
कई बार रंग सिर्फ एक रंग नहीं होते, बल्कि कूटनीति में एक मजबूत संदेश बन जाते हैं. राजनीतिक संकेत, सांस्कृतिक संदर्भ और किसी देश की पहचान तक रंगों के जरिए बहुत कुछ कहा जाता है. यही वजह है कि पीएम नरेंद्र मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की हालिया मुलाकात की वायरल तस्वीरों में लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा एक चीज पर गया. वो है नेतन्याहू की नीली टाई. सोशल मीडिया पर यह सवाल लगातार घूम रहा है कि अहम बैठकों के दौरान वे बार-बार यही रंग क्यों चुनते हैं? क्या यह सिर्फ स्टाइल है या इसके पीछे कोई गहरा अर्थ छिपा है?
जब पीएम मोदी इजरायल पहुंचे, तो स्वागत के लिए खड़े नेतन्याहू अपने क्लासिक अंदाज में दिखे-सूट, सफेद शर्ट और नीली टाई. दिलचस्प बात यह है कि वे हमेशा नीली टाई नहीं पहनते, लेकिन खास मुलाकातों, अंतरराष्ट्रीय मंचों और रणनीतिक बैठकों में यह रंग बार-बार नजर आता है. यही वजह है कि लोग इस रंग को केवल फैशन नहीं, बल्कि एक संदेश के रूप में देखने लगे हैं.
नीला रंग इजरायल की पहचान
दरअसल, नीला रंग इजरायल की पहचान से जुड़ा है. इजरायल के झंडे में नीला और सफेद रंग होता है, जो यहूदी परंपराओं से लिया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू की नीली टाई इसी राष्ट्रीय पहचान की ओर संकेत देती है. यह एक ‘साइलेंट मैसेज’ है कि वे राष्ट्रवाद, परंपरा और देश की मूल पहचान को हमेशा प्राथमिकता देते हैं. कई मौके ऐसे भी रहे हैं जब उनकी टाई का रंग उनके भाषण से पहले ही उनका राजनीतिक रुख बता देता है.

नेतन्याहू की पार्टी का रंग-नीला
एक और दिलचस्प वजह है उनकी पार्टी लिकुड की ब्रांडिंग. इजरायली वेबसाइट jfeed.com के मुताबिक, लिकुड पार्टी का प्रमुख रंग भी नीला-सफेद है. विश्लेषक मानते हैं कि नीली टाई पहनकर नेतन्याहू अपने समर्थकों को यह संदेश देते हैं कि वे पार्टी की विचारधारा से जुड़े हैं और मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा वाली छवि को बनाए हुए हैं. यही कारण है कि गहरे या हल्के नीले की टाई सार्वजनिक मंचों पर उनकी ‘स्ट्रॉन्ग लीडर’ की छवि को और मजबूत करती है.
इस मुलाकात में कपड़ों ने इसलिए और ध्यान खींचा क्योंकि डिप्लोमेसी में कपड़े प्रतीकों की तरह काम करते हैं. नेतन्याहू ने मोदी को सम्मान देने के लिए भारतीय ट्रेडिशनल अटायर भी पहना था.इसके बाद यह पूरा लुक सोशल मीडिया पर 'मैचिंग जेस्चर' और 'दोस्ती का संदेश' बन गया.
आखिर में, नेतन्याहू की नीली टाई कोई रहस्य नहीं, बल्कि इजरायल की पहचान, लिकुड की विचारधारा और एक साइलेंट डिप्लोमैटिक मैसेज का हिस्सा है जो मोदी के दौरे जैसे बड़े मौकों पर और भी ज़्यादा उभर कर सामने आता है.