बजट पेश हो गया है. सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अनुमानित लेखा-जोखा पेश कर दिया है. सरकार इकोनॉमी को चलाने के लिए टैक्स वसूलने के साथ-साथ कर्ज भी लेती है. साल-दर-साल कर्ज में इजाफा देखने को मिल रहा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट भाषण के दौरान बताया कि सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए रिकॉर्ड 17.2 लाख करोड़ रुपये कर्ज लेने का प्रस्ताव रखा है. ये राशि ग्रॉस बोरोविंग के जरिये जुटाई जाएगी, यानी सरकार बॉन्ड और डिबेंचर जारी करके उधार लेगी.
इसी वित्त वर्ष में नेट बोरोविंग (ब्याज और परिपक्वता को हटाने के बाद) लगभग 11.7 लाख करोड़ रुपये होगी. जबकि पिछले साल यानी वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार ने लगभग 14.8 लाख करोड़ रुपये कर्ज ली थी. इसका उद्देश्य देश का विकास खर्च, सरकारी योजनाएं और पूंजीगत खर्च जैसे इंफ्रा प्रोजेक्ट्स को पूरा करना है.
कुल 17.2 लाख करोड़ रुपये कर्ज लेने का प्लान
दरअसल, वित्त मंत्री ने संसद में बताया कि सरकार अपने राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए इस साल बाजार से कर्ज लेगी. सरकार सरकारी बॉन्ड जारी करके शुद्ध रूप से 11.7 लाख करोड़ रुपये उधार लेगी. बाकी पैसे छोटी बचत योजनाओं (जैसे PPF, NSC) और अन्य स्रोतों से जुटाए जाएंगे.
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार कुल मिलाकर बाजार से 17.2 लाख करोड़ रुपये कर्ज लेगी, इसमें से कुछ पैसा पुराने कर्ज चुकाने में जाएगा, इसलिए शुद्ध कर्ज 11.7 लाख करोड़ रुपये रहेगा.
सरकार का लक्ष्य है कि कर्ज-टू-जीडीपी अनुपात को धीरे-धीरे कम करना और राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना है. 2026-27 के बजट अनुमानों में कहा गया है कि केन्द्र सरकार के ऋण और जीडीपी का अनुपात 55.6 प्रतिशत रहेगा, जिसमें जीडीपी के 4.3 प्रतिशत राजकोषीय घाटे का लक्ष्य शामिल है.
आमदनी कम.. खर्च ज्यादा
राजकोषीय रणनीति के अन्य प्रावधानों में पूंजीगत व्यय पर लगातार ध्यान देने के माध्यम से आर्थिक वृद्धि को सहायता, वैश्विक आर्थिक घटनाओं और देश के विकसित भारत की ओर अग्रसर होने और सुनिश्चित करना शामिल है. अन्य प्रावधानों में टैक्स नीति में सुधार, व्यय नीति, सरकार उधारी, देनदारी और निवेश शामिल है.
वित्त मंत्री ने बताया कि सरकार को इस साल गैर-कर्ज वाली आमदनी (जैसे टैक्स, फीस वगैरह) से करीब 36.5 लाख करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है. वहीं सरकार का कुल खर्च लगभग 53.5 लाख करोड़ रुपये रहने की उम्मीद है. उन्होंने यह भी कहा कि टैक्स वसूली से राज्यों को उनका हिस्सा देने के बाद केंद्र सरकार के पास वह करीब 28.7 लाख करोड़ रुपये होगी. यानी खर्च आमदनी से ज्यादा है, इसलिए सरकार को बाकी जरूरतों के लिए कर्ज लेना पड़ेगा, और वो राशि 17.2 लाख करोड़ रुपये तक हो सकती है.