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पप्पू यादव: कभी थे लालू यादव के सबसे खास, फिर उन्हीं की पार्टी ने निकाला बाहर

पप्पू यादव को साल 1991 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पूर्णिया लोकसभा सीट से जीत हासिल हुई. वह 10वीं लोकसभा के सदस्य चुने गए. इसके बाद पप्पू यादव ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार सियासत की ऊंची सीढ़ियां चढ़ते चले गए.

पप्पू यादव (PTI फोटो) पप्पू यादव (PTI फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • निर्दलीय के तौर पर जीता पहला लोकसभा चुनाव
  • मोदी लहर में भी RJD के टिकट पर जीता था चुनाव
  • हत्या से लेकर गंभीर अपराधों में आया नाम

राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव बिहार की राजनीति का एक बड़ा नाम है. पप्पू यादव 5 बार लोकसभा सांसद और विधायक रह चुके हैं. उन्होंने अपना राजनीतिक सफर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर शुरू किया और सपा और राजद में रहने के बाद अब साल 2015 में अपनी जन अधिकार पार्टी बना ली है. इस बार के चुनाव में पप्पू यादव की पार्टी अपने दमखम पर चुनाव में लड़ने का मन बना चुकी है. 

पप्पू यादव को किसी जमाने में लालू यादव का सबसे खास माना जाता था. तब यह भी अटकलें थीं कि वह आरजेडी के उत्तराधिकारी न बन जाएं. लालू यादव की पार्टी से वह दो बार सांसद भी रहे लेकिन उसी RJD ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखाया. बिहार में उनकी छवि बाहुबली और दबंग नेता के तौर पर है. 

कैसा रहा शुरुआती सफर

पप्पू यादव साल 1990 में पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मधेपुरा की सिंहेश्वर सीट से विधानसभा चुनाव जीते. हालांकि इसके बाद उनका सियासी कद बढ़ गया और एक साल बाद ही साल 1991 के चुनाव में फिर से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उन्हें पूर्णिया लोकसभा सीट से जीत हासिल हुई. वह 10वीं लोकसभा के सदस्य चुने गए. इसके बाद पप्पू यादव ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार सियासत की ऊंची सीढ़ियां चढ़ते चले गए.

पप्पू यादव ने भले ही अपने पहले दो चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीते हों. लेकिन साल 1996 के चुनाव में बिहार से बाहर की पार्टी सपा ने उन्हें पूर्णिया सीट से अपना उम्मीदवार बनाया और एक बार फिर पप्पू यादव को जीत हासिल हुई. इस बार साल 1999 के चुनाव में पप्पू यादव फिर से निर्दलीय चुनाव लड़े और पूर्णिया सीट से तीसरी बार सांसद चुने गए.
 
पप्पू यादव ने इसके बाद फिर से आरजेडी का हाथ थाम लिया और 2004 में मधेपुरा सीट पर हुए उपचुनाव में आरेजडी के टिकट पर जीत हासिल की. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में पटना हाई कोर्ट ने पप्पू यादव के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी क्योंकि वह हत्या के एक मामले में दोषी करार दिए जा चुके थे. इसके बाद उन्हें आरजेडी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

2009 में पूर्णिया लोकसभा सीट से उनकी मां शांति प्रिया ने निर्दलीय चुनाव लड़ा लेकिन बीजेपी के उदय सिंह ने इस चुनाव में करीब दो लाख वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी. हालांकि फिर 2014 के चुनाव में पप्पू यादव को लालू यादव ने वापस अपनी पार्टी में बुला लिया और उन्हें मधेपुरा सीट से शरद यादव के खिलाफ उम्मीदवार बनाया गया.

आरजेडी ने पार्टी से निकाला

साल 2014 के चुनाव में पूरे बिहार में बीजेपी की लहर के बावजूद पप्पू यादव ने न सिर्फ बीजेपी बल्कि इस सीट से चार बार सांसद रहे शरद यादव को करीब 50 हजार वोटों के अंतर से हराया था. वह पांचवीं बार लोकसभा के सदस्य चुने गए. इस चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार विजय कुमार को सिर्फ 24 फीसदी वोट हासिल हुए और वह तीसरे स्थान पर रहे.


इसके बाद मई 2015 में आरजेडी ने पप्पू यादव को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते बाहर का रास्ता दिखा दिया. फिर उन्होंने अपनी जन अधिकार पार्टी बनाई और 2019 के चुनाव में मधेपुरा से चुनाव लड़ा. हालांकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और पप्पू यादव को सिर्फ 8 फीसदी वोट ही हासिल कर पाए. इस सीट पर जेडीयू के दिनेश चंद्र यादव ने आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे शरद यादव को हराकर भारी अंतर से जीत दर्ज की. 

विवादों से गहरा नाता

साल 1998 में पप्पू यादव पर सीपीएम नेता अजीत सरकार की हत्या का आरोप लगा और वह 1999 में गिरफ्तार कर लिए गए थे. सिक्किम की बेउर जेल मे रहने के दौरान पप्पू यादव की खातिरदारी के चर्चे सामने आए तो उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया. इसके बाद फरवरी 2008 में विशेष सीबीआई अदालत ने पप्पू यादव और दो अन्य को सीपीआई नेता की हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई. हालांकि मई 2013 को पटना हाईकोर्ट ने पर्याप्त सबूत न होने की बात कहते हुए पप्पू यादव को जेल से रिहा करने आदेश दिया.

क्या है इस बार की तैयारी?

बिहार में होने वाले आगामी चुनाव में पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी (JAP) ने 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. पार्टी के प्रमुख पप्पू यादव ने अगस्त में ही इसकी घोषणा की है. पिछले विधानसभा चुनाव में भी जन अधिकार पार्टी ने 64 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. तब JAP, समाजवादी पार्टी, NCP, समरस समाज पार्टी, समाजवादी जनता दल और नेशनल पीपुल्स पार्टी ने मिलकर तीसरे मोर्चा का गठन किया था.
 

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