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राग आधारित फिल्मी गीत जो बन गया स्कूल प्रेयर... केदारनाथ धाम से क्या है इसका कनेक्शन?

एसडी. बर्मन ने "मुनीमजी" (1955) में लता मंगेशकर की कोमल आवाज में "सजन बिना नींद न आए" रचा, जो एक पुरानी बंदिश का फिल्मी रूपांतरण था. चित्रगुप्त की "तेल मालिश बूट पॉलिश" (1961) में लता और मन्ना डे की जुगलबंदी ने राग की सुंदरता को उभारा. मदन मोहन की "जहांआरा" (1964) में रफी की गायिकी में भी केदार की झलक दिखाती है.

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राग केदार का संगीत आत्मा पर असर डालता है, कई फिल्मी गीतों में प्रयोग हुआ है राग केदार
राग केदार का संगीत आत्मा पर असर डालता है, कई फिल्मी गीतों में प्रयोग हुआ है राग केदार

भगवान शिव के पवित्र धाम केदारनाथ की यात्रा जारी है और श्रद्धालु बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं. केदारनाथ भगवान शिव का ही एक नाम है और उन्हें यह नाम अपने ही एक अवतार में खुद से किए गए प्रश्न की वजह से मिला है. स्कंदपुराण में एक कथा है कि शिव, बैल के रूप में तपस्या कर रहे इंद्र के पास पहुंचे और उनसे पूछा 'केदारयामि...' यानी किसे जल में डुबा दूं? तब इंद्र ने उन्हें पांच असुरों के नाम बताए जो मानवता के लिए खतरा थे और इंद्र के ऐसा कहने पर भगवान शिव ने बैल रूप में ही उन असुरों का संहार कर दिया. देवराज इंद्र की ही प्रार्थना पर शिव ने उस निर्जन पर्वतीय क्षेत्र को अपना निवास बना लिया और ज्योतिर्लिंग स्वरूप में वहीं विराजमान हो गए.

महादेव शिव के नाम पर राग का नाम

यह तो थी केदारनाथ धाम की पौराणिक कहानी, लेकिन भगवान शिव का ये नाम भारतीय शास्त्रीय पद्धति के एक राग में भी सार्थक होता है, जिसे उनके ही नाम से राग केदार के तौर पर जाना जाता है. भगवान शिव के नाम पर एक राग का नाम क्यों है, और शास्त्रीय पद्धति के इस राग का देवाधिदेव महादेव से क्या जुड़ाव है, इस बारे में बहुत स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, लेकिन इस प्रश्न का उत्तर राग केदार की प्रकृति से मिल जाता है.

कल्याण थाट से हुई राग केदार की उत्पत्ति

असल में, राग केदार की उत्पत्ति कल्याण थाट से हुई है और इस राग में दोनों मध्यम (स्वर म) प्रयोग किए जाते हैं. इसके अलावा बाकी सभी स्वर शुद्ध लगते हैं और राग की जाति औडव षाडव है. राग केदार के आरोह में ‘रे ग’ और अवरोह में ‘ग’ स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता है. औडव का अर्थ है, जब राग के आरोह में मुख्य रूप से केवल पांच ही स्वर प्रयोग में लाए जाते हैं, तब उस राग की प्रकृति औडव होती है, लेकिन जब अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होता है, तो इसे षाडव कहते हैं. इस तरह राग केदार की प्रकृति औडव (पंच स्वरी) और षाडव (षष्ठ स्वरी) है.

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आरोह– सा, म, प, म प ध नी सां

अवरोह– सां नी ध प, म प ध प म, रे सा

पकड़– सम प, म प ध प म, रे सा.

राग केदार की प्रकृति में समाया है शिवतत्व

इसकी प्रकृति से इसमें शिवतत्व को खोजने की कोशिश करें तो यह राग के आरोह में ही मिल जाएगा. राग का आरोह पंच स्वरी है और शिवजी का प्रमुख मंत्र 'नमः शिवाय' भी पंचाक्षरी है. इसके अलावा राग में प्रयोग किए जाने वाले शुद्ध और तीव्र मध्यम (यानी म स्वर) का प्रयोग इसे शिवजी की ध्यान अवस्था की ओर ले जाता है और राग की प्रकृति को गंभीर बना देता है. यह गंभीरता साधना के लिए जरूरी है और देवत्व का अहसास कराने वाली होती है. ऊर्जा को केंद्रित करती है और मन को पॉजिटिव एनर्जी से भर देती है.

इसे फील करने के लिए साल 1971 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की एक फिल्म पर गौर कीजिए. फिल्म का नाम है गुड्डी, मुख्य भूमिका में थी जया भादुड़ी और फिल्म लिखी थी गुलजार ने. गुलजार साहब की लिखी इस खूबसूरत फिल्म में एक बड़ा ही प्यारा गाना है, जो आज भी कई स्कूलों की प्रार्थना सभाओं का हिस्सा बन हुआ है. गीत के बोल हैं...

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'हमको मन की शक्ति देना,
मन विजय करें,
दूसरों की जय से पहले,
खुद को जय करें....'

यह गीत जितना ईश्वरीय है, उतना ही अलौकिक भी. इसमें प्रार्थना है, ईश्वर की वंदना और आराधना भी है, लेकिन फिर भी इसकी मूल भावना में एक सकारात्मक सोच है. यह खुद को संबल देने वाला गीत है और इसे गंभीर बनाते है राग केदार के स्वर.

दिल को छू लेता है राग केदार

राग केदार भारतीय शास्त्रीय संगीत पद्धति में संगीत का एक बेहद सुंदर और गहरा राग है. इसे समझने और गाने के लिए संगीत की शुरुआती तालीम हासिल होना तो जरूरी ही बन जाती है. यानी आप तानसेन न हों तो कम से कम कानसेन तो जरूर हों और यह सुनने वालों से खास संगीतमय समझ और कौशल की मांग तो करता ही है. जब इसे पूरे कौशल के साथ कोई कलाकार प्रस्तुत करता है, तो यह सुनने वालों के दिल को छू लेता है.

बेहद प्राचीन है राग केदार

राग केदार कितना प्राचीन है, इसे बता पाना मुश्किल है, लेकिन इसे ध्रुपद, धमार, खयाल और ठुमरी जैसी कई शैलियों में गाया जाता है, जिनका प्राचीन समय से धीरे-धीरे गायन की अलग-अलग शैलियों के रूप में विकास हुआ है. राग केदार को उसकी एक और बात है जो खास बनाती है, वो ये है कि आप इसे सीधे-सीधे सुनें तो उसमें कोई चार्म, कोई आकर्षण नहीं दिखेगा. यानी सिर्फ सरलता से आप 'सा म प ध नि सां...' तो कोई आनंद नहीं है, लेकिन जब इस स्वर समूह को लहर के साथ गाया जाए तो फिर देखिए कि कैसे राग केदार अपना जादू बिखेरता है.

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हिंदुस्तानी संगीत में राग केदार अपनी अनूठी मधुरता और भावनात्मक गहराई के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है, बल्कि कई फिल्मी गीतों में इसका खूब प्रयोग हुआ है. असल में यह राग शास्त्रीय और फिल्मी संगीत दोनों में लोकप्रिय रहा है. असाधारण प्रतिभा के धनी, संगीतकार रहे ओपी नैयर की राग आधारित धुनें रचने की कला को फिल्म इंडस्ट्री में खूब सराहा गया है.

कई फिल्मी गीतों में शामिल रहा राग केदार

उनकी रचना "एक मुसाफिर एक हसीना" (1962) में मोहम्मद रफी और आशा भोसले की गायिकी में राग केदार अलग ही चमक बिखेरता है. गीत था, 'आप यूं ही अगर हमें मिलते रहे...'  इसी तरह, "सीआईडी " (1967) का गीत "जाने तमन्ना" आशा भोसले और महेंद्र कपूर की आवाज़ में राग केदार की एक अलग ही खूबसूरती को सामने लाकर रखता है. फिल्मी संगीत में राग केदार का जादू आगे कई अन्य संगीतकारों ने भी बिखेरा.

लता मंगेशकर ने भी गाए हैं कई गाने

एसडी. बर्मन ने "मुनीमजी" (1955) में लता मंगेशकर की कोमल आवाज में "सजन बिना नींद न आए" रचा, जो एक पुरानी बंदिश का फिल्मी रूपांतरण था. चित्रगुप्त की "तेल मालिश बूट पॉलिश" (1961) में लता और मन्ना डे की जुगलबंदी ने राग की सुंदरता को उभारा. मदन मोहन की "जहांआरा" (1964) में रफी की गायिकी में भी केदार की झलक दिखाती है, भले ही अंतिम अंतरा शुद्ध केदार से थोड़ा भटकता है, लेकिन यह भी उसकी खूबसूरती में ही शामिल है. गीत था, 'बाद मुद्दत के ये घड़ी आई.' इन सबके बावजूद राग केदार के सबसे अनमोल और बेजोड़ फिल्मी भजन 'दरसन दो घनश्याम नाथ मोरी अंखियां प्यासी रे' को कैसे भुलाया जा सकता है. फिल्म नरसी भगत में शंकर लाल व्यास का लिखा और मशहूर सिंगर मन्ना डे के गाया हुआ ये भजन अमर है, और ऐसा अमर है कि साल 2008 में जब फिल्म 'स्लमडॉग मिलेनियर' आई थी, तब मेन लीड देव पटेल के बचपन के किरदार से ये गीत भीख मांगने के लिए गवाया गया था.

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घराना संगीत में भी रहा शामिल

शास्त्रीय संगीत में राग केदार की गहराई को दागर बंधुओं, जहीरुद्दीन और फैयाज़ुद्दीन, ने ध्रुपद "भज रे मन विश्वनाथ" में चौताला ताल के साथ प्रस्तुत किया. ग्वालियर घराने के पंडित विष्णु दिगंबर  पलुस्कर की "जोगी रवाला" और "कान्हा रे नंद नंदन" राग केदार की पारंपरिक बंदिशों का उत्कृष्ट नमूना हैं. प्रख्यात गायक बड़े गुलाम अली खां साहब तो जब राग केदार गाते हैं, तब तो वाकई ऐसा लगता है कि रागिनियां नाच उठी हैं.

कई खूबसूरत बंदिशें राग केदार से सजीं

फिर Youtube पर जाइए और प्रख्यात गायिका अश्विनी भिड़े देशपांडे से "चतुर सुघर बलमा" सुनिए. अगर आप वास्तव में शास्त्रीय संगीत प्रेमी हैं तो इस राग की गहराई और ऊंचाई दोनों को ही समझ सकेंगे. राग केदार सिर्फ गीतों और आवाज में ही बल्कि वाद्ययंत्रों में भी खूब फबता है. भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई ने तो राग केदार को सिद्ध जैसा कर लिया था. अली अकबर खान की सरोद, और पंडित रामाश्रेय झा "रामरंग" की रचना "पैंजनी बाजे झनन झनन" में राग केदार अपने पूरे स्वरूप में खिल उठता है. भगवान शिव के नाम पर रचा गया यह राग प्रेम का सुर है, अध्यात्म का संगीत है और मुक्ति का गीत बनकर हमारे इर्द-गिर्द मौजूद है.

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