बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने न केवल राजनीतिक पंडितों को चौंकाया, बल्कि उन तमाम अटकलों पर भी विराम लगा दिया जिनमें नीतीश कुमार को 'चूक और गफलतों' का शिकार बताया जा रहा था. चुनाव से पहले नीतीश कुमार पहले से कहीं ज्यादा राजनीतिक रूप से कमजोर दिख रहे थे. सार्वजनिक मंचों पर हुई उनकी गलतियों, अटपटे मौन, प्रोटोकॉल तोड़ने और जुबान फिसलने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे.
विपक्षी खेमे ने नीतीश कुमार की बढ़ती उम्र और उनके सार्वजनिक व्यवहार को बिहार का 'जो बाइडेन' कहकर प्रचारित किया था. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और जन सुराज के प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार की मानसिक फिटनेस पर सवाल उठाए और साथ ही 20 साल की सत्ता-विरोधी लहर का मुद्दा भी उछाला. लेकिन जब जनता की अदालत का फैसला आया, तो 'सुशासन बाबू' की छवि उनके हर व्यक्तिगत विवाद पर भारी पड़ी. फिर सवाल था कि ऐसा क्यों?
इसका जवाब दिखावे में कम और परिणामों में ज्यादा छिपा है. यह उस काम में है जो 'सुशासन बाबू' कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने जमीन पर उतारा. बिहार के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार द्वारा हाल ही में साझा किए गए 2001 से 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के अपराध प्रोफाइल में बड़ा बदलाव आया है. जिन अपराधों के कारण बिहार को कभी 'जंगल राज' कहा जाता था, वे अब अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे आ चुके हैं.
जब नीतीश कुमार की सार्वजनिक गलतियों का मज़ाक उड़ाया जा रहा था, तब बिहार में कानून-व्यवस्था का सबसे संवेदनशील पैमाना चुपचाप अपनी कहानी बदल रहा था. 2025 के चुनाव के बाद नई कैबिनेट बनने तक नीतीश कुमार खुद गृह विभाग संभाल रहे थे, जो सीधे तौर पर पुलिस और कानून-व्यवस्था की निगरानी करता है.
कानून-व्यवस्था ने गलतियों पर भारी पड़ने का काम किया?
अक्टूबर 2025 में, मतदान से पहले नीतीश कुमार की सार्वजनिक चूकों पर खूब चर्चा हुई. यहां तक कहा जाने लगा कि क्या वे एक और कार्यकाल संभालने के लिए फिट हैं या नहीं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी समझ लिया, राष्ट्रगान के दौरान बोल पड़े, एक अधिकारी के सिर पर गमला रख दिया, अधिकारियों और नेताओं के पैर छुए और यहां तक कह दिया कि 'गृह मंत्री को बुलाइए', जबकि वह पद खुद उन्हीं के पास था.
इसके बावजूद, बिहार एक ऐसे बदलाव के दौर से गुजर रहा था, जिसने शायद नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को फिर से सरकार बनाने का मौका दे दिया.
2025 में ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचे हिंसक अपराध
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, डीजीपी विनय कुमार द्वारा साझा आंकड़ों में बताया गया कि 2001 के बाद पहली बार बिहार में गंभीर हिंसक अपराध 2025 में सबसे निचले स्तर पर पहुंचे. हत्या के मामले, जो डेढ़ दशक तक हर साल 3,000 से ऊपर रहते थे, 2025 में घटकर 2,556 रह गए. यह 25 साल में सबसे कम है. डकैती के मामले, जो 2000 के शुरुआती वर्षों में 1,200 से ज़्यादा होते थे, 2025 में घटकर सिर्फ 174 रह गए, यानी 80 फीसदी से ज़्यादा की गिरावट. दंगा मामलों की संख्या, जो 2014 में 13,566 के शिखर पर थी, 2025 में गिरकर 2,502 रह गई. यह भी 2001 के बाद सबसे कम है.
बिहार के मतदाताओं के लिए यह बदलाव उनके दैनिक जीवन का हिस्सा था. राजमार्गों पर कम डकैतियां, कम जातीय संघर्ष और डर से मुक्त रातों ने लोगों के मन में सुरक्षा का भाव पैदा किया.
दंगा मामलों में गिरावट और भी स्पष्ट है. 2001 में जहां 8,520 दंगे दर्ज हुए थे, वहीं 2014 में यह संख्या 13,566 तक पहुंच गई. इसके बाद गिरावट तेज हुई. 2019 में 7,262 और 2025 में सिर्फ़ 2,502 मामले दर्ज हुए. यह 2001 के बाद सबसे कम और मध्य-2010 के शिखर से 80 फीसदी से अधिक की गिरावट है.
‘सुशासन बाबू’ की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत शायद लोगों की तुलनात्मक स्मृति है. लालू-राबड़ी शासन के बाद वे वह नेता बने, जिन्होंने रोजमर्रा की अराजकता पर लगाम लगाई. इसी वजह से 2005-2010 के अपने पहले पूर्ण कार्यकाल में ही उन्हें 'सुशासन बाबू' कहा जाने लगा. अब सामने आए अपराध के आंकड़े इस दावे को ठोस आधार देते हैं.
बेहतर पुलिसिंग बनाम 'गुंडा राज' का डर
डीजीपी के खुलासों से सख्त पुलिसिंग की तस्वीर भी सामने आई है. 2025 में करीब 5,000 अवैध हथियार बरामद किए गए, 74 अवैध हथियार फैक्ट्रियों का भंडाफोड़ हुआ, बड़े पैमाने पर ड्रग्स की बरामदगी हुई, एसटीएफ मुठभेड़ों में बढ़ोतरी हुई और कम से कम 134 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया. हालांकि, बलात्कार के मामलों में बीते वर्षों में तेज बढ़ोतरी हुई है.
2000 में जहां 746 मामले थे, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 2,205 हो गई. 2025 में इसमें मामूली गिरावट आई और मामले 2,025 रहे, लेकिन आंकड़े अब भी दो दशक पहले की तुलना में काफी अधिक हैं. वहीं, कुल संज्ञेय अपराधों की संख्या में वृद्धि मुख्य रूप से चोरी, सेंधमारी और साइबर अपराधों के कारण हुई है, जिसे बेहतर रिपोर्टिंग और डिजिटल पहुंच से भी जोड़ा जा सकता है.
जंगल राज की वापसी का डर और चुनावी फैसला
नीतीश कुमार के नेतृत्व में कानून-व्यवस्था के उपायों ने उन मतदाताओं को भरोसा दिया, जो आरजेडी और तेजस्वी यादव के साथ अब भी 'जंगल राज' के दौर का बोझ जोड़कर देखते हैं. चुनाव से पहले आरजेडी की रैलियों और कैडर की लाठी-भरी आक्रामक मौजूदगी ने गैर-यादव मतदाताओं में डर पैदा किया. जातीय वर्चस्व के खुले दावे पुराने दिनों की अराजकता की याद दिलाने लगे.
एनडीए ने भी अपने अभियान में बार-बार चेताया कि आरजेडी की वापसी का मतलब पुराने 'जंगल राज' की वापसी होगा.
आखिरकार, 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का फैसला यही बताता है कि मतदाताओं के लिए मुख्यमंत्री की सार्वजनिक गलतियों से ज़्यादा अहम राज्य का शासन था. लोगों ने नतीजों को तौला और उस नेता को चुना, जिसे वे सुरक्षा, व्यवस्था और स्थिरता से जोड़ते हैं. नीतीश कुमार के लिए 'बाइडेन सिंड्रोम' की चर्चा फीकी पड़ गई, क्योंकि बिहार के लोगों के लिए इससे कहीं ज्यादा डरावना विषय था- 'जंगल राज' में वापसी का भय.