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बिहार: कोरोना मरीजों का इलाज करने वाले हॉस्पिटल हुए बीमार, हांफता सिस्टम! जानें क्या है हाल 

कोविड-19 की दूसरी लहर हर जगह कयामत बरसा रही है. बिहार जैसे राज्यों की तो मानो दुर्दशा हो गई है. मरीजों का इलाज करने वाले अस्पताल ही बीमार हो गए हैं. सूबे के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री सब कुछ ठीक-ठाक होने का दावा करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत उन दावों का कच्चा चिट्ठा खोल रही है. 

गया के अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज में जमीन पर चल रहा इलाज गया के अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज में जमीन पर चल रहा इलाज
स्टोरी हाइलाइट्स
  • गया के अस्पताल में हैरान करने वाले हालाता 
  • ऑक्सीजन की कमी, जमीन पर चल रहा इलाज
  • RT-PCR रिपोर्ट आने में लग रहा 5 दिन का समय 

बिहार में कोरोना संक्रमण अब छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी पैर पसार रहा है. इस बीच स्वास्थ्य व्यवस्थाएं ऐसी चरमराई हैं कि अस्पताल जाने से भी मरीजों को डर लग रहा है. ‌ऐसे में आजतक बिहार के अलग-अलग जिलों में कोविड-19 के संक्रमण और उससे लड़ने की सरकार द्वारा की जा रही तैयारियों की हर तस्वीर सामने ला रहा है. बिहार के जिन जिलों में संक्रमण का प्रकोप सबसे ज्यादा है उसमें गया भी एक है.

ANMMC हॉस्पिटल पहुंची टीम 
आजतक की टीम गया के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज पहुंची, जिसे पूरी तरह से कोविड अस्पताल में बदल दिया गया है. चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ संक्रमित मरीज या उनके तीमारदार ही दिखाई दे रहे थे. मरीज ज्यादा और अस्पताल में बेड कम, इसलिए जमीन पर ही मरीजों का इलाज ​चलता दिखाई दिया. वहीं कोविड-19 के लिए टेस्टिंग की व्यवस्था इस अस्पताल में तो है, लेकिन नतीजे आने में 3 से 5 दिन लग रहे हैं. यह जानकारी खुद अस्पताल की नर्स ने आजतक को दी. टेस्टिंग के नतीजों के सवाल पर अस्पताल की नर्स ने कहा, "मरीजों की संख्या अचानक बढ़ने लगी है, इसलिए RT-PCR टेस्टिंग में 5 दिन का समय भी लगने लगा है." 

जमीन पर चल रहा इलाज 
टेस्टिंग तो छोड़िए संक्रमित मरीजों के लिए अस्पताल में बेड की किल्लत होने लगी है. गया के सरकारी अस्पताल में मरीज फर्श पर गद्दा लगाकर ऑक्सीजन के सहारे जिंदा हैं. अस्पताल के हर ब्लॉक में हर कोने में संक्रमित मरीजों का इलाज किया जा रहा है और उनकी जान बचाई जा रही है, लेकिन अस्पताल जिस कदर बीमार दिखने लगे हैं, ऐसे में मरीजों का इलाज होगा तो कैसे होगा. संक्रमित मरीजों की संख्या ज्यादा है, अस्पताल में बेड की किल्लत है. इसलिए जमीन पर ही ऑक्सीजन के सहारे जिंदा रखने की जद्दोजहद हो रही है. 

ये बोले तीमारदार
कुंदन कुमार के पिता अस्पताल में जमीन पर ही लेट गए हैं और ऑक्सीजन के सहारे हैं. कुंदन कहते हैं कि पिताजी को किडनी की शिकायत है, लेकिन अस्पताल में बेड नहीं है. कुंदन का आरोप है कि पिताजी को ऑक्सीजन लगाने के लिए भी अस्पताल के स्टाफ को 2000 रुपये देने पड़े. मरीज के तीमारदारों से बात करते तब तक नजर राम सुरेश यादव पर पड़ी जो जमीन पर लेटे-लेटे किसी डॉक्टर के आने का इंतजार करते दिखाई दिए. उनको तड़पता देख आजतक संवाददाता ने अस्पताल के स्टाफ से गुहार लगाई कि जल्दी से इनकी जान बचाने के लिए किसी को बुलाया जाए या कम से कम ऑक्सीजन ही दी जाए. अस्पताल का स्टाफ एक-दूसरे का मुंह देखता रहा. बार-बार लगातार बोलने के बाद मरीज को एक स्ट्रेचर पर अस्पताल के भीतर ले जाया गया. वहीं मरीज राम सुरेश के बेटे को काउंटर पर कागज बनवाने के लिए भेज दिया गया. कहा पहले रजिस्ट्रेशन करवाइए. 

वार्ड बॉय का ये था कहना 
वार्ड बॉय ने बताया कि ऑक्सीजन तो हमारे पास है, लेकिन ऑक्सीजन सिलेंडर को चेहरे से जोड़ने के लिए जो मास्क चाहिए वह खत्म हो गया है. वार्ड बॉय ने कहा कि अगर मुझे ऐसे 20 मास्क मिल जाएं, तो यहां हंगामा नहीं होने देंगे. अस्पताल के मैनेजर आए, तो बोले हमारे पास जितने बेड हैं उससे ज्यादा हमारे पास मरीज हैं, लेकिन किसी तरह हम व्यवस्था कर लेंगे. 

हॉस्पिटल स्टाफ से नाराज तीमारदार 
बिहार के दूसरे शहरों की तरह गया के अस्पताल में आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों की सबसे बड़ी शिकायत अस्पताल प्रबंधन यहां काम करने वाले स्टाफ को लेकर के है. पहले ही मुश्किलें कम नहीं हैं, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों से दूर भाग रहे अस्पताल के कर्मचारियों के चलते इस महामारी में समस्याएं दोगुनी हो गई हैं. कोमा में गए मरीज के रिश्तेदार गुड्डू का कहना है, "यहां जितनी भी स्टाफ नर्स हैं उन्हें हर चीज के लिए बोलना पड़ता है. खुद से यह कुछ नहीं करते. 24 घंटे कोविड-19 मरीज के साथ हमें रहना पड़ता है. यह लोग कुछ नहीं करते. जब तक आप 10 बार नहीं नहीं कहेंगे तब तक इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती." 

ये है बड़ी चुनौती 
इस अस्पताल में जिंदा रहना ही अपने आप में बड़ी चुनौती है. वार्ड बॉय के अलावा फर्श पर पड़े मरीजों की सुनने देखने वाला कोई नहीं है. पल-पल कभी किसी की ऑक्सीजन खत्म होती है, तो कभी किसी की ऑक्सीजन मशीन में दिक्कत आने लगती है. कभी हॉल के किसी कोने में मरीज बेचैन होने लगता है, तो कभी दूसरे कोने से मदद के लिए चीख-पुकार मच ने लगती है. कोई स्ट्रेचर पर लेटा है, कोई कुर्सी पर लेट गया है, तो कई मरीज जमीन पर पड़े हुए हैं. वार्ड बाय पीयूष कहते हैं कि यहां छोटे सिलेंडर वाले ऑक्सीजन मौजूद नहीं हैं. बड़े ऑक्सीजन सिलेंडर तो हैं, लेकिन उसके लिए बेड नहीं है. पिछले बुधवार से मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई है. पीयूष कहते हैं कि पिछले 10 दिनों में इसी अस्पताल में 100 से 150 लोगों की मृत्यु हो चुकी है. 

अस्पताल कर्मचारियों ने खोली पोल 
मरने वालों के ये आंकड़े गया प्रशासन द्वारा कागजों में कभी सामने नहीं आए, लेकिन अस्पताल के कर्मचारी ने ही महामारी की विभीषिका की पोल खोल कर रख दी. पीयूष कहते हैं कि हर दिन 5 से 6 लोग यहां दम तोड़ देते हैं. हमने पीयूष से यह भी पूछा कि आखिर इसकी बड़ी वजह है क्या? पीयूष कहते हैं कि यहां लोग ऑक्सीजन की कमी नहीं बल्कि डॉक्टरों की लापरवाही से मर रहे हैं और हर दिन मर रहे हैं. उसने बताया कि डॉक्टर यहां ड्यूटी पर तो हैं, लेकिन मरीजों को देखने हॉल में नहीं आते हैं, बल्कि अपने चेंबर में ही खिड़की पर बैठते हैं. मरीज वार्ड बॉय के भरोसे हैं.

ऑक्सीजन की कमी से जूझते मरीज 
वहीं दूसरे वार्ड बॉय ने हमें जानकारी दी कि जिस तड़पते मरीज को अभी-अभी स्ट्रेचर पर डालकर ऑक्सीजन दिया गया, उसकी हालत खराब होने के चलते उसे पटना मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया गया है. वार्ड बॉय ने बताया कि उसे एंबुलेंस की सुविधा प्रदान की जाएगी. इधर एक मरीज को पटना रेफर किया जा रहा है, तो अस्पताल में फर्श पर लेटी दूसरी महिला का ऑक्सीजन सिलेंडर खत्म हो गया और अब उसके लिए ऑक्सीजन लाने की जद्दोजहद होने लगी. वार्ड बॉय ने कहा कि बड़ा सिलेंडर नहीं दिया जा रहा है और छोटा सिलेंडर खत्म हो गया है. 


कुछ ही सेकंड में मची अफरा-तफरी
कुछ ही सेकंड में अचानक इतनी अफरा-तफरी होने लगी कि स्वास्थ्य व्यवस्था से ही भरोसा उठ जाए. कोई अपने मरीज को गोद में ही उठाकर लेकर जाने लगा, तो राम सुरेश के बेटे उन्हें बाइक पर बिठाकर ही पटना ले जा रहे हैं. गया से पटना की दूरी 150 किलोमीटर से भी ज्यादा है. बेटे ने कहा कि डॉक्टर ने कहा है अब इन्हे पटना ले जाइए. अस्पताल के दो हिस्सों पर एक साथ दो घटनाएं हो रही थीं. 

ये बोले सुपरिटेंडेंट डॉ. पीके अग्रवाल 
अस्पताल खस्ताहाल हैं, लेकिन सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही. गया अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. पीके अग्रवाल भी मानते हैं कि मरीजों की बढ़ती संख्या के चलते अस्पताल में बेड की किल्लत हो गई है, लेकिन कोई मरीज बिना इलाज के परेशान न हो इसलिए उन्होंने ऑक्सीजन लगाकर खुली जगह में ही इलाज करना शुरू कर दिया है. 


लगातार बढ़ रही मरीजों की संख्या 
गया मेडिकल कॉलेज में लगभग 200 बेड हैं, जिसमें से 180 से 185 बेड पर मरीज हैं. अस्पताल की ओर से 150 बेड बढ़ाने की व्यवस्था की जा रही है. डॉ. अग्रवाल भी मानते हैं कि पिछले 15 दिनों में मरीजों की संख्या में ऐसी बढ़ोत्तरी हुई है जिसके चलते मरने वाले मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है. 


 

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