
Cyber Fraud Prevention India: भारत में साइबर फ्रॉड की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं और इसके आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं. हर 24 घंटे में करीब 38 करोड़ रुपये साइबर अपराधी लोगों के बैंक खातों से उड़ा ले जाते हैं. यह पैसा आम लोगों की मेहनत की कमाई होती है, जो ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल पेमेंट या अन्य डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करते समय ठगी का शिकार हो जाते हैं. हैरानी की बात यह है कि इस बड़ी रकम में से सिर्फ लगभग 8 करोड़ रुपये ही बचाए जा पाते हैं. बाकी पैसा साइबर अपराधियों के खातों में पहुंच जाता है. यह आंकड़ा बताता है कि साइबर अपराधियों का नेटवर्क कितना मजबूत हो चुका है और वे लगातार नए तरीके अपनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं.
हर दिन हजारों शिकायतें
साइबर ठगी के मामलों को लेकर हर दिन हजारों लोग शिकायत दर्ज करा रहे हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय से जुड़े साइबर सिस्टम के मुताबिक, हर 24 घंटे में 7000 से ज्यादा शिकायतें दर्ज होती हैं. इनमें से करीब 6000 शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई की जाती है. जांच में सामने आया है कि इन मामलों में रोजाना करीब 38 करोड़ रुपये की ठगी हो रही है. हालांकि एजेंसियां लगातार पैसा बचाने की कोशिश करती हैं, लेकिन औसतन सिर्फ 8 करोड़ रुपये ही रिकवर हो पाते हैं. इसका मतलब यह है कि ठगों का नेटवर्क बेहद तेज और संगठित तरीके से काम कर रहा है.
साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर
साइबर ठगी से निपटने के लिए गृह मंत्रालय ने एक विशेष साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर (Cyber Fraud Mitigation Centre) बनाया है. यह सेंटर 24 घंटे काम करता है और यहां अलग-अलग एजेंसियों के प्रतिनिधि मौजूद रहते हैं. इस सेंटर का उद्देश्य जैसे ही किसी साइबर फ्रॉड की जानकारी मिले, तुरंत कार्रवाई करना है. यहां पुलिस, बैंक और टेलीकॉम कंपनियों के प्रतिनिधि मिलकर काम करते हैं. जब किसी फ्रॉड का अलर्ट मिलता है, तो पूरा सिस्टम एक साथ सक्रिय हो जाता है. इस समन्वय के जरिए ठगी की रकम को ट्रांसफर होने से रोकने की कोशिश की जाती है.
24×7 कंट्रोल रूम
साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर में एक हाईटेक कंट्रोल रूम बनाया गया है. यहां 24×7 निगरानी रखी जाती है. जैसे ही किसी खाते से संदिग्ध ट्रांजैक्शन की जानकारी मिलती है, तुरंत सायरन बजता है और संबंधित एजेंसियां अलर्ट हो जाती हैं. इसके बाद बैंक और पुलिस मिलकर उस ट्रांजैक्शन को रोकने की कोशिश करते हैं. कई मामलों में खाते को तुरंत फ्रीज कर दिया जाता है. हालांकि ठगों की तेजी के कारण कई बार पैसा दूसरे खातों में ट्रांसफर हो जाता है, जिससे रिकवरी मुश्किल हो जाती है.
पांच साल में 55 हजार करोड़ की ठगी
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में साइबर ठगों ने लोगों के खातों से 55 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी की है. यह आंकड़ा 2021 से 2025 के बीच का है. इन पांच वर्षों में कुल 6 करोड़ 58 लाख से ज्यादा शिकायतें साइबर फ्रॉड को लेकर दर्ज की गईं. यह संख्या बताती है कि देश में डिजिटल सेवाओं के बढ़ने के साथ साइबर अपराध भी तेजी से बढ़े हैं. हालांकि सरकार और एजेंसियां लगातार इन्हें रोकने की कोशिश कर रही हैं.
2025 में सबसे ज्यादा शिकायतें
रिपोर्ट के मुताबिक अकेले 2025 में ही साइबर फ्रॉड के 24 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए. यह पिछले सभी वर्षों के मुकाबले सबसे ज्यादा है. हालांकि इस साल ठगी की रकम थोड़ी कम रही, लेकिन मामलों की संख्या में भारी वृद्धि देखी गई. इससे यह साफ होता है कि साइबर अपराधी लगातार नए-नए तरीके अपनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं. डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के कारण ठगों के लिए नए अवसर भी बन रहे हैं.
2021 से 2025 तक शिकायतों का ग्राफ
अगर पिछले पांच साल के आंकड़ों को देखें तो साइबर फ्रॉड की शिकायतों में लगातार वृद्धि हुई है-
2021 में 2,62,846 शिकायतें दर्ज हुई थीं.
2022 में यह संख्या बढ़कर 6,94,446 हो गई.
2023 में 13,10,357 शिकायतें दर्ज हुईं.
2024 में यह संख्या 19,18,835 पहुंच गई.
2025 में शिकायतों का आंकड़ा बढ़कर 24,02,579 हो गया.
यह आंकड़े बताते हैं कि साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहा है और लोगों को लगातार सतर्क रहने की जरूरत है.
ठगी की रकम में भी बड़ा उछाल
साइबर ठगी की रकम भी हर साल तेजी से बढ़ी है-
2021 में लगभग 551 करोड़ रुपये की ठगी हुई थी.
2022 में यह रकम बढ़कर 2290 करोड़ रुपये हो गई.
2023 में 7465 करोड़ रुपये की ठगी दर्ज की गई.
2024 में यह आंकड़ा 22,848 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
हालांकि 2025 में यह थोड़ा घटकर 22,495 करोड़ रुपये रहा.
इसके बावजूद यह बेहद बड़ी रकम है, जो साइबर अपराधियों की ताकत को दिखाती है.

2025 में बचाए गए हजारों करोड़
हालांकि एजेंसियों की कोशिशों से कुछ सफलता भी मिली है. I4C सिस्टम के जरिए 2025 में करीब 8189 करोड़ रुपये की ठगी होने से बचाई गई. यह रकम तब बचाई गई जब लोगों ने तुरंत शिकायत दर्ज कराई और बैंक तथा पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की. इससे यह साबित होता है कि समय पर शिकायत करने से कई बार पैसा वापस मिल सकता है.
डिजिटल इंडिया के साथ बढ़ा खतरा
भारत में इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ है. आज देश के अधिकांश घरों में इंटरनेट पहुंच चुका है. लोग ऑनलाइन बैंकिंग, यूपीआई और डिजिटल भुगतान का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे लोगों को सुविधा जरूर मिली है, लेकिन इसके साथ साइबर अपराध का खतरा भी बढ़ गया है. साइबर ठग इसी डिजिटल सिस्टम का फायदा उठाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं.
म्यूल अकाउंट बना बड़ा हथियार
साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक बड़ा तरीका म्यूल अकाउंट है. इसमें ठग दूसरे लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं. इन खातों में ठगी की रकम ट्रांसफर की जाती है और फिर उसे कई अन्य खातों में बांट दिया जाता है. इससे पैसे का ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है. एजेंसियां अब इन म्यूल खातों की पहचान करने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं.
AI के जरिए ठगी पर लगाम
साइबर अपराधों को रोकने के लिए अब सरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल कर रही है. डिजिटल इंडिया में साइबर धोखाधड़ी पर रोक (Curbing Cyber Frauds in Digital India) नाम की पहल के तहत ऑनलाइन ट्रांजैक्शन की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है. इस तकनीक के जरिए संदिग्ध गतिविधियों को जल्दी पहचानकर कार्रवाई की जा सकती है.
मशीन लर्निंग से फ्रॉड डिटेक्शन
बैंकों के सिस्टम में मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म लगाए जा रहे हैं. ये एल्गोरिद्म लाखों ट्रांजैक्शन के डेटा का विश्लेषण करते हैं. अगर किसी खाते से अचानक बड़ी रकम ट्रांसफर होती है या किसी नए स्थान से लॉगिन होता है, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर देता है. इससे बैंक तुरंत कार्रवाई कर सकता है और संभावित फ्रॉड को रोका जा सकता है.
व्यवहार आधारित विश्लेषण
AI सिस्टम उपयोगकर्ताओं के व्यवहार का डिजिटल प्रोफाइल भी तैयार करता है. यह देखता है कि व्यक्ति किस समय ट्रांजैक्शन करता है, किस जगह से लॉगिन करता है और किस तरह के भुगतान करता है. अगर इस व्यवहार से अलग कोई गतिविधि होती है, तो उसे संभावित धोखाधड़ी के रूप में चिन्हित कर लिया जाता है. इससे साइबर फ्रॉड की पहचान करना आसान हो जाता है.
रियल-टाइम ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग
डिजिटल भुगतान प्रणाली में एआई टूल्स हर सेकंड होने वाले हजारों लेनदेन पर नजर रखते हैं. जैसे ही किसी संदिग्ध गतिविधि का पता चलता है, बैंक तुरंत ट्रांजैक्शन को रोक सकता है. कई मामलों में खाते को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया जाता है. इससे ठगी की रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोका जा सकता है.
I4C और कानून प्रवर्तन का समन्वय
साइबर अपराध से लड़ने के लिए भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र यानी I4C केंद्रीय भूमिका निभा रहा है. यह संस्था बैंकों, टेक कंपनियों और पुलिस एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करती है. इसके तहत एक केंद्रीकृत साइबर फ्रॉड डाटाबेस तैयार किया जा रहा है, जहां संदिग्ध खातों, मोबाइल नंबरों और आईपी एड्रेस की जानकारी साझा होगी. साथ ही 1930 हेल्पलाइन और साइबर पोर्टल को भी AI सिस्टम से जोड़ा जा रहा है, ताकि शिकायत मिलते ही तुरंत कार्रवाई की जा सके और लोगों का पैसा बचाया जा सके.