करीब 17 साल बाद बांग्लादेश ऐसी चुनावी दहलीज पर खड़ा है, जहां सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा तय होगी. 2024 में छात्र आंदोलनों पर हुई हिंसक कार्रवाई, लगभग 1,400 लोगों की मौत, शेख हसीना का सत्ता से बेदखल होना और भारत में निर्वासन. इन सबके बाद यह पहला संसदीय चुनाव है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या बांग्लादेश सच में लोकतांत्रिक बदलाव की राह पर आगे बढ़ेगा? गुरुवार, 12 फरवरी को देशभर में मतदान हो रहा है. चुनाव प्रचार मंगलवार सुबह खत्म हो गया है. आइए विस्तार से समझते हैं कि मतदान कैसे होगा, दांव पर क्या है और कौन-कौन मैदान में है।
कब और कैसे होगा मतदान?
मतदान सुबह 7:30 बजे (01:30 GMT) शुरू होगा.
शाम 4:30 बजे (10:30 GMT) तक वोट डाले जाएंगे,
पूरे देश के 64 जिलों में 42,761 मतदान केंद्रों पर वोटिंग होगी.
कुल 300 संसदीय सीटों के लिए चुनाव होगा
बांग्लादेश में 127,711,793 पंजीकृत मतदाता हैं (31 अक्टूबर 2025 तक के आंकड़े). पहली बार डाक मतपत्र (पोस्टल बैलेट) की सुविधा दी गई है, जिससे लगभग 1.5 करोड़ प्रवासी कामगार भी वोट डाल सकेंगे.
बांग्लादेश में चुनाव प्रणाली कैसे काम करती है?
बांग्लादेश में एकसदनीय संसद (Unicameral Legislature) है, जिसे जतियो शंगसद (Jatiyo Shangsad) कहा जाता है.
कुल सीटें: 350
300 सीटें सीधे चुनाव से चुनी जाती हैं
50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं
चुनाव प्रणाली: First-Past-The-Post (FPTP)
मतदाता उम्मीदवारों की सूची में से एक नाम चुनता है. जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही जीतता है—चाहे उसे 50% से कम वोट ही क्यों न मिले. उदाहरण के तौर पर अगर कोई पार्टी हर सीट पर 51% वोट से जीतती है और दूसरी पार्टी 49% पाती है, तो पहली पार्टी को 100% सीटें मिल सकती हैं.
सरकार कैसे बनती है?
जो पार्टी 151 सीटें जीत लेती है, वह अकेले सरकार बना सकती है. दूसरे नंबर की पार्टी विपक्ष बनती है.
इस चुनाव में दांव पर क्या है?
यह चुनाव इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि जनवरी 2024 का चुनाव विपक्ष के बहिष्कार के कारण विवादित रहा. जुलाई 2024 में छात्रों ने सरकारी नौकरी में कोटा व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. सरकार की सख्त कार्रवाई में लगभग 1,400 लोग मारे गए. बाद में शेख हसीना सत्ता से हटा दी गईं और भारत चली गईं. अंतरिम सरकार की कमान नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने संभाली.
हसीना को नवंबर में अनुपस्थिति में मानवता के खिलाफ अपराधों में दोषी ठहराकर मौत की सजा दी गई. उनकी पार्टी आवामी लीग पर भी राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है. साथ ही, इस बार चुनाव के साथ जुलाई नेशनल चार्टर 2025 पर जनमत संग्रह भी होगा, जो संविधान संशोधन और कानूनी बदलावों का रोडमैप तय करेगा.
मुख्य राजनीतिक दल कौन-कौन हैं?
1. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP)-10 दलों के गठबंधन का नेतृत्व
नेता: तारिक रहमान (पूर्व पीएम खालिदा जिया के बेटे)
समर्थन: लगभग 33% (दिसंबर 2025 सर्वे के अनुसार)
विचारधारा: बांग्लादेशी राष्ट्रवाद
BNP पहले आवामी लीग की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रही है.
2. जमात-ए-इस्लामी (JIB)
11 दलों के गठबंधन का नेतृत्व
नेता: शफीकुर रहमान
समर्थन: लगभग 29%
पहले BNP की सहयोगी रही जमात अब उसकी बड़ी प्रतिद्वंद्वी बन चुकी है. इस बार पार्टी ने पहली बार एक हिंदू उम्मीदवार को टिकट दिया है.
3. अन्य दल
इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश
जातीय पार्टी (पूर्व में आवामी लीग की सहयोगी)
नतीजे कब आएंगे?
आमतौर पर अगले दिन सुबह तक रुझान आने लगते हैं. लेकिन इस बार जनमत संग्रह और ज्यादा उम्मीदवारों के कारण गिनती में अधिक समय लग सकता है.
युवा मतदाता की बड़ी भूमिका
इस बार बड़ी संख्या में Gen-Z मतदाता पहली बार वोट डालेंगे. यही युवा वर्ग 2024 के आंदोलन की अगुवाई कर रहा था.
यह चुनाव कई कारणों से ऐतिहासिक माना जा रहा है. इसे सिर्फ सत्ता परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा तय करने वाले मोड़ के रूप में देखा जा रहा है. आइए समझते हैं क्यों:
1. 17 साल बाद वास्तविक प्रतिस्पर्धा की उम्मीद
करीब 17 वर्षों से देश की राजनीति एक ही नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही. पिछली चुनाव प्रक्रियाओं पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते रहे और विपक्ष ने बहिष्कार भी किया. लेकिन इस बार माहौल अलग है.माना जा रहा है कि मतदाताओं को पहली बार वास्तविक विकल्प मिलेंगे और मुकाबला ज्यादा खुला और प्रतिस्पर्धी होगा.
2. आवामी लीग चुनाव से बाहर
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने और उनकी पार्टी आवामी लीग पर प्रतिबंध लगने के बाद राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं. देश की सबसे बड़ी और प्रभावशाली पार्टियों में से एक का चुनावी मैदान से बाहर होना अपने आप में ऐतिहासिक घटना है.इससे पारंपरिक राजनीति का ढांचा टूटता हुआ दिखाई दे रहा है.
3. इस्लामी दलों का उभार
इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी जैसे दल पहले से ज्यादा मजबूती के साथ मैदान में हैं. वर्षों तक प्रतिबंध और दबाव झेलने के बाद उनकी वापसी राजनीति में नई बहस और नई दिशा का संकेत दे रही है. अगर इन दलों का प्रदर्शन मजबूत रहता है, तो देश की नीतियों और विदेश संबंधों पर भी असर पड़ सकता है.
4. संविधान में संभावित बदलाव
जुलाई 2024 के आंदोलन के बाद जो ‘नेशनल चार्टर’ प्रस्तावित हुआ है, उसके जरिए संविधान और कानूनों में बड़े बदलाव की बात हो रही है. इस चुनाव के साथ जनमत संग्रह भी जुड़ा है. यानी यह चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का नहीं, बल्कि देश की संवैधानिक संरचना में बदलाव तय करने का भी अवसर है.
5. बड़ी युवा आबादी की भागीदारी
मतदाताओं में युवाओं की संख्या काफी ज्यादा है. खास बात यह है कि 2024 के छात्र आंदोलन में यही युवा सबसे आगे थे. अब वही पीढ़ी पहली बार वोट डाल रही है. ऐसे में यह चुनाव युवा सोच और नई राजनीतिक दिशा का संकेत दे सकता है.