आज तड़के सुबह 3 बजकर 18 मिनट पर जैन मुनि तरुण सागर महाराज का 51 साल की उम्र में निधन हो गया. उन्होंने दिल्ली के शाहदरा के कृष्णानगर में अंतिम सांसे लीं. वे एक क्रांतिकारी संत के नाम से चर्चित थे और अपने बयानों को लेकर हमेशा चर्चा में रहते हैं. जानते हैं उनके जीवन के बारे में...
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तरुण सागर जी महाराज जैन धर्मं के भारतीय दिगंबर पंथ के काफी प्रसिद्ध मुनि थे. बचपन से ही उनका अध्यात्म की और बड़ा झुकाव था.
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जैन मुनि तरुण सागर का जन्म मध्य प्रदेश के दमोह में 26 जून, 1967 को हुआ था. उनकी मां का नाम शांतिबाई और पिता का नाम प्रताप चंद्र था. तरुण सागर ने आठ मार्च, 1981 को घर छोड़ दिया था. इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ में दीक्षा ली.
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उन्होंने 20 साल की उम्र में दिगंबर मुनि की दीक्षा लेना शुरू कर दिया था. बता दें, वह अपने प्रवचनों के लिए काफी मशहूर रहे हैं. वे मध्य प्रदेश और हरियाणा विधानसभा में प्रवचन भी दे चुके हैं. उनके प्रवचन पर काफी विवाद हुआ था.
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मुनि तरुण सागर की 'कड़वे प्रवचन' नाम से एक किताब भी है. उन्होंने कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी थी. उनके प्रवचन की वजह से उन्हें 'क्रांतिकारी संत' भी कहा जाता है.
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साल 2003 में उन्हें इंदौर में राष्ट्र संत की उपाधि से नवाजा गया था. वहीं जैन मुनि तरुण सागर को मध्यप्रदेश सरकार ने 6 फरवरी 2002 को राजकीय अतिथि का दर्जा दिया था.
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एक न्यूज चैनल में दिए इंटरव्यू में तरुण सागर ने बताया कैसे 6ठी कक्षा में पढ़ते पढ़ते वह जैन मुनि बनने की राह पर चल पड़े थे. उनके बारे में कहा जाता है कि वह जलेबी खाते- खाते संत बन गए थे.
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इस पर उन्होंने कहा था कि- 'बचपन में मुझे जलेबी काफी पसंद थी. उन्होंने बताया मैं उस समय 6ठी कक्षा की पढ़ाई कर रहा था. तो जब मैं स्कूल से वापस आ रहा था तो रास्ते में एक होटल पड़ता था जहां बैठकर मैं जलेबियां खाता था.
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उन्होंने आगे बताया- उसी होटल के पास में आचार्य पुष्पधनसागरजी महाराज का प्रवचन चल रहा था. और प्रवचन में वह रहे थे कि तुम भी भगवान बन सकते हो. उन्होंने कहा ये शब्द जब मेरे कानों में पड़े तो जलेबी का रस मेरे अंदर जाता रहा फिर भगवान बनने का रस पैदा हो गया. जिसके बाद संत बनने का रास्ता अपना लिया.
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आपको बता दें, जब वह 13 साल के थे तो उन्होंने अपना घर परिवार छोड़ दिया था. संत बनने के लिए उन्होंने खाना-पीना और कपड़े पहना छोड़ दिया था. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार जैन संप्रदाय के लोग संथारा प्रथा के तहत अन्न-जल छोड़ देते हैं, इसका लक्ष्य जीवन को खत्म करना होता है. जैन संप्रदाय की मान्यता के अनुसार इस तरह 'मोक्ष' प्राप्त किया जा सकता है.