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IAS की फैक्ट्री बन रहे इंजीनियरिंग के क्लासरूम... क्या हम हमारे टेक टैलेंट को गंवा रहे हैं?

सिविल सेवा परीक्षा में जो उम्मीदवार चुने जा रहे हैं, उसमें आधे से ज्यादा उम्मीदवार इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या इससे इंजीनियरिंग छात्रों पर लग रहे रिसोर्स का सही इस्तेमाल हो पा रहा है?

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सिविल सर्विसेज में इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के उम्मीदवार बड़ी संख्या में चुने जा रहे हैं. (Photo: Pixabay)
सिविल सर्विसेज में इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के उम्मीदवार बड़ी संख्या में चुने जा रहे हैं. (Photo: Pixabay)

क्या अब इंजीनियरिंग क्लासरूम यूपीएससी कोचिंग सेंटर बनते जा रहे हैं? या फिर अब आईएएस या आईपीएस जैसे पदों तक पहुंचने का रास्ता इंजीनियरिंग से होकर ही गुजरने लगा है? पिछले कुछ सालों के रिकॉर्ड्स से तो ये ही लग रहा है. कुछ सालों से ऐसा ट्रेंड बन गया है कि बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स पहले इंजीनियरिंग करते हैं और फिर सिविल की परीक्षा देकर प्रशासनिक सेवाओं में चले जाते हैं. लेकिन, अब सवाल यह नहीं है कि इंजीनियर अफसर क्यों बन रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या यह ट्रेंड भारत की तकनीकी शिक्षा और सार्वजनिक संसाधनों के लिए एक गंभीर चेतावनी है.     

सवाल ये भी है कि क्या ये एक सार्वजनिक सीट की बर्बादी नहीं है? या ये उस उम्मीदवार के साथ नाइंसाफी नहीं है, जो कड़ी मेहनत से सिर्फ इंजीनियरिंग करने के उद्देश्य से आईआईटी, एनआईटी में एडमिशन के लिए तैयारी करता है और कुछ नंबरों से एडमिशन नहीं ले पाता. दूसरा नुकसान यह कि सिविल सर्विस की एक सीट उस उम्मीदवार को नहीं मिली, जिसका शैक्षणिक आधार इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र या प्रशासन जैसे विषयों में हो सकता था. ये ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि उसके आगे एडमिशन पाने वाले उम्मीदवार पूरी पढ़ाई करने के बाद अपनी तकनीकी पढ़ाई का इस्तेमाल उस फील्ड में नहीं कर रहे हैं. उन पर जो रिसोर्स खर्च किए गए हैं, उनका इस्तेमाल भी वैसे नहीं हो रहा है, जैसे होना था. 

अगर डेटा पर नजर डालें तो सिविल सेवा परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों में हर साल 55 से 65 प्रतिशत तक उम्मीदवार इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से होते हैं. 2013 से लेकर हाल के सालों तक टॉपर्स की सूची देखें तो मैकेनिकल, सिविल, इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर इंजीनियरों की संख्या सबसे अधिक रही है. कई सालों में तो टॉप-10 में 7–8 उम्मीदवार इंजीनियरिंग से रहे हैं. यह बताता है कि सिविल सर्विसेज अब एक तरह से इंजीनियर-डॉमिनेटेड सर्विस बनती जा रही है. 

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हाल ही में आईआईटी दिल्ली की एलुमनी इम्पैक्ट रिपोर्ट 2026 आई है, जिससे पता चला है कि सिर्फ आईआईटी दिल्ली से ही 270 आईएएस, 100 से अधिक आईपीएस, आईआरएस और आईएफएस अधिकारी बन चुके हैं. ऐसे ही देश में कई आईआईटी हैं, जैसे आईआईटी कानपुर को यूपीएससी फैक्ट्री भी कहा जाता है और वहां के 600 स्टूडेंट अधिकारी बन चुके हैं. अगर सभी आईआईटी और अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों का आंकड़ा जोड़ा जाए तो बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के अधिकारी मिल जाएंगे. 

कितने इंजीनियर, अधिकारी बन रहे हैं?

साल 2017 से 2021 के बीच चयनित उम्मीदवारों में लगभग 60 से 65 प्रतिशत उम्मीदवार इंजीनियरिंग डिग्रीधारी रहे. यानी पांच साल में चुने गए करीब 4,300 उम्मीदवारों में से लगभग 2,700 से ज्यादा इंजीनियर थे. 2017 में 699, 2018 में 509, 2019 में 582, 2020 में 541, 2021 में 452 अधिकारी इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के थे. इसके अलावा बड़ी संख्या में मेडिकल साइंस  के भी काफी उम्मीदवार शामिल हैं. इसके बाद के सालों में भी ये ट्रेंड बरकरार रहा और टॉपर्स से लेकर अन्य उम्मीदवारों में काफी संख्या इंजीनियर्स की रही. 

ये बात बिल्कुल सही है कि संविधान सभी को बराबरी का हक देता है और किसी भी फील्ड का उम्मीदवार सिविल सेवा परीक्षा में हिस्सा ले सकता है. असली सवाल यह है कि जब देश एक इंजीनियर तैयार करने पर भारी सरकारी खर्च करता है, तो क्या उसका इस तरह सिस्टम से बाहर निकल जाना राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी नहीं है?

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एक IIT छात्र की पढ़ाई पर सरकार औसतन 20 लाख रुपये तक खर्च करती है. 2016 में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, हर साल आईआईटी स्टूडेंट पर हर साल 5.2 लाख रुपये खर्च होते हैं यानी चार साल में करीब 20 लाख रुपये. अगर यही छात्र इंजीनियरिंग के क्षेत्र में काम ही नहीं करता, न रिसर्च करता है, न इंडस्ट्री में जाता है, तो उस निवेश का सामाजिक रिटर्न कहां गया?

क्या इंजीनियरिंग में नहीं बन रहा करियर?

लेकिन, सवाल ये भी है कि इंजीनियर्स सिविल सर्विसेज की ओर मुड़ रहे हैं तो कहीं ये इस वजह से तो नहीं है कि देश का इंजीनियरिंग जॉब मार्केट खुद संकट में है. लाखों इंजीनियर हर साल निकलते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण नौकरियां सीमित हैं.  निजी क्षेत्र में अस्थिरता, कम वेतन और जॉब सिक्योरिटी की कमी कई युवाओं को सरकारी सेवाओं की ओर धकेलती है. 

मगर इससे दिक्कत ये है कि अब सिविल सेवा में अलग अलग पृष्ठभूमि के अधिकारियों की कमी होती जा रही है. समाजशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों से आने वाले लोगों की कमी हो रही है. नतीजा ये है कि नीतियां अब सिर्फ एक ही बैकग्राउंड से आए लोग बना रहे हैं. वैसे कई इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वाले अफ़सरों ने ई-गवर्नेंस, डिजिटल इंडिया, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी आधारित पॉलिसी में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया है.

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अगर इंजीनियरिंग से टॉपर्स का सिविल सर्विसेज में जाने का ट्रेंड और मजबूत हो जाएगा तो तकनीकी क्षेत्र में इनोवेशन, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को कौन आगे बढ़ाएगा? जरूरत इस बात की है कि इंजीनियरिंग का लक्ष्य सिर्फ अफसर बनने की सीढ़ी नहीं, बल्कि तकनीकी क्षेत्र में देश का आधार मजबूत करना होगा.

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