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कैंसर के दहशत में जी रहा है केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे का संसदीय क्षेत्र

आजतक की टीम जब अपने चुनावी सफर में इस गांव पहुंची तो गांव के सभी लोग टीम को घेर कर खड़े हो गए. उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि जिस गांव में नेता तक आने में कतराते हैं वहां आखिरकार आजतक की टीम कैसे पहुंच गई.

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बिहार के इस इलाके में पीने को नहीं है स्वच्छ पानी (फोटो- आजतक)
बिहार के इस इलाके में पीने को नहीं है स्वच्छ पानी (फोटो- आजतक)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • डर के साये में बक्सर जिला का ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र
  • ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक की मात्रा बहुत ज्यादा
  • तकरीबन 15 सालों से कठिनाई झेल रहे लोग

बिहार में इन दिनों हर गली-चौराहे पर सिर्फ चुनाव की चर्चा है. लेकिन एक गांव ऐसा भी है जहां इसको लेकर बिल्कुल उत्साह ही नहीं है. इतना ही नहीं इस गांव के लोगों को कोरोना का डर भी नहीं सता रहा है. क्योंकि बिहार के बक्सर जिला के ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र में एक गांव ऐसा है, जो हर रोज कोरोना से भी अधिक भयंकर डर से जूझ रहा है. गंगा से सटे इस गांव का नाम है- तिलक राय के हाता. यू तो गंगा को पतित पावन और शुद्धता का मानक माना जाता है लेकिन इस गांव में जो पानी आता है वह जहर बन चुका है. जमीन के नीचे से आने वाले इस पानी में आर्सेनिक की मात्रा इतनी ज्यादा है कि लोग अलग-अलग रोगों के शिकार हो रहे हैं जिसमें कैंसर भी एक है. 

आजतक की टीम जब अपने चुनावी सफर में इस गांव पहुंची तो गांव के सभी लोग टीम को घेर कर खड़े हो गए. उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि जिस गांव में नेता तक आने में कतराते हैं वहां आखिरकार आजतक की टीम कैसे पहुंच गई. सिलसिला शुरू हुआ. एक-एक कर लोगों के खुलने का और खुलकर अपने दर्द को बयां करने का. क्योंकि कैंसर फैलाने वाले इस पानी से जूझने का सिलसिला हाल-फिलहाल की बात नहीं है. 

इस गांव के लोग तकरीबन 15 सालों से इस कठिनाई का सामना कर रहे हैं. वहां के लोगों ने जब अपनी हालत बताई तो हम भी भौचक्के रह गए. किसी के शरीर पर सफेद रंग के दाने-दाने दिखे तो किसी का पूरा पैर काला रंग का दिखने लगा है. हथेलियों में मानो किसी ने घाव कर दिया हो और वही हाल पैर के तलवे का भी हो रखा था. गांव में रहने वाले 64 साल के रामवृक्ष राय बताते हैं कि उनकी सिर्फ हथेलियां और पैर के तलवे ही नहीं खराब हुए हैं, बल्कि लीवर भी खराब हो गया है. 

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दरअसल यह कहानी लगभग 15 साल पहले शुरू होती है. जब गांव के लोगों को मामूली चर्म रोग से दो-चार होना पड़ता था. बाहर से आए कुछ वैज्ञानिकों ने इस गांव के पानी का सैंपल चेक किया. सैंपल में आर्सेनिक की मात्रा बहुत ज्यादा पाई गई, जिससे कि कैंसर फैलता है. तब से लेकर अब तक दसियों बार सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं ने पानी के सैंपल उठाए हैं. नतीजा ढाक के वही तीन पात. 

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इन सब के बावजूद अब तक गांव वालों को पीने के लिए साफ पानी नसीब नहीं हुआ है. ऐसा नहीं है कि सरकारी संस्थाओं ने कुछ भी नहीं किया. आसपास के सभी हैंडपंप पर लाल रंग का निशान लगा है यानी यह बताया गया है कि वह पानी पीने लायक नहीं है, ना ही इस्तेमाल करने लायक. साथ ही गांव में पानी का एटीएम मशीन भी लगा दिया गया है. लेकिन पिछले साल लगी यह मशीन अब बेकार हो चुकी है. इससे पानी नहीं आता है बल्कि जिस अहाते में यह मशीन लगाई गई थी वह अब कूड़ेदान में तब्दील हो चुका है.

कुछ यही हाल पास में बने एक बोरवेल का भी है जिसे 2 साल पहले सरकार ने लगाया था. लेकिन जब आजतक की टीम वहां पहुंची तो लोगों ने बताया कि पिछले 2 सालों से इस बोरवेल की मशीन पर बड़ा सा ताला लगा हुआ है. लोगों के पास अब महज दो साधन हैं, जिसका इस्तेमाल गांव के लोग साफ पानी पीने के लिए करते हैं. पहला तरीका है पानी को खरीद कर पीना. 

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10 लीटर के डिब्बे में पानी भरने के लिए ₹10 देने पड़ते हैं और आमतौर पर एक परिवार में दो ऐसे डब्बे दिन भर में खर्च हो जाते हैं. यानी कुल खर्चा ₹20 प्रतिदिन. गरीब परिवार के लोगों के लिए यह खर्च उठाना बेहद मुश्किल है.

दूसरा तरीका है पानी को साफ करने वाली देसी मशीन. गांव के लोग बताते हैं कि पटना के एक डॉक्टर साहब ने इस मशीन के इस्तेमाल के लिए कहा था. मशीन दरअसल चार हिस्सों में बैठी हुई है. सबसे ऊपर वाले हिस्से में लोहे की कील, दूसरे हिस्से में रेत, तीसरे हिस्से में छोटा पत्थर और चौथे हिस्से में बड़े पत्थर डाले जाते हैं. ऐसा करने पर रिस-रिस कर साफ पानी निकलता है. 

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे, इसी क्षेत्र से सांसद हैं. यानी जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व खुद स्वास्थ्य राज्य मंत्री कर रहे हैं वह इलाका कैंसर की छाया में जी रहा है. पानी कुछ मिनट के अंदर ही पीले रंग का हो जाता है और उसे देखकर ही आभास होता है कि वह पीने लायक नहीं है. 

 

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