देश में मजदूरों की दिनचर्या किसी से छिपी नहीं है. रोज कमाना है और रोज खाना है. अगर एक दिन काम पर नहीं गए या एक दिन काम नहीं मिला तो फिर उस दिन पेट कैसे भरेगा ये समस्या आम है. लेकिन फिलहाल मजदूरों के सामने मुश्किलों का पहाड़ है. सबकुछ 21 दिन के लिए बंद यानी 14 अप्रैल तक ऐसी ही स्थिति रहेगी, जिससे उनकी घबराहट बेचैनी में बदल गई है और बिना सोचे-समझे घर के लिए निकल पड़े हैं. आइए जानते हैं मजदूरों के सामने 5 बड़ी समस्याएं क्या हैं. Photo: K Asif (Mail Today)
1. रोजी-रोटी का संकट: देशभर में लॉकडाउन की वजह से सबकुछ बंद है और ये बंद 14 अप्रैल तक रहेगा. मजदूरों का लगता है कि 21 दिन तक बिना किसी काम के शहरों में दिन बिताना बड़ा मुश्किल होगा. अगर कोई आज खाने को दे रहा है, कल देगा कि नहीं यह डर सता रहा है. जिस मकान में रहे हैं उसका आगे किराया कैसे देंगे. इसके अलावा किसी के पास जो थोड़ी जमापूंजी है उसे वो अपनों के बीच पहुंचकर खर्च करना चाहते हैं, क्योंकि दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में उनके बचे पैसे चंद दिनों में खर्च हो जाएंगे.
2. महंगी होतीं खाने-पीने चीजें: लॉकडाउन की वजह से जरूरी चीजों की सप्लाई पर असर पड़ा है, जिस वजह से कालाबाजारी के मामले सामने आ रहे हैं. खाने-पीने की चीजें महंगी मिल रही हैं, दुकानदारों का कहना है कि चीजें पीछे से महंगी आ रही हैं. खासकर आटा-तेल के दाम ज्यादा वसूल जा रहे हैं. कुछ छोटे दुकानदार इस लॉकडाउन का गलत फायदा उठा रहे हैं, जहां से गरीब-मजदूर हर रोज का सामान खरीदते हैं. भले की सरकार कह रही है कि सप्लाई सामान्य है. लेकिन जमीनी हकीकत अलग है.
3. सरकारी ऐलान ने दिलाई घर की याद: केंद्र सरकार ने ऐलान किया है कि लॉकडाउन के दौरान मजदूरों को घबराने की जरूरत नहीं है. हर गरीब व्यक्ति को अगले तीन महीने तक 5 किलो गेहूं या चावल और एक किलो दाल मुफ्त में दी जाएगी. इसके अलावा जनधन खातों में अगले तीन महीनों तक 500 रुपये हर महीने डाले जाएंगे. सरकार के इस ऐलान से वो गरीब परिवार बड़े शहरों से अपने गांव के लिए निकल पड़े, जिन्हें राशन गांव में मिलता है और जनधन खाते गांव में हैं. उन्हें लग रहा है कि अगर शहर में रह गए तो मुफ्त में अनाज नहीं मिल पाएगा, क्योंकि शहर में उनका राशन कार्ड नहीं है. Photo: K Asif (Mail Today)
4. शहरों में ज्यादा सख्ती: दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में लॉकडाउन को सख्ती से लागू किया जा रहा है. क्योंकि कोरोना वायरस के अधिकतर मामले अभी बड़े शहरों में ही सामने आए हैं. छोटे शहरों और कस्बों में लॉकडाउन का पालन तो हो रहा है लेकिन बड़े शहरों के मुकाबले जगह-जगह पुलिस की तैनाती नहीं है. मजदूरों को लगता है कि किसी तरह वो अपने घर को पहुंच जाएं फिर सोचेंगे कि आगे क्या करना है. गांव में खेती-बाड़ी करके आगे कुछ दिनों तक पेट पाल लेंगे. बड़े शहरों में सरकार मुफ्त खाना देने की बात कर रही है लेकिन कहां मिल रहा है और कब तक मिलेगा, इसका पता नहीं है. क्योंकि पुलिस सड़क पर निकलने नहीं दे रही है तो फिर कैसे सरकारी मदद उन्हें मिलेगी.
5. महामारी की मार और अपनों की याद: लोग घर-परिवार को छोड़कर बड़े शहरों में रोजी-रोटी के लिए जाते हैं. अब जब रोजी-रोटी नहीं है और फिर वो शहर किस काम का है. आज हर किसी के पास फोन है और वो जब अपने घरवालों से बात करते हैं तो चिंता में पड़ जाते हैं. अकसर घरवाले भी कहते हैं कि किसी तरह से घर आ जाओ फिर देखेंगे. बड़े शहरों से मजदूरों की वापसी के पीछे एक बात यह भी है कि उन्हें लगता है कि इस बड़े शहर में इस समय उनका कोई मददगार नहीं है. गांव पहुंच जाएंगे तो परिवार और समाज का साथ मिल जाएगा.