एजुकेशन बीट पर रिपोर्टिंग करते हुए मुझे दो दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है. हर साल अप्रैल का महीना आते ही मेरा फोन बेतहाशा बजने लगता है, लेकिन कल यानी 21 अप्रैल का वो दिन कुछ अलग था. कल 'जेईई मेन' के नतीजे आए थे, और 26 बच्चों ने पूरे 100 परसेंटाइल लाकर सुर्खियां बटोरी थीं. लेकिन इन चमकती खबरों के बीच, मेरे पास एक ऐसा फोन आया जिसने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया.
मैडम, सब कुछ दांव पर लगा दिया था...
ये वाराणसी के एक पिता का फोन था. उनकी आवाज में बेबसी साफ झलक रही थी. उन्होंने बताया कि उनकी बेटी ने 99.2 परसेंटाइल स्कोर किया है. लेकिन खुश होने के बजाय वो डरे हुए थे. उन्होंने बताया कि मैंने कोटा में बेटी की कोचिंग और रहने पर करीब 18 लाख रुपये खर्च कर दिए. उसने दिन-रात एक कर दिया, लेकिन क्या इतने नंबर पर उसे आईआईटी (IIT) मिलेगा?
सच कहूं तो उस वक्त मेरे पास उन्हें देने के लिए कोई तसल्ली भरा जवाब नहीं था. मैंने खुद से पूछा कि क्या हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां 99% अंक लाना भी काफी नहीं है?
नंबरों का वो गणित जो कोई नहीं बताता
हम टीवी पर 100 परसेंटाइल वालों की तस्वीरें देखते हैं, लेकिन उन हजारों बच्चों की बात नहीं करते जो 99 परसेंटाइल लाकर भी आज रो रहे हैं. इस साल का अगर पूरा गणित समझें तो करीब 30 हजार छात्र ऐसे हैं जिन्होंने 99 परसेंटाइल या उससे ज्यादा स्कोर किया है. अब जरा सीटों के बंटवारे को देखिए.
देश के सभी 23 आईआईटी में कुल मिलाकर मात्र 17,385 सीटें हैं. इसका सीधा मतलब ये है कि अगर आप 99 परसेंटाइल भी ले आए हैं, तो भी आपको मनचाही ब्रांच या कॉलेज मिलने की कोई गारंटी नहीं है. पिछली बार आईआईटी बॉम्बे में कंप्यूटर साइंस की क्लोजिंग रैंक मात्र 66 थी. यानी आपको देश के 13 लाख बच्चों में टॉप 66 में आना होगा. क्या ये वाकई काबिलियत का इम्तिहान है या कोई खौफनाक लॉटरी?
58,000 करोड़ का वो कारोबार, जो सपने बेच रहा है
कोटा की गलियों में आज सन्नाटा नहीं, बल्कि 58,000 करोड़ रुपये की कोचिंग इंडस्ट्री का शोर है. दो साल की पढ़ाई का खर्च अब 15 से 25 लाख रुपये तक पहुंच गया है. मैंने ऐसे परिवारों को देखा है जिन्होंने अपने गहने गिरवी रखे, जमीन बेची और अपनी पूरी जमा-पूंजी इन कोचिंग सेंटर्स को सौंप दी. ये सेंटर्स अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर 'गारंटीड सक्सेस' बेचते हैं, लेकिन उस मध्यमवर्गीय पिता का क्या, जिसकी उम्र भर की कमाई एक झटके में दांव पर लग गई? यह अब शिक्षा नहीं, बल्कि भावनाओं का एक ठंडा व्यापार बन चुका है.
नंबरों की 'महंगाई' ने सब बर्बाद कर दिया
हम बाजार में टमाटर और पेट्रोल के दाम बढ़ने पर शोर मचाते हैं, लेकिन पढ़ाई में जो मार्क्स की महंगाई (Inflation) आई है, उस पर कोई बात नहीं करता. जब एक ही एग्जाम में 26 बच्चे 100 परसेंटाइल लाते हैं, तो समझ लीजिए कि उस परीक्षा ने अपनी पहचान खो दी है.
कोचिंग माफियाओं ने एग्जाम के पैटर्न को रट लिया है. वो बच्चों को इंजीनियर नहीं, बल्कि 'सवाल हल करने वाली मशीन' बना रहे हैं. बच्चों को शॉर्टकट्स सिखाए जा रहे हैं, उन्हें पिछले सालों के पेपर रटाए जा रहे हैं. क्या ऐसे हम भविष्य के वैज्ञानिक या अविष्कारक तैयार कर पाएंगे? मेरा जवाब होगा- बिल्कुल नहीं.
मेरा आखिरी सवाल
कल रात मैं सोच रही थी कि हम वास्तव में किस चीज का टेस्ट ले रहे हैं? क्या कोटा के बंद कमरों में रटने वाला बच्चा उस छात्र से बेहतर है जिसने गांव के सरकारी स्कूल से बिना किसी कोचिंग के 95 परसेंटाइल पाए हैं?
शायद समस्या इन बच्चों में नहीं है. समस्या हम बड़ों में है, जिन्होंने एक ऐसा सिस्टम बना दिया है जो सिर्फ नंबरों का भूखा है. हमने बच्चों को रोबोट बना दिया है और हम उम्मीद करते हैं कि वो दुनिया बदलेंगे. वाराणसी के उस पिता का सवाल आज भी मेरे कानों में गूंज रहा है... और सच तो ये है कि इसका जवाब हम सबके पास उधार है.