हर साल वित्तीय वर्ष की शुरुआत में सरकार आम बजट के रूप में अपने पिछले खर्चों और आगामी योजनाओं का पूरा विवरण पेश करती है. यह व्यवस्था पिछले कुछ सालों से नहीं, बल्कि सैकड़ों साल पहले से भारत वर्ष में लागू है. आइए जानते हैं प्राचीन भारत में किस तरह से बजट और कर व्यवस्था थी और किस तरह सरकारी कोष की जानकारी दी जाती थी.
भारत में सदियों से टैक्स की व्यवस्था है और उस टैक्स को जनता के हित में खर्च करने का प्रावधान भी है. यह व्यवस्था राजकीय आधार पर और धार्मिक आधार पर होती है. इस्लाम में भी जकात के रूप में अपनी कमाई का 2 फीसदी हिस्सा देने के लिए कहा गया है.
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी बजट सिस्टम का जिक्र किया गया है. अर्थशास्त्र में मौर्य वंश के वक्त की राजकीय व्यवस्था के बारे में लिखा गया है. इसके अनुसार पहले भी रखरखाव, आगामी तैयारी, हिसाब-किताब का लेखा-जोखा बजट की तरह पेश किया जाता था.
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार हर साल वित्त मंत्री खजाने के ओपनिंग बैलेंस, वर्तमान खर्चे आदि के बारे में एक नोट तैयार करता था. उस वक्त जिन कार्यों पर काम चल रहा है उसे 'कर्णिय' और जो काम हो चुके 'सिद्धम' कहा जाता था. उसके आधार पर ही बजट तैयार होता था.
इसी के साथ ही साल के अंत में खजाने की जानकारी का क्लोजिंग बैलेंस का स्टेटमेंट तैयार किया जाता था. बजट में आगे के लिए विकास योजनाएं और खर्चे का भी ब्यौरा लिखा जाता था.
बता दें कि पहले व्यवस्था कर्तव्य के आधार पर चलती थी, जिसमें हर व्यक्ति का कर्तव्य लिखा जाता था और उसी के आधार पर काम किया जाता था. इसमें एक राजा का प्रजा के प्रति, एक व्यक्ति का समाज, घर परिवार के प्रति कर्तव्य तय होता था और उसी आधार पर उम्मीदवारों की सजा आदि भी तय की जाती थी.
मौर्य राजवंश के बाद दिल्ली के सुल्तान और मुगल शासकों ने भी इस व्यवस्था को लागू रखा और उनका फाइनेंशियल सिस्टम काफी अलग नहीं था. इस दौरान कुछ शासकों ने अपने अनुसार कुछ नियमों में बदलाव किए. हालांकि मूल बजट व्यवस्था में बदलाव नहीं हुआ.
इसके बाद जब ब्रिटिश शासन ने भारत को अपने अधिकार में ले लिया तो वहां ईस्ट इंडिया कंपनी के कानून प्रभावी होने लगे. 1833 तक कोई व्यवस्थित केंद्रीय वित्तीय व्यवस्था नहीं थी. 1833 के चार्टर अभिकरण के साथ स्थिति बदल दी गई, जिसमें इंडिया इन काउंसिल के गवर्नर जनरल के पास राजस्व का नियंत्रण निहित कर दिया गया.
आजादी के लिए हुई पहली जंग के बाद 1857 में वित्तीय व्यवस्था में इंग्लैंड के आधार पर सुधार किया गया. उसके बाद देश में केंद्रीय वित्तीय व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था लागू हुई.
18 फरवरी 1869 को गवर्नर जनरल इन काउंसिल के फाइनेंस मेंबर सर जेम्स विलंसन ने बजट पेश किया था, जिसे भारत का पहला बजट कहा जाता है, जो कि पूरी तरह से आधिकारिक तौर पर पेश किया गया था. उस वक्त संसद में कोई भी चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं था. साथ ही यह बजट ब्रिटिश संसद को नहीं पेश किया गया था.
बता दें कि 1858-1935 के बीच वित्तीय व्यवस्था एक जैसी थी और इसमें इसका मुखिया सेक्रेटरी-ऑफ-स्टेट इन काउंसिल होता था. साथ ही कई आधार पर कई अन्य समितियां भी इसके लिए काम करती थीं.
भारत की आजादी की घोषणा के बाद 2 फरवरी 1946 को लियाकत अली खान की ओर से
पेश किया गया, जो कि बाद में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने थे.
उसके बाद आजाद भारत में नंवबर 1947 में शनमुखम शेट्टी ने पहला बजट पेश किया और उसके बाद हर साल वित्तीय वर्ष की शुरुआत में भारत का बजट पेश किया
जाता है.