गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले 25 जनवरी को दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति बराक ओबामा हिंदुस्तान में होंगे. हिंदुस्तान यानी दुनिया के नक्शे पर आतंकवाद के लिए सबसे बदनाम मुल्कों में से एक पाकिस्तान के ठीक बगल में. लेकिन इस दौरे से ऐन पहले पाकिस्तान ने जो पैंतरा बदला है, उससे रातों-रात पूरी दुनिया की निगाहें पाकिस्तान की ओर उठ गई हैं. पैंतरा, मुंबई हमले के गुनहगार जमात-उद-दावा समेत तकरीबन दर्जन भर आतंकवादी संगठनों पर बैन लगाने का.
जमात-उद-दावा सैकड़ों बेगुनाहों की मौत का गुनहगार है. हक्कानी नेटवर्क अमेरिकी और नाटो फौज का कातिल है. जमात-उद-दावा मुंबई में हुए आतंकवादी हमले का कुसूरवार है तो हक्कानी नेटवर्क काबुल में भारतीय दूतावास पर हुए हमले का जिम्मेदार. पाकिस्तान की सरजमीन पर पनप कर अनगिनत बेगुनाहों का खून बहानेवाले इन दोनों ही आतंकवादी संगठनों पर आखिरकार फुलस्टॉप लग ही गया. यानी अब जमात-उद-दावा के बैनर तले ना तो दुनिया का सबसे खूंखार आतंकवादी सरगना हाफिज सईद हिंदुस्तान के खिलाफ आग उगल सकेगा और ना ही हक्कानी नेटवर्क के झंडे तले मौलवी जलालुद्दीन हक्कानी लोगों को बरगला कर यूएस और नाटो फौज के खिलाफ फिदायीन बना सकेगा.
सवालों के घेरे में बैन
पाकिस्तान में जमात-उद-दावा और हक्कानी नेटवर्क समेत तकरीबन दर्जन भर आतंकवादी और विवादित संगठनों पर बैन लगने के बावजूद यही वो सवाल है, जो हर किसी के जेहन में है. वजह ये कि पाकिस्तान अपनी धरती पर पनपने, पलने और बढ़नेवाले आतंकवादी संगठनों को लेकर कभी संजीदा नहीं रहा. बल्कि अगर ये कहें कि पाकिस्तान की हुकूमत अलग-अलग दौर में अलग-अलग तरीके से इन संगठनों के जरिए कुर्सी पर बने रहने की तरकीब लड़ाती रही, तो भी ये गलत नहीं होगा. और अब यही वजह है कि पाकिस्तान की सरकार ने बेशक इन संगठनों पर रोक लगाने का ऐलान किया हो, दुनिया भर में उसकी नीयत को लेकर शक बरकार है.
पाकिस्तान ने ऐसा तब किया है जब दुनिया का सबसे ताकतवर शख्स यानी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा हिंदुस्तान आनेवाले हैं. और जब अमेरिका ने बेहद तल्ख अंदाज में पाकिस्तान को ऐसा करने की ताकीद की है. ऐसे में सवाल यही उठता है कि क्या ये वाकई पाकिस्तान की नीयत में हुई तब्दीली का असर है या फिर उस पर बने दबाव का असर. वैसे भी 16 दिसंबर को पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान ने गुड और बैड तालिबान जैसे किसी फर्क से इनकार करते हुए तमाम दहशतगर्दों के साथ एक ही तरीके से पेश आने की बड़ी-बड़ी बातें कही थीं. लेकिन इसके बावजूद काफी दिनों तक ये तमाम संगठन और इनसे जुड़े दहशतगर्द कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाते रहे.
पाकिस्तान लगातार कश्मीर के बॉर्डर पर फायरिंग करता रहा और आतंकवादियों की घुसपैठ की कोशिशें भी चलती रहीं. पाकिस्तान से आ रही खबरों के मुताबिक वहां की सरकार ने इन दोनों आतंकवादी संगठनों के साथ-साथ हरकत उल जिहाद इस्लामी, हरकत उल मुजाहिदीन, फलाह-ऐ-इंसानियत फाउंडेशन, उम्माह तामीर-ऐ-नौ, हाजी खैरुल्ला हाजी सत्तार मनी एक्सचेंज, राहत लिमिटेड, रौशन मनी एक्सचेंज, अल अख्तर ट्रस्ट और अल राशिद ट्रस्ट जैसे संगठनों पर भी रोक लगा दी है. लेकिन इस फैसले का सही असर समझने के लिए पूरी दुनिया को कुछ दिनों का इंतजार जरूर करना होगा.
पहले भी चली है ऐसी चाल
अमेरिका पर 9-11 हमलों के बाद लश्कर-ए-तय्यबा पर पाबंदी लगा दी गई थी. जिसके बाद हाफिज सईद ने पहली बार चली थी एक नई चाल. उसने लश्कर को एक नया नाम जमात-उद-दावा दे दिया. इसके बाद इसी नाम से वो पूरे पाकिस्तान और आसपास के इलाके में अपनी जेहादी कार्रवाई चलाता रहा. फिर मुंबई हमले के बाद दुनियाभर की सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचने के लिए हाफिज सईद ने वही पुरानी चाल चली. जमात-उद-दावा यानी लश्कर के मजहबी चेहरे को अब एक बार फिर बदल दिया. जमात-उद-दावा अब बन गया था तहरीक-ए-हुरमत-ए-रसूल. हाफिज सईद का इरादा साफ था जब-जब उसके आतंकवादी संगठन पर पाबंदी लगेगी वो इसी तरह अपना नाम बदल कर जेहाद का जहर उगलता रहेगा.
दरअसल, मुंबई हमलों के बाद संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तानी संगठन जमात-उद-दावा पर भी पाबंदी लगा दी थी और उसके लिए इस नाम से दुनिया के किसी कोने में काम करना मुश्किल होने लगा था इसीलिए हाफिज सईद ने नई चाल चली थी. ऐसी चाल जिसे वो पहले भी कई बार कामयाबी के साथ आजमा चुका था. लेकिन उसके इरादे अब भी उतने ही खतरनाक थे वो अब भी दुनियाभर में जेहाद का डंका पीटना चाहता था. लेकिन संयुक्त राष्ट्र के बाद अब अमेरिका ने भी जमात-उद-दावा को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है.
आगे पढ़ें, कौन है हाफिज सईद...{mospagebreak}बचपन से ही पड़ गए थे नफरत के बीज
अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र हाफिज सईद का नाम पहले ही दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादियों की सूची में डाल चुके हैं. इतना ही नहीं उसके सिर पर अमेरिका ने दस मिलियन डॉलर यानी करीब 60 करोड़ का इनाम भी रखा हुआ है. वो पाकिस्तान के लिए कभी इज्जतदार शख्सियत बन जाता है, कभी मुल्जिम तो कभी नॉन स्टेट एक्टर. लेकिन किसी भी सूरत में हिंदुस्तान को लेकर उसकी बदजुबानी कम नहीं होती. हमेशा ही उसके इशारे पर दहशतगर्दों ने हिंदुस्तान को जख्मी ही किया है. उसके सिर पर अमेरिका ने इनाम तक रखा हुआ है, लेकिन कमाल देखिए कि वो पाकिस्तान में खुलेआम घूमता है.
खास बात ये है कि मुंबई हमले का ये सबसे बड़ा गुनहगार हाफिज सईद कभी कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक को गले लगाता है, तो कभी पाकिस्तानी फौज को उकसाकर हिंदुस्तान को लहुलूहान करता है. हिंदुस्तान के खिलाफ हाफिज के मन नफरत की बोल कोई आज नहीं बढ़ी, बल्कि ये बीज उसके मन में तभी पड़ गया था, जब दोनों मुल्कों का बंटवारा हुआ. बंटवारे से पहले हरियाणा के रहने वाले सईद के परिवार के कई लोग दंगों में मारे गए. लेकिन दुनिया ने हाफिज सईद का नाम तब पहली बार सुना, जब उसने 1990 में आईएसआई की मदद से जमात-उद-दावा के झंडे तले आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की बुनियाद रखी.
भारत में 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले में मौलाना मसूद अजहर के साथ जब हाफिज सईद का नाम भी सामने आया, तो उसे अपने मकसद में एक और कामयाबी मिली. इसके बाद 11 जुलाई 2006 को मुंबई के ट्रेन धमाके और 26/11 के मुंबई हमलों के पीछे भी सईद के दिमाग की बात सामने आई, लेकिन हम उसके खिलाफ कार्रवाई की बातें करने के सिवा और कुछ भी नहीं कर सके. हद तो ये रही कि तमाम सुबूतों के बावजूद पाकिस्तानी कोर्ट ने हाफिज सईद को इस मामले में बइज्जत बरी कर दिया.