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बगदादी के मासूम बम की फैक्ट्री का खौफनाक सच

बस्ते में किताबों की जगह बम. कमर में बेल्ट के साथ बारूद. हाथों में कलम की जगह रिमोट. बाकी बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे और वो दोनों बच्चियां जन्नत के सफर की तैयारी कर रही थीं. उन्हें उनके ही मां-बाप ने समझाया था कि कैसे उन्हें जन्नत मिलेगी. 8-9 साल की उम्र के बच्चों तक को भी बगदादी नहीं बख्श रहा है. जेहाद और जन्नत के नाम पर वो उन्हें बारूद से भरा बस्ता सिर्फ इसलिए थमा रहा है, ताकि ये बच्चे अपनी जान देकर उसे जिंदगी बख्श सकें.

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जेहाद के लिए तैयार हो रहे हैं बच्चे जेहाद के लिए तैयार हो रहे हैं बच्चे

बस्ते में किताबों की जगह बम. कमर में बेल्ट के साथ बारूद. हाथों में कलम की जगह रिमोट. बाकी बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे और वो दोनों बच्चियां जन्नत के सफर की तैयारी कर रही थीं. उन्हें उनके ही मां-बाप ने समझाया था कि कैसे उन्हें जन्नत मिलेगी. 8-9 साल की उम्र के बच्चों तक को भी बगदादी नहीं बख्श रहा है. जेहाद और जन्नत के नाम पर वो उन्हें बारूद से भरा बस्ता सिर्फ इसलिए थमा रहा है, ताकि ये बच्चे अपनी जान देकर उसे जिंदगी बख्श सकें.

कहते हैं कि किसी का मुस्तक़बिल तबाह करना हो तो उसका आज स्याह कर दो. ये बच्चियां बगदादी का आज भी हैं और बगदादी का कल भी. यानी मुस्तक़बिल भी. बस इस एक तस्वीर के जरिए बगदादी हमें आज का स्याह पल भी दिखा रहा है और तबाही का कल भी. दोनों मासूम जो अभी फऱिश्तों की उम्र की हैं, इस वक्त उस तैयारी में जुटी हैं जिसे सुन कर पूरी दुनिया लरज़ जाएगी. ये बच्चियां इस वक्त तैयार हो रही हैं, लेकिन स्कूल जाने के लिए नहीं ना ही बाहल अपने दोस्तों के साथ खेलने जाने के लिए.

अब दोनों अपने मां-बाप से विदा होंगी. बाकायदा गले लग कर. मां-बाप इन्हें प्यार भी करेंगे. मगर इस विदाई के बाद ये मां-बाप भले रोएं न रोएं लेकिन आपकी आंखें रोएंगी. इन मासूम को उनके अपने ही मां-बाप ने ये बताया और सिखाया है कि इस घर से बाहर निकलते ही वो सीधे जन्नत में जाएंगी. वो जन्नत जिसका सपना इन्हें बगदादी ने दिया है. ये तो मासूम हैं. इन्हें तो अभी जन्नत क्या दुनिया की भी समझ नहीं, लेकिन क्या करें. मासूम हैं तो मां-बाप पर यकीन है. अच्छा-बुरा नहीं पता.

मां-बाप अच्छे होते हैं ये इन्हें एतबार है. इसी मां ने इन्हें बगदादी के जन्नत का सपना दिखा कर इन्हें जेहाद के लिए तैयार किया है. यानी इन दोनों मासूम को जन्नत भेजने का आईडिया इस मां का ही है. पर क्यों? क्यों एक मां-बाप अपनी फूल जैसी बच्चियों को बग़दादी के लिए कुर्बान करने पर आमादा है? इन मासूम के बाप ने यही सवाल अपनी बीवी से पूछा, तो पढिए उसकी बीवी और इन मासूम की मां क्या जवाब देती है? हो सकता है ये जवाब आपको बेचैन करे, लेकिन पढिए...

आतंकी- तुम अपनी बच्चियों को मरने के लिए क्यों भेजना चाहती हो. ये तो अभी महज़ 7 और 8 साल की हैं. कम से कम जिहाद के लिए तो ये बहुत छोटी हैं.
बच्चियों की मां- जिहाद के लिए कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता. ये तो हर मुसलमान का फर्ज़ है.
आतंकी- तुम सही कह रही हो. अल्लाह तुम्हें सलामत रखे और तुम्हारी बेटियों की इस कुर्बानी को कुबूल करे. अच्छा अब खुदा की इस जंग में शामिल होने के लिए इन्हें जाने दो.
बच्चियों से आतंकी- क्या तुम उन काफिरों के सामने घुटने टेकना चाहोगी जो तुम्हारा रेप करें और मार दें या फिर तुम उन्हें मारना चाहोगी. हम एक ऐसे शानदार मज़हब से ताल्लुक रखते हैं, जो दुश्मनों के ज़ुल्म के सामने नहीं झुकते हैं.
बच्चियां- हां
आतंकी- तुम्हें घबराने की कोई ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम दोनों जन्नत जा रही है.
बच्चियां- अल्लाहो अकबर

दोनों बच्चियों को बमों के कपड़े से तैयार किया गया है. इन दोनों के बदन पर बारूद बंधे हैं. यानी ये इस वक्त मानव बम हैं. पता नहीं जिस बम को ये बच्चियां अपने बदन पर बांधकर धमाका करने जा रही हैं. उसके बाद इस मां को उनके टुकड़े भी मिलेंगे या नहीं, लेकिन इसे कमाल ही कहिए बगदादी का, जो इस्लाम के नाम इन लोगों के ज़ेहन से ऐसे खेल खेल रहा है कि आंखें होते हुए भी ये अंधे हो चुके हैं. इन्हें इतनी समझ नहीं कि जेहाद और जहालत में क्या फर्क है.

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