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तिमाही रिजल्ट पर न्यू लेबर कोड की चोट, कंपनियां बोलीं- बेसिक से लेकर ग्रेच्युटी तक पैसे का खेल

New Labour Code Rule: न्यू लेबर कोड के तहत किसी कर्मचारी से हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकता है. ओवर टाइम (Over Time) कराने पर सामान्य वेतन से दोगुना भुगतान करना होगा. हर 20 दिन के काम पर एक दिन की ईएल अनिवार्य है.

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नए श्रम कानून का कंपनियों की आर्थिक सेहत पर असर. (Photo: Getty)
नए श्रम कानून का कंपनियों की आर्थिक सेहत पर असर. (Photo: Getty)

नए लेबर कोड (New Labour Codes) के लागू होने से देश की तमाम बड़ी कंपनियों की बैलेंस शीट पर इसका असर दिखने लगा है. हफ्तेभर में देश की तीन दिग्गज आईटी कंपनियों ने तिमाही नतीजे जारी किए हैं, और तीनों ने बताया कि उसे न्यू लेबर कोड की वजह से अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा है.

दरअसल, सबसे पहले TCS ने तीसरी तिमाही के रिजल्ट के दौरान बताया कि न्यू लेबर कोड लागू होने की वजह से कंपनी को 2,128 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा है. HCL Tech को भी करीब 956 करोड़ रुपये का प्रोविजन करना पड़ा है. जबकि देश की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी इंफोसिस ने दिसंबर तिमाही में 1,289 करोड़ रुपये का वन टाइम खर्च दिखाया है, जो कि न्यू लेबर कोड के लिए प्रस्तावित है.

इस तरह से देश की टॉप-3 आईटी कंपनी TCS, इंफोसिस और HCL Tech को श्रम कानून में बदलाव से तीसरी तिमाही में 4,373 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा है, जिससे उनके नतीजों में असर दिखाई दिया है.

इंफोसिस का तर्क

Infosys ने बताया कि वन टाइम 1,289 करोड़ रुपये के प्रोविजन से कंपनी के नेट प्रॉफिट में 2.2% की गिरावट आई, जबकि कुल राजस्व में लगभग 8.9% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. खासतौर पर इस अतिरिक्त खर्च की वजह से कंपनियों के Q3 के मुनाफे पर दबाव दिखा. इंफोसिस का कहना है कि अगर न्यू लेबर कोड के लिए अलग से फंड निर्धारित नहीं करना पड़ता तो मार्जिन और बेहतर नजर आता.

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इंफोसिस ने भविष्य में आने वाले अतिरिक्त खर्चों को अभी ही मानकर उसके लिए 1,289 करोड़ रुपये अलग रख दिए, ताकि New Labour Code के कारण कंपनी पर जो कानूनी और वित्तीय जिम्मेदारियां आएंगी, वे कवर हो सकें. इसी को Provision भी कहते हैं. यानी यह पैसा अभी खर्च नहीं हुआ, लेकिन खर्च पक्का मान लिया गया है. यही कारण बताकर आईटी कंपनियों ने अपने नेट प्रॉफिट को कम करके दिखाया है. 

न्यू लेबर कोड में कई बदलाव

यही नहीं, नए लेबर कोड्स पूरी तरह से लागू होने के बाद आगे भी कर्मचारियों की लागत में बढ़ोतरी और मार्जिन पर दबाव जारी रह सकता है. इसके लिए कंपनियों को सैलरी इंक्रीमेंट में फेरबदल या दूसरे खर्चों में कटौती जैसी रणनीति अपनानी पड़ सकती हैं.

बता दें, नए लेबर कोड्स का उद्देश्य वेतन, रोजगार सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और वेलफेयर से जुड़ी नीतियों को मजबूत करना है. इन नियमों के तहत कंपनियों को अब बुनियादी वेतन का हिस्सा बढ़ाना, ग्रेच्युटी नियम बदलना और सामाजिक सुरक्षा लाभों को शामिल करना है. खासकर बेसिक सैलरी में बदलाव का असर दिखने वाला है. जहां कंपनियों का योगदान बढ़ने वाला है. नए श्रम कानून में कुल वेतन का कम से कम 50% बेसिक (Basic+DA) होना चाहिए. यानी जो कंपनियां अभी कम बेसिक दिखा रही हैं, उसे अब बढ़ाकर 50% करना होगा.

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कर्मचारियों के हित में न्यू लेबर कोड

केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 को चार नए लेबर कोड को आधिकारिक रूप से लागू करने का आदेश जारी कर दिया है. यह तारीख केंद्र सरकार ने ऑफिशियल गजट में नोटिफाई की है, जिसके बाद पुराने 29 श्रम कानूनों की जगह ये बुनियादी कोड लागू हो गए. एक तरह से न्यू लेबर कोड पूरे देश में लागू हैं, हालांकि कुछ राज्यों को इसे लागू करने में थोड़ा और वक्त लग सकता है. क्योंकि राज्य अपने हिसाब से ड्राफ्ट रूल पर काम कर रहे हैं. लेकिन केंद्र स्तर पर कोड लागू हैं और कंपनियों को उसके अनुसार तैयार होना है. 

न्यू लेबर कोड के तहत किसी कर्मचारी से हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकता. ओवर टाइम (Over Time) कराने पर सामान्य वेतन से दोगुना भुगतान करना होगा. हर 20 दिन के काम पर एक दिन की अर्जित अवकाश (ईएल) अनिवार्य है. ऐसे में बची हुईं छुट्टियों का पूरा भुगतान भी जरूरी कर दिया गया है.

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