बस्ती के कलवारी क्षेत्र में एक पिता अपनी बेटी को पढ़ाने की खातिर साइकिल पर टॉयलेट सीट बांधकर 'झिनकू लाल त्रिवेणी राम चौधरी इंटर कॉलेज' पहुंचा. उसने स्कूल प्रबंधन से गुहार लगाई कि अगर शौचालय न होना ही दाखिला न देने की वजह है, तो वह खुद टॉयलेट सीट लेकर आया है, बस उसकी बेटी का नाम लिख लिया जाए.
1957 से जारी है बेटियों के लिए 'नो एंट्री'
हैरानी की बात यह है कि इस संस्थान को साल 1957 में ही 'को-एड' (समान शिक्षा) की सरकारी मान्यता मिली थी. सरकारी रिकॉर्ड में यहाँ लड़के और लड़कियां साथ पढ़ सकते हैं, लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि पिछले सात दशकों से यहाँ लड़कियों का प्रवेश नामुमकिन बना दिया गया है.
शौचालय है, फिर भी प्रबंधन का 'अजब' फरमान
सच्चाई यह है कि स्कूल परिसर में बालिका शौचालय मौजूद है और वह भी अच्छी स्थिति में. इसके बावजूद प्रबंधन के मौखिक आदेश के कारण छात्राओं का एडमिशन नहीं लिया जाता. यह सीधे तौर पर उन सरकारी योजनाओं का अपमान है जो महिला सशक्तिकरण की बात करती हैं.
छात्राओं की आपबीती
स्कूल में दाखिला लेने की कोशिश करने वाली छात्राओं का कहना है कि प्रबंधन की मनमानी के चलते उनकी कई सहेलियों ने शिक्षा से नाता तोड़ लिया है. प्राइवेट स्कूलों की भारी-भरकम फीस भरने की ताकत न होने के कारण कई मेधावी छात्राओं का भविष्य अंधकार में डूब रहा है.
प्रिंसिपल की दलील: सुरक्षा और बाउंड्रीवाल का हवाला
जब इस मामले पर स्कूल के प्रिंसिपल आज्ञाराम चौधरी से बात की गई, तो उन्होंने सुरक्षा कारणों को आगे रखा. उनका कहना है कि बालिका शौचालय और बाउंड्रीवाल न होने की वजह से यहाँ बच्चियों के दाखिले पर रोक है, हालांकि वे स्वीकार करते हैं कि पहले कुछ दाखिले हुए थे.
दावों और हकीकत के बीच विरोधाभास
प्रिंसिपल का दावा है कि साल 2021 और 2022 में करीब 60 से 70 लड़कियों को प्रवेश दिया गया था, लेकिन उसके बाद कोई छात्रा दाखिला लेने नहीं आई. यहां की क्लासरूम में सिर्फ लड़के पढ़ते हैं. वहीं दूसरी ओर, ग्रामीण और अभिभावक आज भी अपनी बेटियों का नाम लिखाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं.
शौचालय के बहाने निजी स्कूल को 'फायदा' पहुंचाने का खेल?
ग्रामीणों का आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन ने पास ही में अपना एक निजी विद्यालय खोल रखा है. सरकारी इंटर कॉलेज में लड़कियों का दाखिला रोककर उन्हें निजी स्कूल में मोटी फीस देने पर मजबूर किया जाता है. जो परिवार यह खर्च नहीं उठा पाते, उनकी बेटियां पढ़ाई छोड़ने को विवश हैं. आरोप है कि प्रबंधक द्वारा जानबूझकर सरकारी स्कूल में बालिका शौचालय न होने का हवाला दिया जाता है. इसकी आड़ में अपना प्राइवेट स्कूल चमकाया जा रहा है. सरकारी जमीन और संसाधनों का उपयोग करके गरीब बेटियों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है.
इस अन्याय के खिलाफ स्थानीय जागरूक निवासी प्रभाकर ने मोर्चा खोल दिया है. वे कॉलेज के गेट पर बेटियों का एडमिशन सुनिश्चित करने के लिए लोगों को एकजुट कर रहे हैं. बावजूद इसके, स्कूल प्रबंधन अपने पुराने ढर्रे पर अड़ा हुआ है और अब तक एक भी नई छात्रा का दाखिला नहीं हुआ है.
प्रशासन का एक्शन: मान्यता रद्द करने की चेतावनी
बस्ती के DIOS संजय सिंह ने इस मामले को अत्यंत गंभीर बताया है. विभाग ने तत्काल विद्यालय को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है. मामले की जांच के लिए विशेष अधिकारी तैनात किया गया है और पुष्टि होने पर कॉलेज की मान्यता रद्द करने और कानूनी कार्रवाई की बात कही गई है.