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जब कर्पूरी ठाकुर ने सोच लिया था लड़कर ही सदन में जाना है

मुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर को छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य था. बताया जाता है कि उस वक्त पार्टी के कई बडे़ नेताओं ने उन्हें विधान परिषद के सदस्य के तौर पर मुख्यमंत्री बने रहने का फॉर्मूला सुझाया था, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया.

  ईमानदारी और जनसेवा की मिसाल थे कर्पूरी ठाकुर ईमानदारी और जनसेवा की मिसाल थे कर्पूरी ठाकुर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कांग्रेसी उम्मीदवार को 67 हजार से अधिक वोटों से हराया
  • देवेंद्र यादव ने कर्पूरी ठाकुर के लिए छोड़ दी अपनी सीट
  • कर्पूरी ठाकुर बिहार में कोई विधानसभा चुनाव नहीं हारे

43 साल पहले की बात है जब बिहार में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी. कर्पूरी ठाकुर उस वक्त न ही विधानसभा और न विधान परिषद के सदस्य थे. कर्पूरी ठाकुर लोकसभा चुनाव में समस्तीपुर से सांसद चुने गए थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर को छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य था. बताया जाता है कि उस वक्त पार्टी के कई बडे़ नेताओं ने उन्हें विधान परिषद के सदस्य के तौर पर मुख्यमंत्री बने रहने का फॉर्मूला सुझाया था, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया. उस वक्त उनके लिए पहली बार विधायक चुनकर सदन पहुंचे देवेंद्र प्रसाद यादव ने अपनी सीट छोड़ी. देवेंद्र यादव ने जननायक के लिए अपनी सीट छोड़ी और मधुबनी जिले के फुलपरास विधानसभा सीट पर कर्पूरी ठाकुर चुनाव लड़कर भारी मतों से विजयी हुए.

कांग्रेस के जय को करना पड़ा पराजय का सामना

देवेंद्र यादव के सीट छोड़े जाने के तीन महीने के भीतर ही इस सीट पर उपचुनाव हुए. कांग्रेस उपचुनाव में पूरी मजबूती के साथ इस सीट पर उतरने का मन बना चुकी थी. कांग्रेस ने उस वक्त के अपने बड़े यादव नेता राम जयपाल सिंह यादव पर दांव खेला. कांग्रेस ने इस सीट पर कर्पूरी ठाकुर के सामने जयपाल सिंह यादव को चुनाव मैदान में उतारा. कांग्रेस के रणनीतिकारों को उस वक्त लग रहा था कि यादव बहुल फुलपुरास सीट पर उनका यह दांव फिट बैठेगा. हालांकि उनकी यह रणनीति बिल्कुल भी काम न आई. जब नतीजे सामने आए तो कांग्रेस के जयपाल सिंह को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा. कर्पूरी ठाकुर ने इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार को 67 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया. आपको बताते चलें कि इसी सीट पर देवेंद्र यादव 40 हजार से अधिक वोटों से विजयी हुए थे.

कर्पूरी ठाकुर के लिए सीट छोड़ चर्चा में आ गए देवेंद्र यादव

पहली बार 1977 में विधायक बने देवेंद्र यादव उस वक्त चर्चा में आ गए जब वह अपनी सीट कर्पूरी ठाकुर के लिए छोड़ दिए. देवेंद्र यादव मधुबनी जिले के  फुलपरास सीट से 40 हजार से अधिक मतों से विजयी हुए थे. मुख्यमंत्री रहते कर्पूरी ठाकुर उस वक्त फुलपरास सीट से ही उप चुनाव जीते थे. देवेंद्र यादव को एक साल बाद 1978 में विधान परिषद का सदस्य नियुक्त किया गया. उसके बाद में वो झंझारपुर से सांसद चुने गए और केंद्र में मंत्री भी बने. झंझारपुर सीट से सबसे अधिक बार जीतने का रिकॉर्ड देवेंद्र प्रसाद यादव के ही नाम है. वो यहां से 5 बार चुने गए. 1989,1991, 1996,1999 और 2004 में सांसद चुने गए. 1989 में जब वीपी सिंह यहां आए थे तो वह जमकर बोफोर्स घोटाले में कांग्रेस को घेरा था. वो वीपी सिंह से प्रभावित होकर जनता दल में शामिल हो गए. तीन बार वो जनता दल के टिकट पर लोकसभा पहुंचे. वे केंद्र में खाद्य आपूर्ति राज्य मंत्री भी रहे. केंद्र में मंत्री रहते उन्होंने लाल कार्ड योजना गरीबों के लिए बनाई.

ईमानदारी के किस्से आज भी सुनने को मिलते हैं

1952 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कर्पूरी ठाकुर बिहार में कोई विधानसभा चुनाव नहीं हारे. कर्पूरी ठाकुर बिहार में दो बार मुख्यमंत्री, एक बार उप मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक रहे. उनकी ईमानदारी के किस्से आज भी बिहार में सुनाए जाते हैं. राजनीति में वर्षों बिताने और सत्ता में रहने के बावजूद अपने परिवार को विरासत में देने के लिए उनके पास एक मकान तक उनके नाम पर नहीं था. वह हमेशा गरीबों और शोषितों के लिए काम करते रहे. बिहार में राजनीति न जाने कहां से कहां चली आई लेकिन कर्पूरी ठाकुर के बाद बिहार को वैसा नेता दोबारा न मिल सका.

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