फोनोग्राफ के आविष्कार और टेलीग्राफ और टेलीफोन के इनोवेशन के लिए पहले से ही "मेनलो पार्क के जादूगर" के रूप में सराहे जाने वाले एडिसन अमेरिकियों के दैनिक जीवन में क्रांति लाने के लिए तैयार थे. क्योंकि अभी भी लोग रोशनी के लिए मोमबत्ती, केरोसिन और यहां तक कि व्हेल के तेल पर निर्भर थे और लाखों अन्य लोग हानिकारक गैसलाइटों पर निर्भर थे. इससे नुकसानदायक गैस तो निकलती ही थी. ये दीवार और फर्नीचर को काला कर देती थीं. इनसे सल्फर और अमोनिया की गंध आती थी और ये चीजें विस्फोट करने की क्षमता रखती थीं.
1879 के बचे हुए कुछ ही घंटे शेष रह गए थे. तभी मेनलो पार्क का शांत गांव, जिसमें केवल कुछ ही घर थे, नए साल की पूर्व संध्या पर मानव इतिहास में एक नए युग की शुरुआत देखने वाला था. घड़ी की सूई जैसे ही 12 बजे पर पहुंची और नए साल का आगाज हुआ, लकड़ी के लैम्पपोस्टों पर सजे छोटे-छोटे आग के गोलों ने क्रिस्टी स्ट्रीट को कृत्रिम रोशनी से नहला दिया. थॉमस एडिसन ने अपने 'इन्वेंशन फैक्ट्री' में जमा सभी मेहमानों को अपने नवीनतम चमत्कार यानी पहले व्यावहारिक इलेक्ट्रिक बल्ब के प्रदर्शन से रूबरू करवाया.
नए साल में कुछ दिनों बाद 27 जनवरी, 1880 को थॉमस एडिसन को दुनिया के पहले इलेक्ट्रिक बल्ब का पेटेंट मिला. तीन दशक बाद जब उनसे पूछा गया कि उनके आविष्कारों में से सबसे महान कौन सा था, तो उन्होंने बताया इलेक्ट्रिक लाइटिंग एंड पावर सिस्टम. एडिसन की इस अभूतपूर्व खोज की अफवाहों मात्र से ही गैस कंपनियों के शेयरों में 15 प्रतिशत की भारी गिरावट आई थी. यह तो बस शुरुआत थी. पेटेंट मिलने के बाद बोस्टन ग्लोब के अनुसार , एडिसन इलेक्ट्रिक लाइट कंपनी के शेयरधारकों की किस्मत पलट गई, जिनके मूल 100 डॉलर के शेयर अब 4,500 डॉलर में बिक रहे थे.
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1878 में एडिसन ने व्यावसायिक रूप से रोजमर्रा के इस्तेमाल में काम आने वाले बल्ब को विकसित करने की चुनौती को अपने हाथ में लिया. एडिसन इलेक्ट्रिक लाइट कंपनी के निवेशकों ने इसके लिए उन्हें आवश्यक प्रारंभिक पूंजी प्रदान की. 31 साल के आविष्कारक ने न केवल एक इलेक्ट्रिक बल्ब विकसित करने का प्रयास किया, बल्कि एक जनरेटर द्वारा संचालित संपूर्ण प्रकाश व्यवस्था विकसित करने का भी लक्ष्य रखा.
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एडिसन ने दावा किया था कि वह कुछ ही महीनों में एक कारगर बल्ब तैयार कर लेंगे, लेकिन जल्द ही उन्हें भी अपने से पहले के आविष्कारकों की तरह ही निराशा का सामना करना पड़ा. एडिसन ने शुरुआत में प्लैटिनम का फिलामेंट तैयार करने में सफलता पाई, लेकिन एडिसन ने इसे छोड़ दिया क्योंकि यह धातु बहुत महंगी थी.
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सस्ते कार्बन फिलामेंट्स की ओर रुख करते हुए, एडिसन ने कच्चे रेशम, कॉर्क और यहां तक कि अपने दो कर्मचारियों की दाढ़ी के बालों का भी परीक्षण किया, लेकिन उन्हें बहुत कम सफलता मिली. अंततः अक्टूबर 1879 में एक बड़ी सफलता मिली जब एक उच्च प्रतिरोध वाला कार्बन फिलामेंट 13 घंटे से अधिक समय तक लगातार जलता रहा. फिर एडिसन ने आखिरकार 31 दिसंबर को अपने प्रयोगशाला में पहली बार इलेक्ट्रिक बल्ब जालाया और 26 दिन बाद 27 जनवरी 1880 में उन्हें इसका पेटेंट मिल गया.