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बिहार के बाद क्या पश्चिम बंगाल में भी होगा ओवैसी फैक्टर का असर?

बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतकर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने सबको चौंका दिया था. बिहार की सफलता के बाद अब ओवैसी को पश्चिम बंगाल से भी वैसी ही उम्मीद है, जहां का चुनावी मुकाबला काफी​ दिलचस्प होने जा रहा है.

AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी (फोटो-PTI) AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी (फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ने की तैयारी में AIMIM
  • 27 फीसदी मुस्लिम वोटों पर AIMIM की नजर


बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतकर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी  ने सबको चौंका दिया था. बिहार की सफलता के बाद अब ओवैसी को पश्चिम बंगाल से भी वैसी ही उम्मीद है, जहां का चुनावी मुकाबला काफी​ दिलचस्प होने जा रहा है.

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने पिछले साल अक्टूबर में किशनगंज उपचुनाव में बिहार विधानसभा में एंट्री ली थी. 2015 के विधानसभा चुनाव में उसे एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी. विशेषकर बिहार के सीमांचल क्षेत्र में पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही जमीन पर मेहनत कर रही थी जिसका नतीजा 2020 के चुनाव में दिखा. अब पार्टी ​की निगाहें राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य पश्चिम बंगाल पर टिकी हैं.

गठबंधन के संकेत

बिहार की तरह ही अब ओवैसी पिछले कुछ वक्त से पश्चिम बंगाल में काम कर रहे हैं. AIMIM की बंगाल योजना 2019 के आम चुनाव के बाद तैयार की गई थी और इसने बंगाल में पिछले साल 25 से अधिक रैलियां कीं, जिनमें से हर रैली में एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ देखी गई. अब बंगाल के लगभग सभी जिलों में पार्टी की यूनिट मौजूद है. इसने लखनऊ के नेता असीम वकार को पिछले साल बंगाल का प्रभारी बनाया था और पार्टी ने अपना प्रमुख ध्यान दिनाजपुर, मालदा, हावड़ा, कूच बिहार, बीरभूम, आसनसोल, नादिया और कोलकाता जैसे जिलों पर केंद्रित किया है. 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है.

ओवैसी को मालूम है कि बंगाल में अपनी पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं होगा क्योंकि उनकी पार्टी को उत्तर बंगाल के उर्दू भाषी मुसलमानों का समर्थन प्राप्त है, जबकि दक्षिण बंगाल के बांग्लाभाषी मुसलमानों के बीच ममता बनर्जी अब भी सर्वमान्य नेता हैं. दक्षिण बंगाल में मुसलमानों की संख्या काफी ज्यादा है. शायद इसीलिए AIMIM के सूत्रों का कहना है कि अगर टीएमसी हमसे संपर्क करती है तो गठबंधन के विकल्प खुले हैं. 

रातनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रबर्ती का कहना है, “मुस्लिम टीएमसी और बीजेपी से खुश नहीं हैं. बीजेपी 2021 का चुनाव जीत सकती है. इसलिए मुस्लिम समुदाय डरा हुआ है और अपनी पहचान के लिए उन्हें अपनी राजनीतिक पार्टी की जरूरत है. बंगाल के प्रमुख मुस्लिम मौलवियों में से एक फुरफुरा शरीफ (हुगली जिले में) के अब्बास सिद्दीकी अपनी पार्टी बना रहे हैं. पिछले तीन महीनों से वे रैलियां कर रहे हैं. इन रैलियों में अच्छी खासी भीड़ देखी गई है. AIMIM उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद और नादिया जैसी जगहों पर भी जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है. अगर इस चुनाव में AIMIM और अब्बास सिद्दीकी की पार्टी एक साथ आती हैं तो यह राजनीतिक समीकरण चुनाव परिणाम बदल सकता है.”

ओवैसी का बंगाल मिशन

AIMIM अपने नए मिशन के लिए कमर कस रही है. इसके लिए पार्टी ने शनिवार को हैदराबाद में अपनी बंगाल इकाई के साथ पहली बैठक की. ओवैसी ने इंडिया टुडे को बताया, “हमने मौजूदा सियासी हालात और आने वाले विधानसभा चुनावों पर चर्चा की है. हम जल्द ही उचित निर्णय लेंगे.”

AIMIM जल्द ही अपने नेताओं का एक डेलीगेशन कोलकाता भेज सकती है. इस डेलीगेशन की रिपोर्ट के आधार पर ओवैसी जनवरी में राज्य का दौरा करने की योजना बनाएंगे. लेकिन क्या उनकी पार्टी की मौजूदगी से ममता बनर्जी और टीएमसी को झटका लगा है?

टीएमसी आत्मविश्वास से भरी और बेफिक्र दिखती है. टीएमसी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद विवेक गुप्ता का कहना है, “AIMIM ने 2019 में बंगाल में भी चुनाव लड़ा था और नतीजे साफ हैं. उनका फिर से चुनाव लड़ने का स्वागत है क्योंकि यह एक लोकतांत्रिक देश है. मुस्लिम ममता बनर्जी के प्रदर्शन को देख चुके हैं, वे उन पर भरोसा करते हैं और वे बेवकूफ नहीं हैं. वे अपने बच्चों को पढ़ाने में सक्षम हो रहे हैं, उन्हें आर्थिक सहायता मिल रही है. उन्हें रहने के लिए जगह मिल रही है, गतिधारा में टैक्सी ड्राइवर के रूप में नौकरी मिल रही है. अगर 100 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात है, तो हमें पता है कि ओवैसीजी किसके आदेश पर चुनाव लड़ेंगे.”

मंगलवार को बीजेपी और AIMIM पर हमला करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, “अल्पसंख्यक वोटों को बांटने के लिए वे (बीजेपी) हैदराबाद से एक पार्टी को लाए हैं... वे भाजपा से पैसा लेते हैं. उनकी रणनीति ये है कि वे मुस्लिम वोट हासिल करेंगे और हिंदुओं के खिलाफ एक सख्त रुख अपनाएंगे ताकि हिंदुओं का वोट बीजेपी को मिले.”

पिछले चुनावी प्रदर्शन

हाल ही में संपन्न ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (जीएचएमसी) चुनाव के दो अहम नतीजे सामने आए. पहला, तेलंगाना में बीजेपी सत्तारूढ़ टीआरएस के लिए मुख्य चुनौती के रूप में उभरी और दूसरा, जीएचएमसी के तहत मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में AIMIM का चुनावी प्रभुत्व बरकरार है. AIMIM ने 51 सीटों पर चुनाव लड़ा और 44 पर जीती, जिसका मतलब है कि पार्टी का स्ट्राइक रेट 80 प्रतिशत से ज्यादा रहा. इससे भी महत्वपूर्ण बात, AIMIM ने 2016 में जो 44 वार्ड जीते थे उनमें से 42 को बरकरार रखा. इसके अलावा, पार्टी को 2016 के जीएचएमसी चुनाव से 3 प्रतिशत ज्यादा यानी 19 प्रतिशत वोट मिले, बावजूद इसके कि पार्टी ने इस बार कम सीटों पर चुनाव लड़ा था.

हैदराबाद AIMIM का गढ़ है. बिहार और महाराष्ट्र में पार्टी के प्रदर्शन ने इसे पश्चिम बंगाल जैसे अन्य राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाने का हौसला दिया है. AIMIM जैसी पार्टी के लिए पश्चिम बंगाल बेहद अहम है. मुस्लिम आबादी के अनुपात के मामले में जम्मू-कश्मीर और असम के बाद पश्चिम बंगाल  भारत में तीसरे नंबर पर है और वास्तविक जनसंख्या के लिहाज से (यूपी के बाद) दूसरे नंबर पर है.

बिहार में AIMIM का प्रदर्शन

बिहार में पार्टी ने पांच विधानसभा सीटों में से चार किशनगंज जिले में जीतीं, जहां पर मुस्लिम आबादी 60 प्रतिशत से ज्यादा है. इस प्रदर्शन ने राजद-कांग्रेस-वाम गठबंधन को सोचने पर मजबूर किया क्योंकि वे इस क्षेत्र में वर्षों से हावी थे. AIMIM ने न सिर्फ पांच सीटें जीतीं, बल्कि उसे बड़े पैमाने पर मिले समर्थन ने अन्य पार्टियों/गठबंधनों को चिंता में डाल दिया.

 

इस समीकरण को समझने के लिए हमें ये देखने की जरूरत है कि पिछले पांच वर्षों में बिहार में AIMIM के वोटों में किस तरह बदलाव आया. 2015 में पार्टी ने सिर्फ पांच सीटों पर चुनाव लड़ा (चार्ट देखें) और सिर्फ कोचाधामन में 20 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे. लेकिन पांच साल बाद 2020 में पार्टी को पांच विधानसभा सीटों में से चार में 20 फीसदी से ज्यादा वोट मिले. यानी कि AIMIM न सिर्फ सीटें जीती, बल्कि बिहार में अपना तेजी से विस्तार कर रही है.

महाराष्ट्र में AIMIM

आंकड़ों के अनुसार, 2014 में AIMIM ने महाराष्ट्र 24 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि 2019 में इसने 44 सीटों पर चुनाव लड़ा था. दोनों चुनावों में पार्टी दो-दो सीटें जीतीं. हालांकि, 13 सीटें ऐसी हैं जहां AIMIM को इन दोनों चुनावों में 10 फीसदी से ज्यादा वोट मिले.

यहां 13 सीटें ऐसी हैं, जहां पार्टी ने 2014 में भी चुनाव लड़ा और 2019 में भी. इन 13 सीटों में से 12 सीटों (सोलापुर सिटी नॉर्थ को छोड़कर) पर इसका वोट शेयर दोहरे अंक में था. इन्हीं आंकड़ों से पता चलता है कि इन 12 सीटों में से, पार्टी ने 2019 में सात सीटों (चार्ट देखें) पर अपना वोट शेयर बढ़ाया था, जबकि पिछले चुनावों में पांच सीटों पर गिरावट आई थी. धुले सिटी और मालेगांव सेंट्रल जैसी कुछ सीटों पर पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव में अपना वोट शेयर 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाया.

चाहे तेलंगाना हो या बिहार या महाराष्ट्र, जिस भी सीट पर मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से ज्यादा है वहां पर AIMIM ने महत्वपूर्ण समर्थन हासिल किया है.

 

AIMIM की रणनीति

AIMIM अब पश्चिम बंगाल में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए आक्रामक तरीके से काम कर रही है. पार्टी बड़े पैमाने पर सदस्यता अभियान चला रही है. सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही इसके 10 लाख से अधिक सदस्य बन चुके हैं. पार्टी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से सदस्यता अभियान चला रही है. AIMIM खुद को बंगाल में टीएमसी, लेफ्ट और कांग्रेस के विकल्प के तौर पर देख रही है.

बंगाल में AIMIM के नेता इमरान सोलंकी ने कहा, “ओवैसी के साथ हमारी बैठक में सभी जिलों के लोग मौजूद थे. ओवैसी ने कहा कि हर जिले में एक समिति होगी. हमारी पार्टी के पूर्व मेयर माजिद हुसैन हैदराबाद से बंगाल आएंगे. उन्हें बंगाल की जिम्मेदारी दी जा रही है. वे यहां जिलास्तरीय समितियां बनाएंगे. ये समितियां तय करेंगी कि किन सीटों पर और कैसे चुनाव लड़ा जाए... हमारी पार्टी के कार्यकर्ता ज्यादा से ज्यादा लोगों से संपर्क कर रहे हैं.”

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उन्होंने कहा, “हमारी ऑनलाइन सदस्यता अभी भी जारी है और ऑफलाइन कैंपेन पिछले छह साल से चल रहा है. अकेले मुर्शिदाबाद जिले में 2 लाख सदस्य हैं. आंकड़ों के अनुसार, हमारे लगभग 10 लाख सदस्य हैं और समर्थन बढ़ रहा है. बंगाल में वकील और शक्तिशाली नौकरशाह चुनाव के लिए हमसे संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं. पार्टी ठीक काम कर रही है.”

पार्टी 100 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने पर फोकस कर रही है लेकिन यह जानती है कि 65 से ज्यादा ऐसी सीटें हैं जहां मुसलमानों का सीधा असर है. मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में काफी मुस्लिम वोट हैं. मुर्शिदाबाद की कुछ विधानसभा सीटों में 60 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोट हैं, जहां AIMIM को बाजी मार लेने का भरोसा है. पार्टी का दावा है कि कोलकाता में ही छह प्रतिशत से ज्यादा गैर-बांग्ला भाषी मुस्लिम हैं और इससे शहरी सीटों पर भी असर पड़ सकता है.

ममता के प्रति आक्रोश


ऐसी किस बात ने इन मुस्लिम नेताओं को इतना नाराज किया कि अब वे ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर अपनी पार्टी खड़ी करने के लिए तैयार हैं?

सोलंकी का कहना है, “टीएमसी ने अपने मेनीफेस्टो में मुसलमानों को 17 फीसदी रिजर्वेशन देने का वादा किया था. अगर ममता बंगाली मुसलमानों के सपोर्ट में हैं तो क्या उन्होंने ये​ रिजर्वेशन दिया? वे राज्य के मुद्दों पर बात नहीं करतीं. यहां कोई मुस्लिम विश्वविद्यालय नहीं है. भारत में 15 मुस्लिम बहुल जिले हैं, जिनमें से पांच बंगाल में हैं. इनमें 65 फीसदी मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं और वे इन क्षेत्रों में काम नहीं करतीं. जब वे चुनाव लड़ती है, तब वह कहती हैं कि मैंने पहले ही 90 प्रतिशत काम मुसलमानों के लिए किया है. मुझे बताओ कि उन्होंने मुसलमानों, आदिवासियों के लिए क्या काम किया है?”

ममता के लिए एक और सिरदर्द असरदार मौलवी अब्बास सिद्दीकी हैं. बंगाल में मुसलमानों के बीच अब्बास की गहरी पकड़ है और उन्होंने AIMIM के साथ हाथ मिलाने में दिलचस्पी दिखाई है. ऐसा होने पर इन दो पार्टियों को अच्छा खासा समर्थन मिल सकता है जो टीएमसी को 50 से ज्यादा सीटों पर झटका देगा.

सोलंकी ने कहा, “हमने अब्बास सिद्दीकी से चर्चा की है, जो बंगाल में एक उभरते चेहरे हैं और उन्होंने चुनाव लड़ने की घोषणा की है... इसलिए अगर वे साथ आने को तैयार होते हैं तो हमारी पार्टी इस बारे में निर्णय लेगी.”

उनका कहना है, “हम मानते हैं कि बीजेपी और टीएमसी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं... हम मुद्दों पर चुनाव लड़ेंगे. हैदराबाद चुनावों में भी हमने अल्पसंख्यकों और गैर-अल्पसंख्यकों की ज़रूरतों जैसे स्कूलों, विश्वविद्यालयों और मेडिकल कॉलेजों पर काम किया है.”

 दिलचस्प बात यह है कि ये AIMIM ही थी जिस पर बिहार में बीजेपी से हाथ मिलाने और महागठबंधन के वोटों में सेंध लगाने का आरोप लगा.

AIMIM अपनी पूरी ताकत से बंगाल में टीएमसी के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर को भुनाने की सोच रही है. इसके कार्यकर्ताओं के पीटा जाने और जिलों में मीटिंग की अनुमति न मिलने से उन मुसलमानों में नाराजगी बढ़ी है जो ममता शासन में विश्वास खो चुके हैं.

 

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