फिल्म पद्मावती के विरोध के बीच करणी सेना का सबसे ज्यादा सामने आ रहा है. दरअसल फिल्म का विरोध कर रही करणी सेना के गठन और इसके नेताओं की कहानी काफी दिलचस्प है. अपने सामाजिक और राजनीतिक वजूद के लिए संघर्ष कर रहे राजपूतों की भावनाओं को बांधकर राजनीति कर रहे करणी सेना के कई नेता हैं और करणी सेना भी नाम से भी कई संगठन है. आइए जानते हैं करणी सेना के गठन और उनके नेताओं की पूरी कहानी.
2006 में अस्तित्व में आई करणी सेना के गठन की कहानी काफी पुरानी है. राजपूत राजनीतिक और सामाजिक रुप से आरक्षण मिलने से गांवों में जाट प्रधान, सरपंच जैसे पदों पर काबिज होने लगे और राजपूतों का आधिपत्य कम होने लगा. बीजेपी ने भैरोसिंह शेखावत को उपराष्ट्रपति बनाकर दिल्ली भेज दिया और यहां जाट राजघराने की महारानी और राजपूत की बेटी के नाम से सियासी नारा देकर वसुंधरा राजे को नेता बना दिया.
उस वक्त बीजेपी के नेता देवी सिंह भाटी और लोकेंद्र सिंह कालवी ने अगड़ों को आरक्षण और पिछड़ों को संरक्षण देने के नाम पर राजस्थान में सामाजिक न्याय मंच की नींव रखी. राजपूतों की सामाजिक न्याय मंच के बैनर तले बड़ी-बड़ी रैलियां होने लगीं और सामाजिक न्याय मंच को राजनीतिक पार्टी बनाकर राजपूतों ने चुनाव लड़ा.
हालांकि वसुंधरा राजे और प्रमोद महाजन की रणनीति से राजपूतों की भीड़ 2003 के विधानसभा चुनाव में सामाजिक न्याय मंच को अकेला छोड़ बीजेपी के पाले में चली गई. चुनावों में मंच को केवल एक सीट मिल पाई और देवी सिंह भाटी ही चुनाव जीत पाए और बाद में वो बीजेपी में चले गए.
सामाजिक न्याय मंच की असफलता के बाद यहीं से राजपूतों को आरक्षण दिलाने के नाम पर 23 दिसंबर 2006 में करणी सेना का जन्म हुआ. करणी माता एक लोक देवी हैं जिन्हें राजपूत पूजते हैं. उस वक्त अजीत सिंह मामडोली इसके प्रदेशाध्यक्ष बने और सामाजिक न्याय मंच के संयोजक रहे लोकेंद्र सिंह कालवी अब करणी सेना के संयोजक बन गए.
करणी सेना के लोग आंदोलन समेत कई अलग-अलग मुद्दों पर आंदोलन करते रहे, लेकिन उन्हें किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. इसी बीच 2008 में फिल्म जोधा-अकबर की शूटिंग जयपुर में शुरु हुई और करणी सेना इसका विरोध कर सुर्खियों में आया और फिल्म को रिलीज नहीं होने दिया.
उस वक्त करणी सेना काफी लोकप्रिय थी और उस वजह से 2008 में कांग्रेस ने करणी सेना के संयोजक लोकेंद्र सिंह कालवी को कांग्रेस में शामिल कर लिया. उसके बाद करणी सेना में फूट पड़ना शुरु हो गई. 2008 में करणी सेना लोकेंद्र सिंह कालवी ने छोड़ी तो राजनीतिक पार्टी में जाने की वजह से उनका विरोध हुआ. इससे नाराज कालवी ने करणी सेना को हीं भंग करने का एलान कर दिया.
तब करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष अजीत सिंह मामडोली, लोकेंद्र सिंह कालवी को करणी सेना से निकालकर खुद इसके नेता बन गए. उसके बाद 2010 में नई श्री राजपूत करणी सेना बनाई गई और श्याम सिंह रुआं को इसका प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया. उसके बाद अजीत सिंह मामडोली और रुआं के बीच बढ़ते विवाद को लेकर इसके अध्यक्ष श्याम प्रताप रुआं ने करणी सेना छोड़ दी.
उसके बाद लोकेंद्र सिंह कालवी ने 2012 में करणी सेना का प्रदेशअध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को बना दिया. गोगामेड़ी पर कई आपराधिक मुकदमे चल रहे थे और दो बाद बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके थे. हालांकि सुखदेव सिंह गोगामेड़ी और लोकेंद्र कालवी के बीच विवाद हो गया और सुखदेव सिंह गोगामेड़ी ने राष्ट्रीय श्री राजपूत करणी सेना के नाम से अलग संगठन बना लिया.
बता दें कि कांग्रेस के बाद साल 2014 में लोकसभा चुनावों से पहले कालवी बसपा के साथ आ गए, लेकिन इस बार भी वे चुनावी समर में नहीं आए. कालवी ने एक बार बाड़मेर-जैसलमेर सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें हार मिली. इस सीट से उनके पिता कल्याण सिंह कालवी सांसद चुने गए थे. कल्याण सिंह केंद्र में चंद्रशेखर की सरकार में मंत्री थे.
अब राजपूतों के बीच लोकप्रिय होने और राजपूतों के नेता बनने की लड़ाई तीनों करणी सेना के बीच शुरू हो गई. इसका नजारा राजस्थान के अपराधी आनंदपाल सिंह के एनकाउंटर के समय देखने को मिला, जब तीनों ही एक से बढ़कर एक उग्र बातें बोलकर राजपूत समाज का ध्यान खिंचने की कोशिश कर रहे थे. अब ये संगठन अलग अलग बयानों की वजह से मीडिया में बने रहने की कोशिश करते रहते हैं.