
Big touchscreen in cars: सुबह की भागदौड़, ऑफिस की जल्दी और हाथ में स्टीयरिंग. सड़क पर बच्चे स्कूल जा रहे हैं, कोई बुज़ुर्ग साइकिल से सब्ज़ी लेने निकला है, और सामने सिग्नल अचानक रेड हो जाता है. लेकिन ड्राइवर की नज़र सड़क पर नहीं, कार की बड़ी चमकदार टचस्क्रीन पर है, जहां वह AC का टेंप्रेचर सेट करने या पसंदीदा गाना बदलने में लगा है. बस यही कुछ सेकंड का ध्यान भटकना किसी की ज़िंदगी बदल सकता है. एक हादसा... सड़क पर पसरा खून... एम्बुलेंस की आवाज़, और किसी घर में हमेशा के लिए सन्नाटा.
सवाल सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं है, सवाल सोच.. इंसानी समझ और स्मार्ट होती कारों के साथ ये भी है कि, इस तरह की तकनीकी हमारे लिए क्यों जरूरी है? जो हर पल अपने साथ एक रिस्क लेकर आए. क्या स्टीरियो, रेडियो, एसी या फिर वॉल्यूम का बटन उंगलियों को इतना चुभने लगा है कि, उनकी जगह फ्लैट टचस्क्रीन ने केवल इसलिए ले ली है क्योंकि वो स्मूथ फील कराते हैं और फैंसी दिखते हैं. काम तो उनका भी लगभग वही है, जो फिजिकल बटन या नॉब का होता है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि, कहीं हम कारों को स्मार्ट बनाने के चक्कर में खतरा तो मोल नहीं ले रहे हैं.
नई कारें बड़े-बड़े टचस्क्रीन से सजी मिलती हैं, जो देखने में बेहद आधुनिक और हाई-टेक लगती हैं. लेकिन क्या यह टेक्नोलॉजी ड्राइविंग के दौरान हमारी सुरक्षा को खतरे में डाल रही है? कई शोध और डेटा बताते हैं कि टचस्क्रीन जितना आकर्षक है, उतना ही यह ड्राइवर का ध्यान भी भटकाता है, जिससे दुर्घटना का जोखिम बढ़ सकता है.
एक रिसर्च के मुताबिक 2023 के बाद लॉन्च हुई लगभग 97 प्रतिशत नई कारों में सेंट्रल डैशबोर्ड पर टचस्क्रीन दी जा रही है. खासकर 10-इंच या उससे बड़े डिस्प्ले के रूप में. म्यूजिक, नेविगेशन, एसी और यहां तक कि कार के बेसिक कंट्रोल भी अब टचस्क्रीन से ही ऑपरेट किए जा रहे हैं. कार कंपनियां इसे मॉडर्न और प्रीमियम एक्सपीरिएंस बताती हैं, लेकिन यात्रियों की सेफ्टी के पहलू पर कम ही बात होती है.

स्वीडन की एक मशहूर कार मैगजीन (Vi Bilagare) द्वारा किए गए रिसर्च ने टचस्क्रीन के खतरे को साफ तौर पर सामने रखा है. इस रिसर्च में 11 मॉडर्न कारों (ज़्यादातर टचस्क्रीन वाली) के कंट्रोल्स की यूज़ेबिलिटी की तुलना 2005 मॉडल की Volvo V70 से की गई. जिसमें फिजिकल बटन थे. ड्राइवरों को एक ट्रैक पर 110 किमी/घंटा की स्पीड से कार चलाते हुए कार में कुछ सामान्य फीचर्स को ऑपरेट करने को कहा गया, जैसे एसी का टेंप्रेचर बदलना या रेडियो कंट्रोल करना इत्यादि. टचस्क्रीन वाली कारों में इन साधारण कामों को पूरा करने में ड्राइवरों को 20 सेकंड से भी ज्यादा समय लगा.
इसी स्टडी में यह भी पाया गया कि पारंपरिक नॉब और बटन वाली कारों में वही काम 10 सेकंड से भी कम समय में पूरे हो गए. वजह साफ है. बटन और नॉब को ड्राइवर बिना देखे भी इस्तेमाल कर सकता है, जबकि टचस्क्रीन में हर बार नजर सड़क से हटाकर स्क्रीन देखनी पड़ती है. यही कुछ सेकंड का फर्क दुर्घटना की वजह बन सकता है.
20 सेकंड तक सड़क से नजर हटना किसी भी रफ्तार पर बेहद खतरनाक है. इतनी देर में गाड़ी कई सौ मीटर आगे बढ़ सकती है. इस दौरान सामने अचानक ब्रेकर, पैदल जा रहा कोई शख्स या कोई और वाहन आ जाए, तो हादसे से बचना मुश्किल हो जाता है. टचस्क्रीन यही खतरा चुपचाप बढ़ा रहा है. और फैंसी, हाई-टेक होती कारों में इस फीचर को बढ़ा-चढ़ा कर मार्केट किया जाता है.
यूरोप की प्रमुख व्हीकल सेफ्टी एजेंसी Euro NCAP, जो कारों का क्रैश टेस्ट कर उन्हें सेफ्टी रेटिंग देती है, उसने भी टचस्क्रीन का विरोध किया है. हाल ही में एजेंसी ने पाया है कि फिजीकल बटन और डायल (नॉब सिस्टम) ड्राइवर को कम ध्यान भटकाते हैं, क्योंकि इन्हें गाड़ी चलाते वक्त आँखें हटाए बिना भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके उलट, टचस्क्रीन में मेनू नेविगेशन या किसी भी ऑपरेशन के लिए ड्राइवर को ध्यान लगाना पड़ता है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि टचस्क्रीन के साथ-साथ फिजिकल बटन और वॉइस कमांड जैसे विकल्प भी होने चाहिए, ताकि ड्राइवर का ध्यान सड़क पर बना रहे. Euro NCAP जैसी संस्थाएँ जल्द ही ऐसे मानकों को लागू करने की तैयारी में भी हैं, जिससे कार निर्माता सेफ इंटरफेस डिज़ाइन करें.
हाल के ट्रांसपोर्ट रिसर्च लैबोरेटरी (TRL) की एक रिसर्च में सामने आया है कि, टचस्क्रीन के इस्तेमाल के दौरान ड्राइवर का रिएक्शन टाइम 57% तक बढ़ सकता है. जो शराब या नशीले पदार्थ के प्रभाव के बराबर है. इससे ड्राइवर को सड़क की स्थितियों पर रिएक्ट करने (प्रतिक्रिया देने) देने में काफी देर लग सकती है. ऐसे में दुर्घटना का जोखिम और अधिक बढ़ जाता है.

ये सच है कि, बीते कुछ सालों में दुनिया भर में कारों में सेफ्टी फीचर्स को लेकर कई नए इनोवेशन हुए हैं. साथ ही लोगों ने ज्यादा सेफ्टी रेटेड कारों को प्राथमिकता भी दी है. इसका असर भारत में भी देखने को मिला है. यहां पर भी कार कंपनियां ऐसी कारों का निर्माण कर रही हैं, जो भारत न्यू कार असेस्मेंट प्रोग्राम (Bharat NCAP) या ग्लोबल एनसीएपी क्रैश टेस्ट में बेहतर सेफ्टी रेटिंग हासिल कर रही हैं. लेकिन आने वाले समय में सेफ्टी रेटिंग के मानक बदलने वाले हैं.
Euro NCAP ने हाल ही में यह स्पष्ट किया है कि आने वाले समय में ऐसी कारों को 5-स्टार सुरक्षा रेटिंग देना मुश्किल हो सकता है, जिनमें जरूरी कामों के लिये केवल टचस्क्रीन का उपयोग होता है. इसके तहत हॉर्न, विंडशील्ड वाइपर, टर्न सिग्नल, इमरजेंसी लाइट आदि जैसे फंक्शन को ऑपरेट करने के लिए फिजिकल बटन देना जरूरी होगा.
भारतीय बाजार में बड़े टचस्क्रीन वाली कारों का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है. हाल ही में लॉन्च हुए महिंद्रा एक्सयूवी 7एक्सओ, बीई 6, एक्सईवी 9ई, टाटा सिएरा, किआ कारेंस, किआ सेल्टोस, किआ सिरोस, हुंडई क्रेटा जैसी कारों में बड़े साइज का टचस्क्रीन दिया जा रहा है. कुछ कार कंपनियां तो फीचर्स की रेस में अव्वल आने के लिए कार से ही पेमेंट करने और हैंड-वेव से दरवाजे खोलने जैसे फीचर्स भी दे रही हैं. वहीं मर्सिडीज बेंज जैसी लग्ज़री कार कंपनियों ने तो कुछ मॉडलों में पूरी डैशबोर्ड ही टचस्क्रीन से भर दिया है.
ऐसा नहीं है कि, टचस्क्रीन से केवल नुकसान ही है. इससे कुछ फायदे भी हैं, जो डेली ड्राइविंग को आसान बनाता है. टचस्क्रीन सिस्टम कार में नेविगेशन, कनेक्टिविटी, एंटरटेनमेंट और कई फीचर्स को एक ही स्क्रीन से कंट्रोल करने की सुविधा मिलती है, जो ट्रेडिशनल बटन सिस्टम से संभव नहीं होता. यह टेक्नोलॉजी मॉडर्न ड्राइविंग एक्सपीरिएंस को बेहतर तो बनाती है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा को भी ध्यान में रखना जरूरी है.