भारत में हर इंसान का यही सपना होता है अपना घर खरीदना, नौकरी लगते ही सामाजिक और पारिवारिक दबाव लोगों पर इस तरह बढ़ जाता है कि अगर घर नहीं खरीदा तो जीवन में सबसे पीछे रह जाएंगे. हर इंसान के जीवन की चेकलिस्ट में 'अपना घर' सबसे ऊपर होता है.
बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि जीवन में स्थिरता का मतलब है अपना घर. भारतीय समाज में घर को केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि सफलता, सम्मान और सुरक्षा का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है. अक्सर लोग अपनी पहली नौकरी लगते ही या शादी के तुरंत बाद घर खरीदने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं.
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लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि भावनाओं के आवेग और सामाजिक दबाव में लिया गया यह 'जीवन का सबसे बड़ा फैसला' आपको आर्थिक रूप से समृद्ध बना रहा है या कर्ज के जाल में धकेल रहा है? आज तक रेडियो के विशेष कार्यक्रम 'प्रॉपर्टी से फायदा' (PSF) में रियल एस्टेट एक्सपर्ट रवि सिन्हा ने इसी 'इमोशनल बाइंग' और निवेश के सही समय पर एक ऐसी चर्चा की है, जो घर खरीदने की आपकी सोच को पूरी तरह बदल सकती है.
सफलता का पैमाना या वित्तीय साक्षरता की कमी?
रवि सिन्हा कहते हैं- 'समाज का एक अनकहा नियम है - तुम सक्सेसफुल तभी हो जब तुम्हारे पास अपना घर है.' अगर आप किराए के घर में रह रहे हैं, तो इसे अक्सर एक 'अस्थाई' और 'अधूरी' जीवनशैली के रूप में देखा जाता है. इस सोच के पीछे सबसे बड़ी वजह 'वित्तीय शिक्षा की कमी' है.'
अक्सर लोग अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी एक ही झटके में 'डाउन पेमेंट' के तौर पर दे देते हैं और अगले 20-25 सालों के लिए भारी-भरकम ईएमआई (EMI) के बोझ तले दब जाते हैं. रवि सिन्हा का कहना है कि जो घर आपकी जेब से हर महीने पैसे निकाल रहा है और जिसकी रीसेल वैल्यू या रेंटल इनकम आपकी लागत से कम है, वह असल में 'एसेट' नहीं बल्कि 'लायबिलिटी' है.
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किस उम्र में खरीदें अपना घर? 20s, 30s या 40s?
अक्सर युवा 25 से 30 साल की उम्र में घर खरीदने की जल्दबाजी करते हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह उम्र करियर बनाने और अपनी नेटवर्थ बढ़ाने की होती है, न कि कर्ज में डूबने की. घर खरीदने का सबसे उपयुक्त समय 40 साल की उम्र के बाद हो सकता है. इसके पीछे कई ठोस कारण हैं.
रेंट VS EMI
यह बहस पुरानी है किराया देना पैसे की बर्बादी है या ईएमआई भरना? एक्सपर्ट्स ने इस पर एक बहुत ही व्यावहारिक दृष्टिकोण रखा है. उनका कहना है कि केवल मालिकाना हक पाने के जुनून में अपनी पूरी सेविंग्स खत्म कर देना जोखिम भरा हो सकता है. कल्पना कीजिए कि आपने अपनी सारी बचत घर में लगा दी और बीच में आपकी जॉब चली गई. ऐसी स्थिति में आप न केवल घर खोने के डर में रहेंगे, बल्कि आपके पास दैनिक खर्चों के लिए भी पैसा नहीं बचेगा.
रवि सिन्हा आगे कहते हैं- ' निवेश ऐसा होना चाहिए जो आपको 'नेटवर्थ' दे, न कि 'डेटवर्थ' (कर्ज वाली वैल्यू)।" उधार लेकर अपनी भावनाओं को पूरा करना वित्तीय आत्महत्या के समान हो सकता है.'
निवेश से पहले इन 5 बातों का रखें ध्यान
प्रॉपर्टी खरीदने से पहले किसी स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार या फंड मैनेजर से बात करें जो आपके पूरे वित्तीय पोर्टफोलियो को समझकर सही सलाह दे सके. माता-पिता, रिश्तेदारों या दोस्तों के 'स्टेटस सिंबल' के दबाव में आकर कभी घर न खरीदें. अपनी वित्तीय स्थिति का आंकलन खुद करें.
'अनरियल' रियल एस्टेट की हकीकत
प्रॉपर्टी मार्केट को अक्सर विशेषज्ञों द्वारा 'अनरियल' (Unreal) कहा जाता है. इसका कारण यह है कि प्रॉपर्टी की लिक्विडिटी बहुत कम होती है. अगर आपको अचानक पैसों की जरूरत पड़ जाए, तो आप रातों-रात अपना घर नहीं बेच सकते. वहीं, गोल्ड या म्यूचुअल फंड्स को बेचना कहीं ज्यादा आसान है. इसलिए, घर को निवेश से ज्यादा अपनी जरूरतों और सुख-सुविधाओं के नजरिए से देखना चाहिए.
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