जहां हम आए दिन पानी की बर्बादी करते
हैं, वहीं एक शख्स ने पानी की अहमियत साबित समझते हुए गांव
वालों की प्यास बुझाने के लिए 33 फीट कुआं
खोद डाला. जुनून बिल्कुल वैसा ही है जैसा
पहाड़ तोड़ने वाले शख्स दशरथ मांझी में
था... आइए जानते हैं इनके बारे में..
बुंदेलखंड क्षेत्र के छतरपुर जिले के रहने
वाले इस शख्स का नाम सीताराम लोढी है.
इनकी उम्र करीब 70 साल है. अपने परिवार
वालों और गांव वालों के लिए उन्होंने कुआं खोदने के बारे में
सोचा.
(फोटो- हेमेंद्र शर्मा)
बुंदेलखंड इलाके में आने वाला छतरपुर
जिला सूखा प्रभावित जिला माना जाता है.
सूखे के दौरान यहां के लोगों और जानवरों को पानी की कमी की वजह से गांव
को छोड़कर भी जाना पड़ जाता है. जब इस बात का
एहसास सीताराम को हुआ तो उन्होंने कुआं
खोदने की ठानी.
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार कुआं खोदने का काम उन्होंने साल 2015 में शुरू किया. जैसे दशरथ मांझी को पहाड़ तोड़ते हुए देख लोग पागल समझते थे, ठीक वैसे ही सीताराम
को कुआं खोदते हुए लोग पागल कहने लगे. लोगों
को लगता था 70 साल का ये बुजुर्ग जमीन
खराब कर रहा है. (फोटो- हेमेंद्र शर्मा)
आपको बता दें, सीताराम ने शादी
नहीं की. उन्होंने बताया मैंने अपना सारा
जीवन परिवार की सेवा में लगा दिया है.
वह अपने भाई के साथ रहते हैं जिनके पास
20 एकड़ जमीन है.
एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया सूखे के
मौसम में पीने के लिए पानी का कोई व्यवस्था
नहीं होती है.ऐसे स्थिति में खाली पड़ी 20 एकड़ जमीन पर खेती कर भी संभव नहीं है. हमारे पास पानी खरीदने के पैसे नहीं थे. न ही इतनी गुजाइंश थी कि कुएं या नल का इंतजाम कर सकें. इसलिए मैंने अकेले ही कुआं खोदने का फैसला किया.
उनके परिवार वालों ने बताया कई बार मना करने पर भी सीताराम नहीं रुके. कई लोगों ने उन्हें समझाया की कुएं में से पानी इतनी आसानी से नहीं निकलेगा. लेकिन उन्होंने किसी एक की न सुनीं. वह हर सुबह फावड़ा और तसला लेकर कुआं खोदने चले जाते थे. (फोटो- हेमेंद्र शर्मा)
लगातार मेहनत करने के बाद सफलता एक दिन मिल
ही जाती है. उन्होंने 70 साल की उम्र में 18
महीने तक बेजोड़ मेहनत कर 33 फीट का
कुआं खोद पानी निकाल ही दिया. सीताराम के
लिए ये उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा खुशी का दिन
साबित हुआ.
लेकिन उनकी ये खुशी कुछ दिन के लिए ही
थी. क्योंकि कुछ दिनों बाद कुआं बरसात के
पानी में ढह गया. जिस वजह से उनकी सारी
मेहनत बेकार हो गई. बता दें कि सीताराम ने बिना सरकारी मदद के अकेले कुआं खोदा.
कुआं खोदने के लिए सीताराम हर रोज
सुबह काम शुरू करते और दोपहर की धूप में
काम बंद कर देते. जैसे ही धूप थोड़ी कम
होती वे फिर से काम पर लगते और सूरज
ढलने तक फावड़ा और कुदाल चलाते रहते.
एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि
रोज कितना कुआं खोदते तो उन्होंने कहा रोज
50-60 मिट्टी से भरा तसला फेंक दिया करते थे.
जब उनसे पूछा गया कि क्या कभी डर नहीं
लगा, तब उन्होंने बताया मुझे कभी कुआं
खोदने में डर नहीं लगा. इस बात पर उन्होंने
कहा हमारे यहां के पंडितजी कहते थे- ''हारिये न हिम्मत, बिसारिये न राम जहां देख
वहां खड़े हैं भगवान''.
उन्होंने कहा मैं कुआं अनाज के लिए खोद
रहा हूं क्योंकि जब तक पानी नहीं होगा तो
खेतों में फसल पैदा नहीं होगी. (फोटो- हेमेंद्र शर्मा)
सीताराम ने बताया कि जब वह कुआं
खोदने जाते थे, तो उनके परिवार वाले शाम
को उनसे मिलने नहीं आते थे न ही उनके बारे
में कुछ पूछते थे. उन्होंने बताया परिवार वाले
कहते थे, जब पानी निकल जाए तब आएंगे.
(फोटो- हेमेंद्र शर्मा)
आज उनका खोदा हुआ 33 फीट का कुआं
बरसात के पानी में ढह गया है. सीताराम का
कहना है अगर सरकार से उसे प्लास्टर कराने
के लिए मदद मिल जाए तो वह दोबारा कुआं
खोद सकते हैं. वहीं टाइम्स ग्रुप के मुताबिक लवकुश नगर
के जिला पंचायत सीईओ आरके शर्मा ने
बताया कि उन्हें नहीं पता कि सीताराम ने
कपिल धारा योजना के तहत मदद के लिए
आवेदन किया है या नहीं. इस योजना के
तहत सरकार की ओर कुआं खोदने के लिए
1.8 लाख रुपये की मदद की जाती है. हालांकि
ऐसी कोई भी योजना नहीं है जिसके तहत खुद
कुआं खोदने वाले व्यक्ति को मदद दी जाए.
भले ही सीताराम का खोदा हुआ कुआं तैयार
नहीं हो पाया, लेकिन आज प्रयास जारी है.