scorecardresearch
 

क्या सिर्फ दिखावे के लिए दिव्यांगों को नौकरी दे रही हैं कंपनियां? IIT मद्रास की स्टडी में खुलासा

IIT मद्रास और शास्त्र यूनिवर्सिटी की ताजा स्टडी में पता चला है कि भारत में दिव्यांग कर्मचारियों को नौकरी में समान अवसर नहीं मिल रहे हैं. कंपनियां केवल उन दिव्यांगों को नौकरी देती हैं जो पहले से ज्यादा सक्षम होते हैं, जबकि जिन्हें ज्यादा सहायता की जरूरत होती है, उन्हें नजरअंदाज किया जाता है. मेंटरशिप की कमी और कार्यस्थल पर सहकर्मियों का समर्थन न मिलने से उनकी उत्पादकता प्रभावित होती है.

Advertisement
X
IIT मद्रास की रिपोर्ट ने खोली कॉर्पोरेट इंडिया की पोल. (Photo: Pexels)
IIT मद्रास की रिपोर्ट ने खोली कॉर्पोरेट इंडिया की पोल. (Photo: Pexels)

भारत में कहने को तो दिव्यांग जन अधिकार कानून (2016) लागू है जो नौकरी और शिक्षा में बराबरी की बात करता है. लेकिन जमीन पर हकीकत क्या है? क्या सिर्फ कानून बना देने से दिव्यांगों (PwDs) को सम्मानजनक रोजगार मिल पा रहा है? IIT मद्रास और शास्त्र (SASTRA) यूनिवर्सिटी की एक ताजा स्टडी ने कॉर्पोरेट जगत के दावों की पोल खोल दी है. 180 दिव्यांग कर्मचारियों पर किए गए इस सर्वे में वो बातें सामने आई हैं, जो अक्सर फाइलों में दबकर रह जाती हैं.

सिर्फ 'दिखावे' की हायरिंग?

स्टडी में एक बहुत ही कड़वा शब्द इस्तेमाल किया गया है 'पोलराइजिंग एम्प्लॉयबिलिटी'. इसका सीधा मतलब ये है कि कंपनियां केवल उन्हीं दिव्यांगों को नौकरी पर रखना चाहती हैं जो पहले से बहुत ज्यादा 'स्मार्ट' और 'जॉब-रेडी' हैं. जो थोड़े कमजोर हैं या जिन्हें थोड़ी ज्यादा मदद की जरूरत है, उन्हें कंपनियां नजरअंदाज कर देती हैं.

ऐसा लगता है कि भारत में 'डाइवर्सिटी हायरिंग' (विविधता) सिर्फ कागजों पर नियमों का पालन करने के लिए हो रही है, दिल से उन्हें टीम का हिस्सा बनाने के लिए नहीं.

क्या है असली समस्या?

रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों की स्ट्रेटजी में कुछ बड़ी खामियां हैं.  सबसे पहली कमी  मेंटरशिप की कमी है जिसमें दिव्यांग कर्मचारियों को सही दिशा दिखाने वाले लोग दफ्तरों में नहीं हैं. 

बता दें कि हर दिव्यांग की जरूरत अलग होती है. कंपनियां उनके हिसाब से काम के घंटों या भूमिकाओं में बदलाव करने को तैयार नहीं हैं. स्टडी कहती है कि अगर वर्कप्लेस पर सहकर्मियों का साथ और करियर में खुद का कॉन्फिडेंस मिले, तो दिव्यांग किसी भी सामान्य कर्मचारी से बेहतर काम कर सकते हैं.

Advertisement

बच्चों के कंधों पर आया मां-बाप का बोझ

इसी बीच, भारतीय घरों के भीतर एक और खामोश बदलाव आ रहा है. इसे 'सैंडविच जनरेशन लेऑफ' कहा जा रहा है. मिड-करियर (40-50 की उम्र) वाले प्रोफेशनल्स की छंटनी ने घरों का गणित बिगाड़ दिया है.

रोल रिवर्सल: अब घर का बड़ा बेटा या बेटी (Gen Z) मुख्य कमाने वाला सदस्य बन गया है.

जिम्मेदारी का दबाव: जिन युवाओं ने अभी अपना करियर शुरू ही किया था, उन्हें अब अपने मां-बाप के खर्चों और भाई-बहनों की पढ़ाई का बोझ उठाना पड़ रहा है.

पहचान का संकट: नौकरी जाने से माता-पिता डिप्रेशन और पहचान के संकट से जूझ रहे हैं, वहीं बच्चे अपनी जरूरतों को मारकर परिवार को संभाल रहे हैं.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement