नीट (NEET-UG 2026) पेपर लीक विवाद के बाद देश की सबसे बड़ी परीक्षा एजेंसी यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) चौतरफा सवालों के घेरे में है. लेकिन अब जो सबसे बड़ा और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है, वो NTA के प्रशासनिक ढांचे और उसके वजूद को लेकर है. सरकारी दस्तावेज़ों ने साफ कर दिया है कि जिस एजेंसी पर देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य और इतनी संवेदनशील परीक्षाओं को निष्पक्ष कराने का जिम्मा है, उसकी बुनियादी नींव ही कितनी कमजोर और अस्थायी (एडहॉक) है.
सिर्फ 50 रुपये की फीस पर रजिस्टर्ड है देश की इतनी बड़ी एजेंसी!
दस्तावेजों से जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई है, वो यह है कि NTA का गठन किसी मजबूत संवैधानिक या स्वायत्त संस्था की तरह नहीं किया गया है.
सहकारिता कानून का मॉडल: राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर यह सवाल बेहद गंभीर हो चुका है कि NTA काम तो केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के लिए करती है, लेकिन इसका गठन सहकारिता कानून के तहत एक 'सोसायटी मॉडल' पर किया गया है.
महज 50 रुपये का रजिस्ट्रेशन: आधिकारिक दस्तावेज़ों के मुताबिक, NTA का रजिस्ट्रेशन 'सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860' के तहत 15 मई 2018 को दिल्ली में कराया गया था, जिसके लिए सिर्फ 50 रुपये की मामूली फीस दी गई थी. आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल और इंजीनियरिंग एंट्रेंस को संभालने वाली संस्था का कानूनी आधार इतना हल्का होना चाहिए?
UPSC और SSC से तुलना: क्यों 'एडहॉक' व्यवस्था पर चल रही है NTA?
आज देश भर में NTA की कार्यप्रणाली की तुलना संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी स्थापित संस्थाओं से की जा रही है. जहां यूपीएससी और एसएससी जैसी संस्थाओं का गठन एक बेहद मजबूत वैधानिक, संस्थागत और संवैधानिक ढांचे के तहत हुआ है, वहीं NTA को लेकर आरोप लग रहे हैं कि इतनी बड़ी राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी आज भी सिर्फ एक “एडहॉक सिस्टम” (अस्थायी व्यवस्था) पर घिसट रही है.
स्पष्ट बायलॉज की कमी: किसी को भी सौंप दिए जाते हैं संवेदनशील काम!
शिक्षाविदों और आलोचकों का कहना है कि NTA के पास एक मजबूत वैधानिक ढांचे और स्पष्ट बायलॉज (उपनियमों) की भारी कमी है. इसी लचर व्यवस्था का नतीजा है कि परीक्षा संचालन और पेपर सेटिंग जैसे बेहद गोपनीय और संवेदनशील काम किसी को भी सौंप दिए जाते हैं, जिससे सिस्टम में सेंध लगाना आसान हो जाता है.
सोसायटी मॉडल होने के कारण संस्था के भीतर सदस्यों की नियुक्ति और उनकी जिम्मेदारियां मनमाने तरीके से तय की जा सकती हैं, जिसमें पारदर्शिता की भारी कमी दिखती है.
पेपर लीक होते ही चार अधिकारियों को हटाया, और गहरे हुए सवाल
इस लचर प्रशासनिक ढांचे की गवाही हाल ही का वो फैसला भी दे रहा है, जिसमें पेपर लीक का महा-विवाद बढ़ते ही आनन-फानन में NTA के चार वरिष्ठ अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर वापस भेज दिया गया. विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकारियों को इस तरह अचानक हटाना यह साफ दर्शाता है कि संस्था के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है और इसकी अंदरूनी कार्यप्रणाली से जुड़े संदेह अब और ज्यादा गहरे हो गए हैं.
करोड़ों छात्रों की मेहनत को सुरक्षित रखने के लिए क्या अब वक्त आ गया है कि इस 50 रुपये वाले 'सोसायटी मॉडल' को बदलकर एक जवाबदेह और वैधानिक राष्ट्रीय परीक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाए? यह सवाल आज हर छात्र और अभिभावक पूछ रहा है.