बीमा नियामक इरडा ने आईडीबीआई बैंक में एलआईसी द्वारा 51 फीसदी की हिस्सेदारी खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इससे इस सौदे का रास्ता साफ हो गया है. लेकिन सच तो यह है कि इस सौदे से बैकिंग और बीमा, दोनों सेक्टर के कर्मचारी परेशान और नाराज दिख रहे हैं.
इस निवेश का पूरे बीमा और बैंकिंग सेक्टर के कर्मचारी कड़ा प्रतिरोध करने लगे हैं. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, दोनों सेक्टर के कर्मचारी इस बात से खासे नाराज हैं और इस पर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर बुरी तरह घाटे और फंसे कर्जों वाले एक बैंक में एलआईसी द्वारा निवेश करना कितना वाजिब है.
अखिल भारतीय एलआईसी कर्मचारी महासंघ के महासचिव राजेश कुमार ने अखबार से कहा, 'हम इस बिक्री को लेकर काफी अधीर और चिंतित हैं. एलआईसी में एक जिम्मेदारी ट्रेड यूनियन होने के नाते हम यह सवाल पूछना चाहेंगे कि आईडीबीआई जैसा एक बैंक जिसके बहीखाते के एक-तिहाई हिस्से के बराबर फंसा कर्ज हो, वह एलआईसी के लिए एक अच्छा निवेश कहा जाएगा?'
कुमार ने इस बारे में एलआईसी के चेयरमैन वी.के.शर्मा को लेटर लिखकर भी आपत्ति जताई है. उन्होंने लिखा है, 'आईडीबीआई बैंक में एनपीए की हालत को देखते हुए एलआईसी द्वारा बैंक में हिस्सेदारी बढ़ाने के इरादे से पॉलिसी धारकों के कीमती बचत पर जोखिम आ सकता है.'
गौरतलब है कि मार्च तिमाही के अंत तक आईडीबीआई बैंक के पोर्टफोलियो में सकल एनपीए बढ़कर 55,588 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था. इसका मतलब है कि बैंक को अपने बहीखातों को साफ-सुथरा बनाने और जरूरी पूंजी का स्तर बनाए रखने के लिए भारी पूंजी की जरूरत होगी.
बैंकिंग सेक्टर के लोग भी एलआईसी के इस प्रस्ताव पर सवाल उठा रहे हैं. अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ के महासचिव सी.ए. वेंकटचलम ने वित्त मंत्री पीयूष गोयल को एक लेटर लिखकर कहा है, 'यह बताना महत्वपूर्ण है कि निवेश एलआईसी के कारोबार का आम हिस्सा है, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि सभी घाटे में चलने वाली संस्थाओं के लिए एलआईसी को राहत पैकेज की तरह इस्तेमाल किया जाए.
यह भी ध्यान देना होगा कि जिस तरह से बैंक के बहीखाते में बड़ी मात्रा में बैड लोन हैं, उसी तरह से अब एलआईसी के पोर्टफोलियो में भी बड़े पैमाने पर एसेट या निवेश हो गए हैं.'
उन्होंने लिखा है, 'इस महत्वपूर्ण समस्या को दूर करे के लिए किसी कठोर कदम को उठाने की जगह किसी ऐसे बैंक में और निवेश बढ़ाना जो पहले से ही भारी बैड लोन और घाटे का सामना कर रहा हो, समुचित कदम नहीं कहा जा सकता.'