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जुर्म

कौन थे रंगा-बिल्ला? जिनका नाम सुनकर टेंशन में आ गए थे प्रधानमंत्री

कौन थे रंगा-बिल्ला? जिनका नाम सुनकर टेंशन में आ गए थे प्रधानमंत्री
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27 नवंबर यानी बुधवार को पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि क्या चिदंबरम कोई रंगा-बिल्ला हैं, जो उन्हें जमानत नहीं दी सकती. रंगा-बिल्ला कोई काल्पनिक नाम नहीं हैं. ये भारत के कुख्यात अपराधियों में से एक थे. इनका गुनाह इतना बड़ा था कि उससे पूरा देश ही हिल ही गया था. बल्कि विदेशों में भी उनके अपराध की चर्चा हुई थी. आइए जानते हैं कि आखिर रंगा-बिल्ला कौन थे?
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मामला है 1978 के एक अपहरण और हत्या का

रंगा और बिल्ला ने 1978 में नौसेना के अधिकारी मदन चोपड़ा के बच्चे गीता और संजय चोपड़ा का अपहरण किया था. बाद में इन दोनों भाई-बहन की हत्या कर दी थी. रंगा का असली नाम कुलजीत सिंह और बिल्ला का असली नाम जसबीर सिंह था.
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दिल्ली सहित पूरा देश हिल गया था

1978 का गीता और संजय चोपड़ा अपहरण और हत्याकांड ने दिल्ली सहित पूरे देश को हिला दिया था. इस घटना की चर्चा विदेशों तक में हुई थी.
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पीएम ने खुद दिया था मामले की जांच का आदेश

तब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे. जैसे ही यह घटना उनकी जानकारी में आई. उन्होंने खुद जांच और कार्रवाई का आदेश दिया. उस समय उनकी सरकार ने जिस तरह से इस मामले को हैंडल किया था, उससे उनकी बड़ी आलोचना हुई थी. 1978 के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी को हार का भी सामना करना पड़ा था.
(फोटोः संजय का बैग देखते पिता मदन चोपड़ा और फोटो देखती मां)
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गीता 16 और संजय 14 साल का था

जिस समय रंगा और बिल्ला ने गीता और संजय को मारा था, उस समय उनकी उम्र बेहद कम थी. गीता साढ़े 16 साल की थी और संजय की उम्र 14 वर्ष थी.
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फिरौती के लिए किया था अपहरण

रंगा और बिल्ला ने नेवी अधिकारी मदन मोहन चोपड़ा के दोनो बच्चों को गीता और संजय चोपड़ा को 26 अगस्त 1978 को फिरौती के लिए अपहरण किया था, लेकिन जब रंगा और बिल्ला को पता चला कि बच्चों के पिता नेवी के अधिकारी हैं तो दोनो बच्चों की हत्या कर दी गई.
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कुछ रिपोर्ट्स का दावा- गीता से रेप हुआ था

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स तो यह भी दावा करती हैं कि गीता के साथ रंगा और बिल्ला ने रेप भी किया था. हालांकि आधिकारिक रिपोर्ट में इस बात से इनकार किया गया है.
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2 दिन बाद मिले थे बच्चों के शव

अपहरण के 2 दिन बाद 28 अगस्त 1978 को दोनो बच्चों के शव मिले थे. केस जब मीडिया में आ गया तो दिल्ली पुलिस को तेजी से जांच करनी पड़ी थी. पूरे देश में रंगा और बिल्ला की फोटो जारी की गई थी.
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8 सितंबर 1978 को दोनों गिरफ्तार हुए थे

8 सितंबर 1978 को रंगा और बिल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया. दोनों को आगरा में उस समय गिरफ्तार किया गया था जब कालका मेल के उस डिब्बे में चढ़ गए जो सैनिकों के लिए आरक्षित था. एक सैनिक ने अखबार में छपी उनकी फोटो से उन्हें पहचान लिया था. 
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गीता और संजय के नाम से वीरता पुरस्कार है

4 साल तक चली सुनवाई के बाद 1982 में रंगा-बिल्ला को फांसी दे दी गई. नेवी अफसर के दोनों बच्चों के नाम पर बाद में वीरता पुरस्कार शुरू किया गया, जो हर साल दिया जाता है.