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20 साल में सैलरी वैसी की वैसी... क्या सालों से नहीं बढ़ी फ्रेशर्स की सैलरी?

Freshers Salary Details: क्या आप जानते हैं जो कंपनियां करीब 20 साल पहले फ्रेशर्स को जितनी सैलरी ऑफर कर रही थी, उतनी ही सैलरी भी आज भी फ्रेशर्स को ऑफर की जा रही है.

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फ्रेशर्स की सैलरी कई सालों से उसी स्तर पर है, जहां कुछ सालों पहले थी. (Photo: ITG)
फ्रेशर्स की सैलरी कई सालों से उसी स्तर पर है, जहां कुछ सालों पहले थी. (Photo: ITG)

जॉब सेक्टर में 20 सालों में काफी कुछ बदल गया है. लेकिन, बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोग फ्रेशर्स की सैलरी भी उतनी ही है. 20 साल पहले फ्रेशर्स को जितने पैसे मिल रहे थे, आज भी कोई नौकरी की शुरुआत करता है तो उसे 20 साल पहले वाली सैलरी ही ऑफर की जाती है. पहले भारत आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनियों टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इंफोसिस या विप्रो में कैंपस प्लेसमेंट हासिल करना एक सपने जैसा था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. इसके पीछे फ्रेशर्स को मिलने वाली सैलरी भी हो सकती है. 

वैसे तो भारत का आईटी सर्विस सेक्टर पहले से कहीं अधिक मजबूत दिख रहा है, जिसमें अब कई कंपनियां जुड़ गई हैं. आईटी कंपनियों का रेवेन्यू भी काफी बढ़ गया है, बैलेंस शीट और मजबूत हो गई है, भर्ती भी जारी है, लेकिन फ्रेशर्स की स्थिति वैसी ही है, जो 20 साल पहले हुआ करती थी. 

क्या है हकीकत?

रेडिट पर शेयर की गई एक पोस्ट में बताया गया है कि साल 2007 में टीसीएस की ओर से असिस्टेंट सिस्टम्स इंजीनियर ट्रेनी के रूप में नियुक्त एक नए इंजीनियरिंग ग्रेजुएट की सैलरी करीब 3.16 लाख रुपये थी. करियर 360 की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में उसी पद के लिए पैकेज करीब 3.36 लाख रुपये है. यानी करीब 19-20 सालों में साल की सैलरी में सिर्फ 20,000 रुपये की बढ़ोतरी हुई है. सिर्फ टीसीएस ही नहीं, इंफोसिस, विप्रो और एक्सेंचर जैसी कंपनियों का भी ये ही हाल है. यहां भी फ्रेशर्स को 3-4 लाख रुपये सलाना दिए जा रहे हैं. भले ही सैलरी कम नहीं हुई, लेकिन 20  सालों में सैलरी के ना बढ़ने सवाल खड़ा होता है. 

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खर्च लगातार बढ़ रहा

खास बात ये है कि जहां एक ओर फ्रेशर्स के वेतन में कोई बदलाव नहीं हुआ, वहीं फीस, इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत आदि में काफी बढ़ोतरी हुई है. 2010 से बीटेक डिग्री की फीस चार बढ़ गई है जबकि सैलरी उतनी ही है. अब फैमिली इंजीनियरिंग के लिए 10-25 लाख रुपये खर्च करती है. अब इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स की भी संख्या 7 से आठ गुना बढ़ गई है, जिससे एंट्र्री लेवल पर काफी कॉम्पिटिशन हो रहा है. अब इतने पैसों में पुणे जैसे शहरों में जीवनयापन भी मुश्किल हो रहा है. 

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