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बिहार 2020: मोदी फैक्टर रहा अहम, स्लॉग ओवर्स में पीएम की धुआंधार बैटिंग ने दिलाई NDA को विनिंग ट्रॉफी

पीएम मोदी ने महागठबंधन को मात दे विनिंग ट्रॉफी उठाने में ‘मैन ऑफ द मैच’ की भूमिका निभाई. वो भी तब जब सामने वाली टीम की कमान गजब की फाइटिंग स्प्रिट वाले युवा टी-20 खिलाड़ी तेजस्वी यादव के हाथ में थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटोः पीटीआई) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटोः पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पहले राउंड में खिसकती दिखी बाजी
  • पीएम मोदी ने बदली प्रचार की रणनीति
  • निर्णायक रहीं पीएम मोदी की रैलियां

बिहार पॉलिटिकल लीग में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के मास्टर ब्लास्टर के तौर पर उभरे हैं. उनके स्ट्राइक रेट ने नीतीश कुमार की सुस्त परफॉर्मेंस की भी भरपाई कर दी. और ये सब प्रधानमंत्री ने कोविड-19 और बाढ़ जैसी चुनौतियों से भरी मुश्किल पिच पर करके दिखाया. 

पीएम मोदी ने महागठबंधन को मात दे विनिंग ट्रॉफी उठाने में ‘मैन ऑफ द मैच’ की भूमिका निभाई. वो भी तब जब सामने वाली टीम की कमान गजब की फाइटिंग स्प्रिट वाले युवा टी-20 खिलाड़ी तेजस्वी यादव के हाथ में थी. इस जीत के साथ, बिहार की राजनीति के जमीनी नियम अब मोदीमय हो गए हैं. लालटेन सत्ता से बाहर है, तीर ने अपनी धार खो दी है और कमल पूरे ओज के साथ खिल गया है.  

बीजेपी की प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और सहयोगी जनता दल-यूनाइटेड (जेडीयू) जैसे मंडलवादी ही 1990 के बाद से बिहार की राजधानी पर छाए रहे. अब वो कमंडलियों (धुर हिंदुत्ववादी संगठन) का प्रतिनिधित्व करने वाली बीजेपी के दबदबे के लिए पहली बार रास्ता बनाने के लिए मजबूर हुए हैं.  

बिहार में मोदी फैक्टर के चलने का सबसे बड़ा सबूत ये है कि इसकी मौजूदगी ने कैसे बीजेपी को शानदार स्ट्राइक रेट, यानि कुल चुनाव लड़ी सीटों में से जीती हुई सीटों का प्रतिशत, हासिल करने में मदद की. वो भी सहयोगी जेडीयू की लोकप्रियता में भारी गिरावट के बावजूद.

10 वर्षों में, एनडीए के इन दो सहयोगियों के बीच सियासी हाईर्राकी (अनुक्रम) उलट गई है. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला जेडीयू 2010 में  सीनियर प्लेयर था, अब, बीजेपी और मोदी बड़े खिलाड़ी हैं. पहले बीजेपी का अच्छा प्रदर्शन नीतीश कुमार पर निर्भर था. 2020 में स्थिति पलट गई. 

बीजेपी ने 2015 की उन कड़वी यादों को भी मिटा दिया है जब उसे इसी सहयोगी के प्रतिद्वंद्वियों के साथ गठबंधन करने से करारी हार मिली थी. 

मोदी की रैलियां निर्णायक 

जब बिहार विधानसभा चुनाव 2020 का पहला का चरण खत्म हुआ तो धारणा बनी कि कि तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले एमजीबी के सिर पर जीत का ताज सजने जा रहा है. इसके बाद प्रधानमंत्री ने अपनी रैलियों में बैटिंग की रणनीति को बदला. 

दूसरे चरण के लिए, पीएम ने मतदाताओं को सत्ता में आरजेडी की वापसी को उसके पुराने राज की याद दिलाते हुए ‘जंगल राज के 'युवराज' के बारे में बात की. मतदाताओं को तेजस्वी के पिता लालू यादव के कुशासन के बारे में याद दिलाने की रणनीति अपनाई गई, जबकि तेजस्वी ने लालू समेत पूरे परिवार को इस चुनाव प्रचार से सोच समझ कर अलग रखा था.

सीमांचल और कोसी क्षेत्र के लिए तीसरे चरण में हुए मतदान में  प्रधानमंत्री ने जो कहा वो ध्रुवीकरण की दिशा में था. 3 नवंबर को अररिया और सहरसा की रैलियों में, पीएम मोदी ने आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों पर आरोप लगाया कि उन्हें जय श्री राम और भारत माता की जय के नारों के साथ समस्या है. 

यह कोई सामन्य स्पिन नहीं था. लक्षित क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 65 प्रतिशत जितनी अधिक थी और अतीत में, हिंदुओं ने अल्पसंख्यकों जैसे माइंडसेट दिखाया, जिससे आसान ध्रुवीकरण हुआ.  

पीएम और बीजेपी को पता था कि यह पिच एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी की ओर से अल्पसंख्यक वोट के लिए स्पष्ट कॉल की उपस्थिति के कारण एक काउंटर ध्रुवीकरण बनाएगी. 

गेम-चेंजर 

बीजेपी ने उचित जाति जमाजोड़ और टिकट बंटवारे से एमजीबी गठबंधन के आधार में सेंध लगाई, वहीं कभी आरजेडी में रहे पप्पू यादव उर्फ राजीव रंजन जैसे लोगों की चुनाव मैदान में मौजूदगी का फायदा उठाया. 

पीएम ने अपने कैम्पेन में राष्ट्रीय सुरक्षा की सही खुराक का समावेश किया. साथ ही राहुल गांधी पर निशाना साधा. उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कांग्रेस के साथ सीधे मुकाबलों में बीजेपी का स्ट्राइक रेट ऊंचा रहे,  जिसके लिए आरजेडी ने राज्य में चुनाव लड़ने के लिए 70 सीटें छोड़ी थीं. 

पहले चरण में, एमजीबी के लिए वाम दलों के कारण जीतने अच्छा मौका था, लेकिन बीजेपी जनता को याद दिलाती रही कि आरजेडी का गठबंधन ‘टुकड़े टुकड़े गिरोह’ के साथ है. 

नीतीश के खिलाफ बीजेपी ने कैसे सत्ता विरोधी लहर को संभाला? बीजेपी को एहसास हो गया था कि चुनाव कांटे की टक्कर का होने वाला है जिसमें नीतीश कुमार के खिलाफ एंटी इंक्मबेंसी एक फैक्टर होगा. इसीलिए प्रधानमंत्री ने कैम्पेन को पुश किया. ऐसा खास तौर पर तब किया गया जब तेजस्वी ने सत्ता में आने की स्थिति में पहले दिन ही 10 लाख सरकारी नौकरी देने का वादा लोगों से किया. 

बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे शीर्ष नेताओं ने तेजस्वी के वादे पर काउंटर किया कि यह एक बढ़ा चढ़ा कर किया गया वादा था जिसे लागू नहीं किया जा सकता था, साथ ही ये राज्य को दीवालिया होने की ओर भी ले जाता.   

विकास की कमी, नई नीतियां, शराबबंदी, बाढ़ और प्रवासी संकट, ये कुछ ऐसी चुनौतियां थीं, जिन पर एमजीबी की ओर से लगातार प्रहार किए जा रहे थे. जहां तक ​​प्रवासियों, गरीबों और महिलाओं से जुड़े  मुद्दों का सवाल था, पीएम एनडीए बचाव में आगे आए. 

तो क्या बदला? 

जब से राहुल गांधी ने एनडीए पर ‘सूट बूट की सरकार’ का जुमला उछाला और 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा, पीएम मोदी ने अपनी योजनाओं के लक्षित दर्शकों और लक्ष्य को बदल दिया. 

उनकी सरकार द्वारा शुरू की गई गरीबों के हित वाली योजनाओं और कल्याणकारी उपायों ने अंततः मतदाता व्यवहार पर असर डाला, विशेष रूप से महिलाओं और गरीबों पर. इसने एमजीबी से मिल रही चुनौती को बेअसर किया. वो एमजीबी जिसे उसके पारंपरिक मतदाताओं के साथ सवर्णों और हिंदुत्व कट्टरपंथियों से भी समर्थन मिल रहा था. 

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “मतदान से पहले, अति पिछड़ी जातियों और महादलितों के बीच नीतीश का समर्थन नीचे आ गया था, लेकिन यह वह जगह है जहां पीएम की छवि ने बहुत कुछ भरपाई की. इस अंतर को पीएम गरीब कल्याण पैकेज, उज्जवला योजना ने जेडीयू और बीजेपी की ओर से लड़े गए निर्वाचन क्षेत्रों में पाट दिया. 

राजनीतिक असर 

सीटों के मामले में जेडीयू से बीजेपी के आगे रहने के बावजूद, पीएम ने संकेत दिया कि पार्टी अपने सहयोगी दलों का सम्मान करती है. साथ ही चुनाव पूर्व प्रतिबद्धता को लेकर पार्टी मजबूत है कि सीएम के तौर पर नीतीश कुमार ही जिम्मेदारी संभालेंगे. 

यह अहम है. पिछले एक साल में, बीजेपी की सहयोगियों को साथ रखने की क्षमता सवालों में रही है. शिवसेना और अकाली दल ने बीजेपी पर बड़े भाई वाला रवैया अपनाने और वादों से पीछे हटने के आरोप लगाए गए. ऐसे में पार्टी को छवि सुधार की आवश्यकता थी. 

यह भी गौर करने लायक है कि बीजेपी को अन्य संगठनों की तरह तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में सहयोगियों की जरूरत है. 

प्रधानमंत्री ने नीतीश कुमार के साथ अपने अतीत के खिंचाव को भुलाकर साझा तौर पर चुनाव प्रचार करने का फैसला किया. यह इसलि भी जरूरी था कि पार्टी के पास राज्य में मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश करने के लिए कोई दिग्गज नेता मौजूद नहीं था. इसका अपना फायदा था. अगर बीजेपी किसी को सीएम चेहरे के रूप में पेश करती, तो वह बिहार की अति संवेदनशील जातिगत समीकरणों को गड़बड़ा सकती थी. 

नीतीश ही होंगे सीएम

चुनाव आयोग की ओर से नतीजे घोषित किए जाने के बाद बीजेपी ने सिर्फ यही नहीं कहा कि नीतीश सीएम होंगे, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि सीएम के रूप में, वो उन सभी अधिकारों के हकदार बने रहेंगे जो उन्हें वरिष्ठ सहयोगी होने के नाते हासिल थे. 

बीजेपी के टॉप सूत्रों का कहना है कि पार्टी दो कारणों से जेडीयू को छोड़ना नहीं चाहेगी. यदि सीएम पद से इनकार किया जाता है, तो जेडीयू को अभी भी आरजेडी की ओर से अपने साथ हाथ मिलाने और सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है. दूसरा, बीजेपी ईबीसी और महिलाओं के बीच पैठ बनाने के लिए नीतीश कुमार का उपयोग करना चाहती है. 

अब बिहार में एनडीए में बीजेपी के टॉप पार्टनर होने की वजह से वो कैबिनेट में बड़ी संख्या में बर्थ हासिल कर सकती है. इस जरिए वो गरीब समर्थक और विकास को बढ़ावा देने वाली योजनाओं पर अपनी मुहर लगा सकती है. यदि बिहार 2019 में बीजेपी के लिए असाधारण सियासी फायदा देने वाली जमीन बना तो भगवा पार्टी निश्चित रूप से उस लाभ को जाने नहीं देना चाहेगी.. 

बिहार चुनाव प्रचार के दौरान ऐसे कयास हमेशा हवा में रहे कि चिराग पासवान (जिन्होंने दिवंगत पिता रामविलास पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी की विरासत संभाली) ने बीजेपी के इशारे पर ही जेडीयू के खिलाफ अकेले जाने और चुनाव लड़ने का फैसला किया. जिस तरह के नतीजे आए, उसने सुनिश्चित किया कि युवा पासवान पहले की तरह एनडीए में दिल्ली वापस आ सकते हैं. इससे नीतीश कुमार और बीजेपी के लिए मैदान खुला रहे. साथ ही एलजेपी का 6 प्रतिशत दलित वोट बैंक भी कब्जाने की संभावना बने.

 

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