी वही हैं. 15 साल में कई मौसम आए, नेता आए, पार्टी आईं, गठबंधन बने-टूटे लेकिन नीतीश कुमार के कुर्सी पर कोई आंच नहीं आई.


 

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