नोएडा में हुए कर्मचारियों के प्रोटेस्ट ने बहुत से लोगों के मन में ये सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर सैलरी को लेकर प्रोटेस्ट से क्या मिलेगा. ऐसे में आपको ये जरूर पता होना चाहिए कि आप कहीं किसी जॉब में हों, आपको संविधान अपने अधिकार और कानूनी सुरक्षा देता है. जानिए- वो क्या हैं.
जुबानी वादा खत्म, 'ऑफर लेटर' अब हक
अब कोई मालिक ये कहकर काम पर नहीं रख सकता कि 'कल से आ जाना'. नए कानून में हर कर्मचारी को लिखित या डिजिटल 'अपॉइंटमेंट लेटर' देना अनिवार्य है. इसमें आपकी सैलरी, पद और काम की शर्तों का साफ जिक्र होना चाहिए. यह लेटर आपके पास पक्का सबूत होगा कि आप कंपनी का हिस्सा हैं. इसके बिना काम कराना अब गैर-कानूनी माना जाएगा.
महिला सुरक्षा: नाइट शिफ्ट और ट्रांसपोर्ट
महिलाएं अब अपनी मर्जी से नाइट शिफ्ट कर सकेंगी, लेकिन कंपनी को सुरक्षा के कड़े नियम मानने होंगे. लिखित सहमति के बिना किसी महिला को रात में काम पर नहीं बुलाया जा सकता. इसके अलावा, दफ्तर में सीसीटीवी, सुरक्षा गार्ड और घर तक छोड़ने के लिए सुरक्षित ट्रांसपोर्ट की जिम्मेदारी पूरी तरह कंपनी की होगी. सुरक्षा में चूक पर कंपनियों पर सख्त जुर्माने का प्रावधान है.
समय पर सैलरी: मालिक नहीं कर सकेंगे देरी
कई बार छोटी फैक्ट्रियों में पैसा रोक लिया जाता है. नए लेबर कोड के अनुसार, कंपनियों को महीने के अंत के बाद अधिकतम 7 दिनों के भीतर वेतन का भुगतान करना होगा. यह नियम फुल-टाइम स्टाफ से लेकर दिहाड़ी मजदूरों तक सब पर लागू होता है. अब 'कल आना-परसों आना' वाला बहाना नहीं चलेगा. समय पर भुगतान आपका कानूनी अधिकार बन चुका है.
ओवर-टाइम का पैसा अब 'डबल' मिलेगा
अगर कंपनी आपसे तय शिफ्ट से ज्यादा काम कराती है, तो उसे आपको 'डबल' पैसे देने होंगे. यानी अगर आपकी एक घंटे की सैलरी 100 रुपये है, तो ओवर-टाइम के एक घंटे के लिए आपको 200 रुपये मिलेंगे. यह नियम शोषण रोकने के लिए है. कंपनियों को अब ओवर-टाइम का पूरा हिसाब और सैलरी स्लिप देना भी अनिवार्य कर दिया गया है.
8 से 12 घंटे: काम के घंटों का नया हिसाब
नए कोड में राज्यों को काम के घंटे तय करने की छूट दी गई है, लेकिन यह आमतौर पर 8 से 12 घंटे के बीच ही रहेगा. हफ्ते में कुल 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता. सबसे जरूरी बात यह है कि हर कर्मचारी को 'वीकली ऑफ' यानी साप्ताहिक छुट्टी देना अनिवार्य है. छुट्टी के दिन काम कराने पर भी एक्स्ट्रा भुगतान करना होगा.
छोटी फैक्ट्रियों में भी PF और फ्री इलाज का लाभ
अब सिर्फ बड़ी कंपनियों में ही नहीं, बल्कि छोटे कारखानों में काम करने वालों को भी PF और मुफ्त इलाज (ESIC) जैसी सुविधाएं मिलेंगी. सरकार ने सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ा दिया है. इसका मतलब है कि बीमारी या रिटायरमेंट के समय छोटे वर्कर के पास भी अपना फंड और मेडिकल सहारा होगा. अब 'सोशल सिक्योरिटी' हर श्रमिक का बुनियादी हक है.
'समान काम, समान वेतन' का सख्त कानून
अक्सर देखा जाता है कि एक ही काम के लिए महिलाओं को पुरुषों से कम पैसे दिए जाते हैं. नए लेबर कोड में 'जेंडर न्यूट्रल' सैलरी पर जोर है. जेंडर के आधार पर वेतन में भेदभाव करना अब भारी पड़ सकता है. समान पद और समान जिम्मेदारी निभाने वाले हर कर्मचारी को बराबर वेतन पाना उसका कानूनी अधिकार है, चाहे वह महिला हो या पुरुष.
शिकायत के लिए 'इंटरनल कमेटी' जरूरी
कार्यस्थल पर किसी भी तरह के उत्पीड़न या समस्या के समाधान के लिए अब हर कंपनी में 'इंटरनल शिकायत समिति' (ICC) होना अनिवार्य है. इसकी अध्यक्षता एक महिला सदस्य करेगी. नोएडा के प्रदर्शन में महिलाओं ने सुरक्षा और सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया था, जिसे यह कानून सख्ती से एड्रेस करता है. अब आप अपनी बात बिना डरे कमेटी के सामने रख सकते हैं.
नोएडा का आंदोलन यह सिखाता है कि सिर्फ कानून की किताब में नियम होना काफी नहीं है. हर कर्मचारी को अपने हक पता होने चाहिए. अगर आपकी कंपनी 'अपॉइंटमेंट लेटर' नहीं देती या ओवर-टाइम का पैसा काटती है, तो आप लेबर कंट्रोल रूम या शिकायत पेटी का सहारा ले सकते हैं. जागरूक कर्मचारी ही एक बेहतर और शोषण-मुक्त कार्यस्थल (Workplace) का निर्माण कर सकता है.