बीते जुलाई महीने में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम बजट पेश करते हुए देश को अगले पांच साल में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही थी. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार लगातार फैसले ले रही है. मसलन, विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए टास्क फोर्स समिति का गठन किया गया तो वहीं घरेलू निवेशकों को रिझाने के लिए कॉरपोरेट टैक्स में कटौती समेत कई बड़े फैसले लिए गए.
इसी के तहत अब सरकारी कंपनियों के विनिवेश को मंजूरी दी गई है. यहां बता दें कि विनिवेश प्रक्रिया निवेश का उलटा होता है. विनिवेश प्रक्रिया के तहत सरकार किसी पब्लिक सेक्टर की कंपनी में अपनी हिस्सेदारी कम कर लेती है या फिर बेच देती है. सरकार के विनिवेश का मकसद रकम को वापस निकालना होता है.
क्यों विनिवेश पर जोर दे रही सरकार?
केंद्र सरकार विनिवेश के जरिए अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की कोशिश में जुटी है. आंकड़े बताते हैं कि देश की जीडीपी की रफ्तार सुस्त है. वहीं औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) समेत अन्य आर्थिक आंकड़े भी निराश करने वाले हैं. इसी तरह, राजकोषीय घाटा कम करने या टैक्स कलेक्शन के लक्ष्य को हासिल करने की कोशिशें भी काम नहीं आ रही हैं.
राजकोषीय घाटा बढ़ने की आशंका!
केंद्र सरकार राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 फीसदी पर नियंत्रित रखना चाहती है लेकिन फिच सॉल्यूशंस का कहना है कि चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 3.6 फीसदी पर रह सकता है. सरकार ने बीते 20 सितंबर को घरेलू कंपनियों के लिए कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30 फीसदी से घटाकर 22 फीसदी कर दिया है. इस कदम से 2019-20 के दौरान सरकार को 1.45 लाख करोड़ रुपये के राजस्व की हानि होने का अनुमान है.यही वजह है कि राजकोषीय घाटा बढ़ने की आशंका जाहिर की जा रही है.
टैक्स कलेक्शन में भी कमी
चालू वित्त वर्ष (1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020) में टैक्स कलेक्शन के मोर्चे पर सरकार को बड़ा झटका लगा है. दरअसल, सरकार का डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन अबतक 6 लाख करोड़ रुपये रहा है. वहीं सरकार ने इस वित्त वर्ष में करीब 13.5 लाख करोड़ रुपये के टैक्स कलेक्शन का लक्ष्य रखा है. ऐसे में सरकार को लक्ष्य हासिल करने के लिए अगले 4 महीने में करीब 7.5 लाख करोड़ रुपये जुटाने होंगे. जाहिर सी बात है कि यह लक्ष्य आसान नहीं है. इसी तरह जीएसटी कलेक्शन में भी हर महीने कमी आ रही है और यह अब भी सरकार के लक्ष्य से नीचे चल रहा है.
विनिवेश से रेवेन्यू का क्या है लक्ष्य?
आम बजट में सरकार ने चालू वित्तवर्ष में विनिवेश से 1.05 लाख करोड़ रुपये की रकम हासिल करने का लक्ष्य रखा था. इससे पहले फरवरी में अंतरिम बजट पेश करते हुए पीयूष गोयल ने बताया था कि वित्त वर्ष (2019-20) में विनिवेश से 90,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया है. यह 2018-19 में विनिवेश के लिए तय 80,000 करोड़ के लक्ष्य से 10,000 करोड़ रुपये ज्यादा था. यहां बता दें कि 2018-19 में सरकार ने विनिवेश से अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया था.
अब तक कितना हो चुका है हासिल
सरकार को चालू वित्त वर्ष में विनिवेश से अबतक 15 हजार करोड़ रुपये के करीब हासिल हुए हैं. इसमें IRCTC के आईपीओ से प्राप्त 637.97 करोड़ रुपये भी शामिल है. बता दें कि आईपीओ के बाद IRCTC में सरकार की हिस्सेदारी घटकर 87.4 रह गई है. पहले इस कंपनी में सरकार की 100 फीसदी हिस्सेदारी थी. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार की IRCTC में 12.6 फीसदी हिस्सेदारी हिस्सेदारी घट गई है.
सरकार का नया फैसला
सरकार ने अब भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लि. (बीपीसीएल), पोत परिवहन कंपनी भारतीय जहाजरानी निगम (एससीआई) और माल ढुलाई से जुड़ी कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (कॉनकार) में सरकारी हिस्सेदारी बेचने को मंजूरी दे दी है. इसके अलावा सरकार टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कार्पोरेशन (टीएचडीसी), और नार्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लि. (एनईईपीसीओ) में अपनी हिस्सेदारी सार्वजनिक क्षेत्र की एनटीपीसी लि. को बेचेगी.
वहीं सरकार ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) समेत चुनिंदा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी को 51 फीसदी से नीचे लाने को मंजूरी दी है. ऐसे में अब यह उम्मीद की जा रही है कि सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य को हासिल कर लेगी. दरअसल, सिर्फ बीपीसीएल की बिक्री से सरकार को विनिवेश लक्ष्य का करीब 60 फीसदी हिस्सा हासिल हो जाएगा. वहीं आईओसी में हिस्सेदारी कम करने पर भी सरकार को बड़ा रकम मिलने की उम्मीद है. कहने का मतलब ये है कि सरकार इस फैसले से एक ही झटके में अपने विनिवेश लक्ष्य के करीब पहुंच गई है.
इन कंपनियों पर भी है फोकस
हालांकि सरकार अब भी एअर इंडिया और पवन हंस जैसी सरकारी कंपनियों की बिक्री पर जोर दे रही है. सरकार इन कंपनियों में की शत-प्रतिशत हिस्सेदारी बेचे जाने के पक्ष में है. हालांकि कई कोशिशों के बाद भी सरकार को अभी सफलता नहीं मिल सकी है. बता दें कि बजट सत्र के दौरान मंत्री अरविंद गणपत सांवत ने संसद को उन कंपनियों के बारे में जानकारी दी जिन्हें सरकार ने सैद्धांतिक विनिवेश को मंजूरी दे दी है. ये कुल 28 कंपनियां हैं. इसके अलावा मंत्रालय की ओर से कुल 19 कंपनियों के बारे में भी बताया गया जिन्हें बंद करने की सरकार ने मंजूरी दी है.