भारत में कहने को तो दिव्यांग जन अधिकार कानून (2016) लागू है जो नौकरी और शिक्षा में बराबरी की बात करता है. लेकिन जमीन पर हकीकत क्या है? क्या सिर्फ कानून बना देने से दिव्यांगों (PwDs) को सम्मानजनक रोजगार मिल पा रहा है? IIT मद्रास और शास्त्र (SASTRA) यूनिवर्सिटी की एक ताजा स्टडी ने कॉर्पोरेट जगत के दावों की पोल खोल दी है. 180 दिव्यांग कर्मचारियों पर किए गए इस सर्वे में वो बातें सामने आई हैं, जो अक्सर फाइलों में दबकर रह जाती हैं.
सिर्फ 'दिखावे' की हायरिंग?
स्टडी में एक बहुत ही कड़वा शब्द इस्तेमाल किया गया है 'पोलराइजिंग एम्प्लॉयबिलिटी'. इसका सीधा मतलब ये है कि कंपनियां केवल उन्हीं दिव्यांगों को नौकरी पर रखना चाहती हैं जो पहले से बहुत ज्यादा 'स्मार्ट' और 'जॉब-रेडी' हैं. जो थोड़े कमजोर हैं या जिन्हें थोड़ी ज्यादा मदद की जरूरत है, उन्हें कंपनियां नजरअंदाज कर देती हैं.
ऐसा लगता है कि भारत में 'डाइवर्सिटी हायरिंग' (विविधता) सिर्फ कागजों पर नियमों का पालन करने के लिए हो रही है, दिल से उन्हें टीम का हिस्सा बनाने के लिए नहीं.
क्या है असली समस्या?
रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों की स्ट्रेटजी में कुछ बड़ी खामियां हैं. सबसे पहली कमी मेंटरशिप की कमी है जिसमें दिव्यांग कर्मचारियों को सही दिशा दिखाने वाले लोग दफ्तरों में नहीं हैं.
बता दें कि हर दिव्यांग की जरूरत अलग होती है. कंपनियां उनके हिसाब से काम के घंटों या भूमिकाओं में बदलाव करने को तैयार नहीं हैं. स्टडी कहती है कि अगर वर्कप्लेस पर सहकर्मियों का साथ और करियर में खुद का कॉन्फिडेंस मिले, तो दिव्यांग किसी भी सामान्य कर्मचारी से बेहतर काम कर सकते हैं.
बच्चों के कंधों पर आया मां-बाप का बोझ
इसी बीच, भारतीय घरों के भीतर एक और खामोश बदलाव आ रहा है. इसे 'सैंडविच जनरेशन लेऑफ' कहा जा रहा है. मिड-करियर (40-50 की उम्र) वाले प्रोफेशनल्स की छंटनी ने घरों का गणित बिगाड़ दिया है.
रोल रिवर्सल: अब घर का बड़ा बेटा या बेटी (Gen Z) मुख्य कमाने वाला सदस्य बन गया है.
जिम्मेदारी का दबाव: जिन युवाओं ने अभी अपना करियर शुरू ही किया था, उन्हें अब अपने मां-बाप के खर्चों और भाई-बहनों की पढ़ाई का बोझ उठाना पड़ रहा है.
पहचान का संकट: नौकरी जाने से माता-पिता डिप्रेशन और पहचान के संकट से जूझ रहे हैं, वहीं बच्चे अपनी जरूरतों को मारकर परिवार को संभाल रहे हैं.