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Omicron जैसे नए कोरोना वैरिएंट तो और भी आएंगे, वैज्ञानिक इनके लिए कैसे करते हैं वैक्सीन अपडेट

New corona variants: दुनियाभर में कोरोना की नई लहर नई तबाही लेकर आई है. जानिए कैसे इन नए वैरिएंट्स के लिए वैक्सीन को अपडेट किया जाता है और दुनियाभर में कितनी तरह की वैक्सीन तैयार और अपडेट हो रही हैं.

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vaccine vaccine
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ओमिक्रॉन वैरिएंट की मार से बेहाल कई देश
  • 333 कोरोना वैक्सीन्स का ट्रायल जारी

कोरोना वायरस के नए-नए वैरिएंट कोरोना महामारी का संकट लगातार बढ़ा रहे हैं. दुनियाभर में कोरोना की नई लहर नई तबाही लेकर आई है. जानिए कैसे इन नए वैरिएंट्स के लिए वैक्सीन को अपडेट किया जाता है और दुनियाभर में कितनी तरह की वैक्सीन तैयार और अपडेट हो रही हैं.

अल्फा, बीटा, गामा, कप्पा, डेल्टा, डेल्टा प्लस और अब ओमिक्रॉन, महामारी से जूझ रही दुनिया ने पिछले दो साल में लगातार वायरस के नए-नए वैरिएंट्स का कहर झेला है. अभी भी न वायरस के वैरिएंट रुक रहे हैं और न ही इनका कहर. दुनिया अभी कोरोना महामारी की तीसरी लहर का सामना कर रही है. रोज 25 लाख से अधिक केस सामने आ रहे हैं तो हजारों लोगों की मौतें हो रही हैं. क्या यूरोप, क्या अमेरिका और क्या भारत, चीन, पाकिस्तान जैसे एशियाई देश सभी कोरोना के नए ओमिक्रॉन वैरिएंट की मार से बेहाल हैं. दुनिया के अधिकांश देश वैक्सीनेशन तेज कर रहे हैं लेकिन स्थिति नियंत्रण में होती नहीं दिख रही.

वैज्ञानिकों का मानना है कि महामारी का अंत यहीं नहीं होने वाला है. कोरोना वायरस के नए- नए वैरिएंट अभी और भी आएंगे. हर बार वायरस नए रूप और नई ताकत के साथ सामने आएगा और दुनिया के सामने महामारी की नई चुनौती पेश करता रहेगा. ऐसे में सिर्फ वैक्सीनेशन ही लोगों के शरीर में इम्युनिटी बढ़ाकर इससे लड़ने की क्षमता मजबूत कर सकता है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार अभी दुनिया भर में 21 कंपनियों की कोरोना वैक्सीन लगाई जा रही हैं. वैक्सीनेशन करीब- करीब दुनिया के हर देश में जारी है. कई गरीब देशों को कोवैक्स के जरिए वैक्सीन मिली हैं लेकिन अभी भी पर्याप्त वैक्सीन अधिकांश देशों में उपलब्ध नहीं है. दुनिया की सारी उम्मीदें अब उन 333 कोरोना वैक्सीन्स से हैं जो अलग-अलग देशों में ट्रायल और प्री-ट्रायल फेज में हैं. इनमें से कई को जल्द ही इस्तेमाल की अनुमति मिल सकती है. अभी सिर्फ इंजेक्शन के जरिए कोरोना की वैक्सीन लग रही है लेकिन आने वाले वक्त में नैजेल और ओरल वैक्सीन भी विकसित होने वाली हैं.

क्यों जरूरत है नए वैरिएंट्स के साथ नई वैक्सीन की?

जिन लोगों को वैक्सीन की दो डोज लग गई हैं उन्हें भी बूस्टर डोज लगाई जा रही है. ऐसे में अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या वर्तमान में लग रहीं वैक्सीन नए-नए वैरिएंट्स से लड़ने में सक्षम होंगी? तो इसका जवाब है- नहीं... पूरी तरह नहीं. वायरस के म्यूटेशन पर हुई स्टडीज में ये बात सामने आई है कि नए वैरिएंट्स में वैक्सीन को बाइपास करने की क्षमता है और इसके लिए वैक्सीन को भी साइंटिस्ट्स को लगातार अपडेट करते रहना होगा. हम आपको बताएंगे कि ये काम कैसे होता है और बूस्टर डोज से इनका क्या कनेक्शन है?

DNA और mRNA वैक्सीन्स पर दो दशकों से भी अधिक समय से स्टडी कर रहीं माइक्रोबायोलॉजिस्ट Deborah Fuller कहती हैं कि चूंकी म्यूटेशन से सामने आया वायरस का नया वैरिएंट इतना बदल चुका होता है कि जरूरी नहीं कि वैक्सीन लगने से शरीर में तैयार एंटीबॉडी शरीर के सेल्स में उनकी पहचान कर सकें और उनको रोकने में सक्षम भी हों. इसके लिए जरूरी है कि उन्हें नई जीनोम सिक्वेंसिंग की स्टडी के अनुरूप लगातार अपडेट किया जाए.

शरीर में कैसे काम करती हैं वैक्सीन?

वैक्सीन कैसे काम करती है इसे समझने के लिए ये जानना जरूरी है कि शरीर को कोरोना वायरस कैसे प्रभावित करता है. दरअसल, कोरोना वायरस शरीर के अंदर सेल्स की सतह को इंफेक्ट करने के लिए स्पाइक प्रोटीन का इस्तेमाल करता है. mRNA वैक्सीन भी इसी फॉर्मूले पर वायरस पर प्रहार करती है. इसके लिए वैक्सीन में उसी वायरस के इनइफेक्टिव रूप को इस्तेमाल कर नुकसान नहीं पहुंचाने वाला स्पाइक प्रोटीन तैयार किया जाता है ताकि वह सेल को वायरस से लड़ने के निर्देश दे सके और शरीर के सेल्स में प्रोटेक्शन तैयार कर सके.

क्या है इसका प्रोसेस?

नए वैरिएंट्स से मुकाबले के लिए वैक्सीन में इसी प्रोसेस को फिर दोहराया जाता है और नए लक्षणों को पहचान कर उनकी जीनोम सिक्वेंसिंग तैयार कर नई तरह की स्पाइक प्रोटीन तैयार करके उसे वायरस से मुकाबले के लायक बनाया जाता है. यही स्पाइक प्रोटीन शरीर में एंटीबॉडीज का निर्माण करती हैं जिससे वायरस से बचाव की क्षमता शरीर में डेवलप होती है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ओमिक्रॉन जैसे नए वैरिएंट वायरस के पुराने रूप से काफी अलग होते हैं और पुराने वायरस पर उतना ही प्रभावी हों ये जरूरी नहीं. वैक्सीन इनकी पहचान कर शरीर में इन्हें रोकने लायक एंटबॉडीज बनाए इसके लिए जरूरी है कि वैक्सीन को नए म्यूटेशन के जीनोम को समझने लायक बनाया जा सके.

पुरानी वैक्सीन से नई वैक्सीन में अलग क्या होता है?

अभी मॉडर्ना और फाइजर जैसी कंपनियों की mRNA वैक्सीन कोरोना वायरस के ओरिजिनल स्ट्रेन के स्पाइक प्रोटीन का इस्तेमाल कर बनी हैं. नई और अपडेटेड वैक्सीन के लिए ओमिक्रॉन स्पाइक प्रोटीन के लिए mRNA इंस्ट्रक्शन एनकोड करना होता है ताकि नए म्यूटेशन वाले वायरस की पहचान कर सके और उन्हें रोकने के लिए एंटीबॉडीज काम कर सकें ताकि सेल्स को इंफेक्ट करने से वायरस को रोका जा सके.

साइंटिस्ट वैक्सीन को अपडेट कैसे करते हैं?

माइक्रोबायोलॉजिस्ट डेबोराह फ्यूलर के अनुसार mRNA वैक्सीन को अपडेट करने के लिए दो चीजों की जरूरत होती है. पहली- नए वैरिएंट की स्पाइक प्रोटीन की जीनोम सिक्वेंस और दूसरी DNA टेंप्लेट, जिनका इस्तेमाल mRNA तैयार करने के लिए होता है. इसके लिए रिसर्चर DNA टेंप्लेट को सिंथेटिक एंजाइम और मोलेक्यूलर ब्लॉक्स के साथ मिलाकर mRNA तैयार करते हैं. ये एंजाइम फिर डीएनए टेंप्लेट की mRNA कॉपी तैयार करेंगी. किसी वैक्सीन के लिए mRNA तैयार करने में कुछ मिनटों का ही समय लगता है. इस mRNA ट्रांसक्रिप्ट से स्पाइक प्रोटीन इंस्ट्रक्शन तैयार किया जाता है ताकि ये सेल्स में एंटीबॉडीज तैयार कर सकें.

वैक्सीन को अपडेट करने में कितने दिन का समय लगता है?

वैक्सीन एलायंस GAVI की एक रिपोर्ट के अनुसार नई mRNA वैक्सीन बनाने के लिए जरूरी डीएनए टेंप्लेट तैयार होने में 3 दिन का समय लगता है. फिर एक हफ्ता लगता है mRNA वैक्सीन की एक डोज लैब में टेस्टिंग के लिए तैयार करने में. और इसके बाद 6 हफ्ते लगते हैं एक टेस्ट ट्यूब के अंदर ह्यूमैन सेल पर ये टेस्ट करने में कि वैक्सीन कारगर है या नहीं यानी इसके प्री-क्लीनिकल ट्रायल में. यानी कुल 52 दिनों में वैक्सीन का नया अपडेटेड वर्जन मैनुफैक्चरिंग के लिए तैयार होता है ताकि क्लीनिकल ट्रायल के लिए इसे बनवाया जा सके. अगले कुछ हफ्ते क्लीनिकल ट्रायल और फिर ह्यूमैन ट्रायल में लगते हैं. यानी कि वैक्सीन का नया रूप तैयार होने और टेस्ट के बाद लोगों से पहले अप्रूवल के लिए भेजने से पहले के प्रोसेस में करीब 100 दिनों का समय लग सकता है. इस नई वैक्सीन में भी पुरानी वैक्सीन के सारे इनग्रेडिएंट्स मौजूद होते हैं. बस अंतर होता है कि ये नए वैरिएंट्स की जीनोम सिक्वेंसिंग की स्टडी पर आधारित होता है. उसकी पहचान कर उसके खिलाफ एंटीबॉडीज तैयार करने की क्षमता इसमें आ जाती है.

क्या अब तक किसी वैक्सीन का वर्जन अपडेट हुआ है?

हां, अक्टूबर 2020 में कोरोना का B.1.351 वैरिएंट जब सामने आया था तब एक्सपर्ट्स ने इसकी स्टडी में पाया था कि उस समय तक बन चुकी वैक्सीन को सरपास करने की इसमें क्षमता है. तब वैक्सीन निर्माता लैब्स में तुरंत अपडेटेड वर्जन पर काम शुरू हुआ. अपडेटेड mRNA वैक्सीन का ढांचा तैयार भी हो गया था लेकिन सौभाग्य से ये वैरिएंट बहुत संक्रमण नहीं फैला सका लेकिन कंपनियां तैयार थीं कि अगर इसका असर बढ़ता है तो नई वैक्सीन तुरंत लॉन्च की जा सके. नए-नए वैरिएंट्स को लेकर भी लगातार स्टडी जारी है ताकि इनके रोकथाम के लिए वैक्सीन्स को अपडेट किया जा सके.

जिन लोगों को वैक्सीन लग चुकी है उनका क्या होगा?

Omicron वैरिएंट से तेज हुई कोरोना की इस तीसरी लहर में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं जिन्होंने वैक्सीन को दो डोज लगवा रखी है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि नए वैरिएंट्स का मुकाबला करने के लिए उन्हें क्या करना होगा. क्या उन्हें फिर से वैक्सीन की डोज लगवानी होगी? इसके जवाब में माइक्रोबायोलॉजिस्ट कहते हैं कि जिन लोगों ने वैक्सीन पहले लगवा ली है या जिन्हें कोरोना हो चुका है उन्हें बचाव के लिए नए विकसित वैक्सीन की सिंगल बूस्टर डोज लगवानी होगी. ये न केवल नए वैरिएंट्स से बचाव करने में कारगर हो सकता है बल्कि उन बाकी वैरिएंट्स से भी बचाव करेगा जो संक्रमण फैला रहे हैं. जैसे अभी भले ही ओमिक्रॉन वैरिएंट तेजी से फैल रहा है लेकिन डेल्टा समेत बाकी वैरिएंट भी कम कहर नहीं ढा रहे.

वैक्सीन की तीसरी-चौथी डोज का क्या है फॉर्मूला?

दुनिया भर में अभी जो 21 वैक्सीन लगाई जा रही हैं उनकी लाइफटाइम को लेकर काफी अलग-अलग राय है. फाइजर, मॉर्डना, एस्ट्रेजेनेका, स्पुतनिक, कोविशील्ड, कोवैक्सीन, शिनवैक जैसी अभी मौजूदा वैक्सीन्स की शरीर में बचाव की मियाद 3 महीने से 1 साल के बीच अलग-अलग बताई जाती है. इसीलिए अब लोगों को बूस्टर डोज लगाई जा रही है ताकि प्रभाव कम होने से पहले बचाव का नया डोज शरीर में विकसित हो सके. भारत जैसे देशों में जहां प्रिकॉश्नरी डोज 60 साल से ऊपर के लोगों और हेल्थ वर्कर्स को लगाई जा रही है तो अमेरिका जैसे देशों में तीसरी यानी बूस्टर डोज सबको लगाई जा रही है. वहीं इजरायल जैसे देशों में लोगों को चौथी वैक्सीन डोज भी लगनी शुरू हो गई है ताकि नए-नए वैरिएंट्स से बचाव किया जा सके. हालांकि अभी भी दुनिया की एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसे वैक्सीन नहीं लगाई जा सकी है.

कम वैक्सीनेशन के क्या खतरे बता रहे एक्सपर्ट?

हेल्थ एक्सपर्ट इस बात को लेकर दूसरी लहर के समय से चेताते आ रहे हैं कि अगर एक देश ने अपने लोगों को वैक्सीन लगा दी है और दूसरे देश में लोगों को कम लगी है तो बिना वैक्सीन लगवाए लोगों में वायरस से संक्रमित होने का अधिक खतरा बना रहेगा और लहर कम होते ही फिर जैसे ही आवाजाही शुरू होगी, लोग एक दूसरे के संपर्क में आएंगे और फिर से संक्रमण फैलने लगेगा. ऐसे में लगातार कोरोना की लहरें दुनिया को अपनी चपेट में लेती रहेंगी. इसे रोकने के लिए जरूरी है कि वैक्सीन भेदभाव खत्म कर गरीब देशों में भी वैक्सीन मुहैया कराई जाए और वैक्सीनेशन सबका कराया जाए.

कोरोना की लगातार आ रही लहरों को रोकने के लिए जरूरी है कि दुनियाभर में वैक्सीनेशन अभियान को तेज किया जाए. इसके लिए जरूरी है कि गरीब देशों में भी सबको वैक्सीन लगे. माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. यतीश अग्रवाल ने न्यूज एजेंसी से बात करते हुए बड़े खतरे की ओर ध्यान दिलाया कि वायरस के कहर को रोकने के लिए हर्ड इम्युनिटी डेवलप करना जरूरी है और इसके लिए जरूरी है कि दुनिया के सभी हिस्सों में सबको वैक्सीन लगाई जाए.

 

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