कवि कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में निधन हो गया है. कुंवर नारायण की गिनती हिंदी के दिग्गज कवियों में की जाती है. उनकी कविता में मिथक, इतिहास, परंपरा और आधुनिकता का मेल नजर आता है. उन्होंने अपनी रचनाशीलता में वर्तमान को इतिहास और मिथक के जरिए ही देखा.
कुंवर नारायण का जन्म 19 सितंबर 1927 को हुआ था. कुंवर नारायण ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और अपने पुश्तैनी ऑटोमोबाइल के बिजनेस में घरवालों के साथ शामिल हो गए थे. कुंवर नारायण कविता के साथ कहानी, लेख, समीक्षा, रंगमंच पर लिखते रहे हैं. वो 6 दशक से साहित्यिक लेखन कर रहे हैं.
उनकी पहली किताब 'चक्रव्यूह' साल 1956 में आई थी. कुंवर को भारतीय साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च पुरस्कार 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया था. साल 1995 में उन्हें साहित्य अकादमी और साल 2009 में उन्हें पद्म भूषण अवार्ड मिला था. कुंवर ने साहित्य की कई विधाओं जैसे कविता, कहानियां, महाकाव्य, आलोचना, निबंध, सिनेमा और कला पर अत्यधिक लेखन किया.
अलग काव्य मुहावरों का इस्तेमाल
कुंवर नारायण के निधन पर मशहूर कवि जितेंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि नारायण बिल्कुल अलग रचनाओं के लिए जाने जाते थे और वो उनका लेखन अपने समकालीन कवियों से अलग था. उन्होंने उस दौरान प्रचलित मुहावरों को नहीं पकड़ा और अलग काव्य मुहावरों की रचना की. कुंवर नारायण ने भारतीय संस्कृति के मिथक को लेकर कई रचनाएं की थी और हवा के विपरीत लेखन के लिए वो जाने जाते थे.
जितेंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि नारायण अलग भाषा, विषय वस्तु से समाज के लिए चिंता व्यक्त करते हुए और परंपराओं को ध्यान में रखते हुए लेखन करते थे. उनकी भारतीय सिनेमा को लेकर की गई टिप्पणियां बेहद अलग है और गहरी अंतर्दृष्टि से लिखी गई हैं. नारायण राजनीतिक कवि नहीं थे और उनका सादगी से भरा व्यक्तित्व प्रेरणादायक है.
कुंवर नारायण दिल्ली के CR पार्क वाले घर में परिवार के साथ रहते थे. उनके पास पुराना एक इटैलियन टाइपराइटर है, जिसे वो अपना सबसे सच्चा साथी बताते थे. उनके बेटे अपूर्व ने ही उनकी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया है. उनकी प्रमुख रचनाओं में चक्रव्यूह, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों, वाजश्रवा के बहाने, आत्मजयी, आवाजें, अयोध्या 1992 आदि शामिल हैं. उनकी कविता अयोध्या 1992 की वजह से वो सुर्खियों में रहे थे.
कुंवर नारायण के निधन पर सोशल मीडिया पर भी लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं. यूजर्स उनकी कविताओं को पोस्ट करते हुए उन्हें याद कर रहे हैं. फेसबुक पर साहित्यकार, पत्रकार और अन्य दिग्गज हस्तियां नारायण को नमन कर रही हैं. उनकी वो कविताएं, जो फेसबुक पर लोग पोस्ट कर रहे हैं...
'प्रस्थान के बाद'
दीवार पर टंगी घड़ी
कहती − "उठो अब वक़्त आ गया।"
कोने में खड़ी छड़ी
कहती − "चलो अब, बहुत दूर जाना है।"
पैताने रखे जूते पाँव छूते
"पहन लो हमें, रास्ता ऊबड़-खाबड़ है।"
सन्नाटा कहता − "घबराओ मत
मैं तुम्हारे साथ हूं।"
यादें कहतीं − "भूल जाओ हमें अब
हमारा कोई ठिकाना नहीं।"
सिरहाने खड़ा अंधेरे का लबादा
कहता − "ओढ़ लो मुझे
बाहर बर्फ पड़ रही
और हमें मुँह-अंधेरे ही निकल जाना है..."
एक बीमार
बिस्तर से उठे बिना ही
घर से बाहर चला जाता।
बाक़ी बची दुनिया
उसके बाद का आयोजन है
अयोध्या 1992
हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !
तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य
अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं
चुनाव का डंका है !
हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान - किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक....
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !