चीन में रिटायर्ड लोगविदेश में पढ़ाई करने जा रहे हैं. अचानक से ये ट्रेंड वहां पॉपुलर हो रहा है. इसके पीछे बड़ी वजह है, नौकरी की भागादौड़ी में पीछे छूटे अपने सपनों या मनपसंद पढ़ाई को पूरा करना. रिटायर होने के बाद आराम करने के बजाय लोग अपने पीछे छूट गए इन सपनों को पूरा करने में लगे हुए हैं. इसके लिए उनके पास रिटायरमेंट के बाद काफी समय और पर्याप्त पैसा भी होता है. फैशन डिजाइन, प्रिंटमेकिंग, आभूषण बनाने और फोटोग्राफी से जुड़ी पढ़ाई पर फोकस कर रहे हैं, जो कभी उनका शौक या पैशन था.
पहले ज्यादातर युवा ही बाहर पढ़ने जाते थे, लेकिन अब बुज़ुर्ग भी इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं. इसके कारण चीन की शिक्षा व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है. उसे ऐसे कोर्स और सुविधाएं बनानी पड़ेंगी जो बड़ी उम्र के लोगों के लिए सही हो.
कोर्स के लिए पहुंची विदेश
बता दें कि 66 साल की किउ लियानरु पिछले साल इंग्लैंड की बॉर्नमाउथ आर्ट्स यूनिवर्सिटी में एक शॉर्ट टाइम कोर्स में एडमिशन लिया था. इससे पता चलता है कि उम्र सीखने में रुकावट नहीं बनती. किउ ने आम लोगों की तरह शांत और आराम से जीवन बीताने की बजाय अपना सपना पूरा करने पर ध्यान दिया. वह विदेश में फैशन डिजाइन, प्रिंटमेकिंग, आभूषण बनाना और फोटोग्राफी जैसे विषय पढ़ रही हैं. वह एक हॉस्टल में रहती हैं, ठीक वैसे ही जैसे दूसरे छात्र रहते हैं. उनका कहना है कि पढ़ाई करने से उन्हें अंदर से खुशी और संतोष मिलता है.
मैं हमेशा चमकना चाहती हूं...
किउ कहती हैं कि मैं रिटायरमेंट के बाद भी अंदर और बाहर से चमकते रहना चाहती हूं. बीजिंग की रहने वाली किउ 1978 में विश्वविद्यालय की छात्रा थीं, उस दौर में महिलाओं को कम मौका मिलता था, उन्होंने रेलवे इंजीनियर के रूप में काम किया और 2014 में रिटायर हो गईं. साल 2024 में उनकी एक हड्डी टूट गई, जिसके कारण उन्हें एक साल तक घर पर आराम करना पड़ा. इस दौरान उन्होंने सोचा कि क्यों न अपने पुराने सपने पूरे किए जाएं. तभी से उनके मन में विदेश जाकर पढ़ाई करने की इच्छा मजबूत हो गई.
कई दिक्कतों का करना पड़ा सामना
किउ का विदेश में पढ़ने का सपना सोचने में जितना आसान लग रहा था वाकई में उतना था नहीं. भाषा की दिक्कत और आवेदन की प्रक्रिया समझने में परेशानी की वजह से किउ ने सीधे खुद आवेदन नहीं किया बल्कि उन्होंने एक विदेशी शिक्षा संस्था की मदद से एक शॉर्ट टर्म कोर्स चुना.
बना बुज़ुर्ग लोगों के लिए क्लब
जिस संस्था से किउ ने मदद ली थी उसके सह-संस्थापक जी वेनली थे, जो 2024 में रिटायर हुए. जी ने खास तौर पर बुज़ुर्ग लोगों के लिए एक क्लब बनाया है, जो विदेश में पढ़ाई करना चाहते हैं. पिछले एक साल में यह संस्था लगभग 300 वरिष्ठ लोगों को छोटे समय के पढ़ाई कार्यक्रमों के लिए विदेश भेज चुकी है. ये कार्यक्रम आमतौर पर 2 से 4 हफ्तों के होते हैं. इनकी फीस 20,000 से 60,000 युआन (2,62,000 से 7,87,000 रुपये) तक हो सकती है. इसमें हवाई टिकट शामिल नहीं होता. यह संस्था छात्रों की मदद के लिए ट्रांसलेटर और पढ़ाई में सहायता करने वाले शिक्षक भी उपलब्ध कराती है, ताकि बुज़ुर्ग छात्रों को कोई परेशानी न हो.
लाइव स्ट्रीम कार्यक्रम का आयोजन
इतना ही नहीं जी ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए विदेश में पढ़ाई पर एक लाइव-स्ट्रीम कार्यक्रम का आयोजन किया. इस कार्यक्रम के बाद उन्हें 500 से ज्यादा संदेश मिले, जिनमें बुज़ुर्ग लोग विदेश के कोर्स के बारे में जानकारी लेना चाहते थे. जी का कहना है कि रिटायर होने के बाद कई लोगों को लगता है कि उनकी जिंदगी में कुछ कमी आ गई है. जब उन्हें वरिष्ठ कहकर अलग कर दिया जाता है, तो वे खुद को समाज से थोड़ा अलग महसूस करते हैं.
बचपन के सपनों को पूरा करना का समय
किउ ने भी बताया कि विदेश में पढ़ाई करना उनका बचपन का सपना था, लेकिन नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से वह सपना पूरा नहीं हो पाया. लेकिन अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें यह मौका मिला है. विदेश के कई बड़े और मशहूर शिक्षण संस्थानों ने भी देखा कि बुजुर्ग लोग पढ़ाई में रुचि ले रहे हैं. इसलिए उन्होंने खास तौर पर वरिष्ठ छात्रों के लिए अलग कार्यक्रम शुरू किया है.
महिलाओं की संख्या अधिक
खास बात यह है कि इस कार्यक्रम में महिलाओं ने ज्यादा रुचि दिखाई है. इसे लेकर जी ने बताया कि उनके 85 प्रतिशत से अधिक ग्राहक महिलाएं हैं. उनका कहना है कि इन महिलाओं ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा परिवार के लिए त्याग में बिताया और उन्हें अपने लिए जीने का मौका बहुत कम मिला. उनके ज्यादातर ग्राहक अच्छे परिवार से आते हैं, इसलिए वे विदेश में पढ़ाई का खर्च उठा पाते हैं.
क्यों बढ़ रहा है यह चलन ?
East China Normal University के शंघाई म्युनिसिपल इंस्टीट्यूट फॉर लाइफलोंग एजुकेशन के एक अधिकारी ने कहा कि जो लोग अब रिटायर हो रहे हैं, वे 1978 में शुरू हुए चीन के सुधार और खुलेपन की नीति के समय के लाभार्थी हैं. उन्हें पहले की पीढ़ियों से बेहतर शिक्षा मिली और उनके जीवन के लक्ष्य भी ज्यादा विविध हैं. इस कड़ी में ली नाम के विशेषज्ञ ने अनुमान लगाया कि भविष्य में विदेश में वरिष्ठ नागरिकों की शिक्षा, चीन की “वरिष्ठ अर्थव्यवस्था” (Senior Economy) का एक बेहद अहम हिस्सा बन जाएगा.
तेजी से बढ़ रही है बुजुर्ग आबादी
चीन में बुज़ुर्ग आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है. 2025 तक 60 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 32 करोड़ से ज्यादा हो गई, जो पिछले साल से 13 करोड़ अधिक है. इसका मतलब है कि आने वाले समय में बुज़ुर्गों की जरूरतों और इच्छाओं पर ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा. चीन में 60 साल या उससे अधिक उम्र के लोग की कुल आबादी लगभग 23 फीसदी है. अनुमान है कि 2035 तक यह 30 फीसदी तक पहुंच जाएगा और 2050 के आसपास यह अपने सबसे हाई लेवल पर पहुंच सकता है. इसका मतलब है कि काम करने वाली आबादी कम होगी और देश के लिए आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां बढ़ेंगी.
चीन की शिक्षा व्यवस्था पर बड़ी चुनौती
इसी बीच, चीन की शिक्षा व्यवस्था को भी एक नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. कई बुज़ुर्ग लोग रिटायरमेंट के बाद पढ़ाई करना चाहते हैं, इसलिए उनके लिए बेहतर और अलग तरह के कोर्स तैयार करने की जरूरत है. Li Jiacheng ने कहा कि शंघाई में बुज़ुर्गों के लिए जो सरकारी स्कूल हैं, जिन्हें “वरिष्ठ विश्वविद्यालय” कहा जाता है. वहां पर ज्यादातर शौक से जुड़े कोर्स जैसे संगीत, पेंटिंग समेत कई कोर्स होते हैं. उनका मानना है कि अब ऐसे कार्यक्रम बनाने की जरूरत है जो सिर्फ शौक तक सीमित न हों, बल्कि अच्छी नॉलेज भी दे. उन्होंने यह भी बताया कि इन संस्थानों में शिक्षकों की कमी है, जिससे पढ़ाई की गुणवत्ता पर असर पड़ता है.